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कान्हड़दे प्रबन्ध
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कान्हड़दे प्रबन्ध पश्चिमी अपभ्रंश में रचित एक ग्रन्थ है जिसकी रचना कवि पद्मनाभ ने सन १४५५ में की थी। इसमें रावल कान्हड़े (या कान्हड़देव) की गाथा है जो जालौर के चहमान शासक थे। इस प्रसिद्ध ग्रन्थ में जालौर पर अलाउद्दीन ख़िलजी के आक्रमण व जालौर राजा कान्हड़देव की वीरता का वर्णन है। राजकुमार 'वीरभदेव' व सुल्तान ख़िलजी की पुत्री 'फिरोजा' के प्रेम के वर्णन के साथ-साथ तात्कालिक सामाजिक व सांस्कृतिक चित्रण भी इस कृति में प्रस्तुत हुआ है।
कान्हड़दे प्रबंध में संस्कृति और समाज
कवि पद्मनाभ कृत ‘कान्हड़दे प्रबंध’ में कवि की काव्य-प्रतिभा तथा पांडित्य के दर्शन तो होते ही हैं, इसके अतिरिक्त इसमें अपने युग का जीवन्त व मनोरम चित्रण भी हुआ है। वस्तुतः ‘कान्हड़दे प्रबंध’ कथानायक के स्वाभिमान तथा स्वदेश-प्रेम का एक बेजोड़ नमूना है। इसके रचनाकार ने मानवीय संबंधों व संवेदनाओं को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है। इसमें कवि पद्मनाभ ने काव्योचित स्वतंत्रता का प्रयोग करते हुए इतिहास और कल्पना के योग से एक सुन्दर प्रबंध की योजना करने में सफलता प्राप्त की है।
इस काव्य का सृजन मुख्य रूप से दोहे-चौपाइयों में किया गया है। यद्यपि बीच-बीच में योग्य स्थान पर करुण रस-परिप्लावित पद-उर्मिगीत भी आये है । पद्ममनाभ कवि की वाणी ओजस्वी, प्रवाहबद्ध, प्रासादिक एवं देशभक्ति की सचोट ध्वनिवाली है। कवि का भाषा प्रभुत्व एवं शब्द-निधि अमाधारण है। यह कथा काव्य युद्ध-विजयी होने पर भी मुस्लिम सत्ता के साथ संघर्ष का अच्छा निरूपण है। फारसी-अरबी के मूल शब्द भी इसमें प्रचुर मात्रामें आये हैं। पद्मनाभ, कान्हड़देव के वंशज जालौर के शासक अखेराज के राजकवि थे। इन्हें ऐतिहासिक तथ्य एवं पार्श्वभूमिका का पूर्ण ज्ञान है। हिन्दू और मुस्लिम राजनीति का इन्हें प्रत्यक्ष अनुभव है और इसी कारण ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक-दृष्टि से भी 'कान्हड़दे प्रबन्ध' एक महत्त्वपूर्ण रचना के रूपमें सर्व स्वीकृत है। इसमें तात्कालिक सामाजिक परिस्थिति का पूर्ण आभास मिलता है। इस प्रकार से भाषा साहित्य एवं ऐतिहासिक-ज्ञानपिपासुओं के लिए यह 'कान्हड़देप्रबन्ध' अनेक रूपसे विशेष महत्त्वकी रचना है। गुजरात निवासी कवि ने राजस्थान के एक प्रमुख शहर जालोर में इसकी रचना की है । वास्तवमें १६वीं शताब्दि तक गुजरात और राजस्थान की जो भाषा विषयक एकता थी यह इस बातका परिचायक बन जाता है। बाद के समय में विकसित हुई अर्वाचीन गुजराती और राजस्थानी इन जुड़वांभाषाओं का एक एवं असंदिग्ध पूर्व रूप, अन्य बहुसंख्यक रचनाओं के समान 'कान्हड़ देप्रबन्ध' में भी उपलब्ध है।
हमारे प्राचीन साहित्य का अध्यापन करने वालों को और प्राचीन समय के कवियों की रचनाओं को मुख परम्परा द्वारा किंवा अन्य रीति से सुरक्षित रखनेवाले जन-समुदाय को भी 'कान्हड़देप्रबन्ध' और इस ग्रन्थके रचयिता का विस्मरण हो गया था। अर्वाचीन काल में इसकी खोज का श्रेय संस्कृत प्राकृतादि सहित भारतीय विद्या के प्रकाण्ड विद्वान डॉ. ज्योर्ज ब्यूलर को है। अनुमानतया सौ वर्ष पूर्व बम्बई सरकार की योजना के अनुसार संस्कृत हस्तलिखित प्रतियों की खोज करते समय थराद के जैन ग्रन्थ भण्डार में प्रथम बार इस 'कान्हड़देप्रबन्ध' की प्रति देखने में आई। डॉ० ब्यूलर बम्बई क्षेत्रके शिक्षाविभागीय एक उच्च अधिकारी थे। श्री नवलराम लक्ष्मीराम पण्ड्या गुजराती साहित्य के अग्रगण्य अपितु विशिष्ट विवेचक थे। गुजराती भाषाके अधिकारिक-विद्वान के रूप में आपको इनके प्रति बहुत आदर था। 'कान्हड़देप्रबंध' की नकल करा कर उसे ब्यूलरने नवलरामके पास भेजी। इन दोनों में नवलराम 'गजरात शालापत्र' प्रमाण-दृष्टिसे देखें तो प्राचीन गुजराती साहित्यकी किसी अन्य रचनामें फारसी-अरबी के इतने शब्द नहीं हैं। कान्हड़ देप्रबंधमें फारसी-अरबीके १११ शब्द हैं। एक ही शब्द की पुनरावृत्ति की तथा फारसी-अरबी के विशेष नामों का इस संख्या में समावेश नहीं है।
इन्हें भी देखें
कान्हड़देव
बाहरी कड़ियाँ
कान्हडदे प्रबन्ध (भाग-१)
कान्हडदे प्रबन्ध में वर्णित सामाजिक जीवन
कान्हडदे प्रबन्ध सांस्कृतिक दृष्टि से
श्रेणी:भारत का इतिहास