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भारद्वाज ऋषि
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अप्रैल 2020
भारद्वाज Bharadwaja.jpg हिंदु ऋषि बृहस्पतिMishra Rajendra सप्तधारा: वेद-वेदाङ्ग-पुराणेतिहास-धर्मदर्शन-संस्कृति-साहित्य-साहित्यशास्त्र, सुवर्णद्वीप (जीवा-बाली)एवं अर्वाचीन संस्कृत की सप्तधारा से सम्बद्ध शोध आलेख 2004 Sampūrṇānanda Saṃskr̥ta Viśvavidyālaya 978-81-7270-143-7 https://books.google.co.in/books?id=337XAAAAMAAJ&q=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF+%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF&dq=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF+%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj6o6riuavzAhWqIbcAHWjsC3cQ6AF6BAgGEAM 2 अक्टूबर 2021 hi (पिता)
ममता (माता) द्रोण (पुत्र), गर्ग, इलविदा, कात्यायनी हिंदू ग्रन्थों और वेदो के रचयिता हिंदु
भारद्वाज प्राचीन भारतीय ऋषि थे। । चरक संहिता के अनुसार भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान पाया। ऋक्तंत्र के अनुसार वे ब्रह्मा, बृहस्पति एवं इन्द्र के बाद वे चौथे व्याकरण-प्रवक्ता थे। उन्होंने व्याकरण का ज्ञान इन्द्र से प्राप्त किया था (प्राक्तंत्र 1.4) तो महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया। तमसा-तट पर क्रौंचवध के समय भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के साथ थे, वाल्मीकि रामायण के अनुसार भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के शिष्य थे।सितम्बर 2020
महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहित, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र, पुराण, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं। पर आज यंत्र सर्वस्व तथा शिक्षा ही उपलब्ध हैं। वायुपुराण के अनुसार उन्होंने एक पुस्तक आयुर्वेद संहिता लिखी थी, जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को सिखाया था। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।
ऋषि भारद्वाज को प्रयाग का प्रथम वासी माना जाता है अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में ही उन्होंने घरती के सबसे बड़े गुरूकुल(विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी और हजारों वर्षों तक विद्या दान करते रहे। वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियाँत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मँत्र द्रष्टा थे। ऋग्वेेद के छठे मंडल के द्रष्टाऋषि भारद्वाज ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं। अथर्ववेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका ऊँचा स्थान है। आपके पिता वृहस्पति और माता ममता थीं।
ऋषि भारद्वाज को आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का ज्ञान इन्द्र और कालान्तर में भगवान श्री ब्रह्मा जी द्वारा प्राप्त हुआ था। अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर ऋषि ने अमृत तत्व प्राप्त किया था और स्वर्ग लोक जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया था। (तैoब्राम्हण3/10/11)
सम्भवतः इसी कारण ऋषि भारद्वाज सर्वाधिक आयु प्राप्त करने वाले ऋषियों में से एक थे। चरक ऋषि ने उन्हें अपरिमित आयु वाला बताया है। (सूत्र-स्थान1/26)
ऋषि भारद्वाज ने प्रयाग के अधिष्ठाता भगवान श्री माधव जो साक्षात श्री हरि हैं, की पावन परिक्रमा की स्थापना भगवान श्री शिव जी के आशीर्वाद से की थी। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री द्वादश माधव परिक्रमा सँसार की पहली परिक्रमा है। ऋषि भारद्वाज ने इस परिक्रमा की तीन स्थापनाएं दी हैं-
1-जन्मों के संचित पाप का क्षय होगा, जिससे पुण्य का उदय होगा।
2-सभी मनोरथ की पूर्ति होगी।
3-प्रयाग में किया गया कोई भी अनुष्ठान/कर्मकाण्ड जैसे अस्थि विसर्जन, तर्पण, पिण्डदान, कोई संस्कार यथा मुण्डन यज्ञोपवीत आदि, पूजा पाठ, तीर्थाटन,तीर्थ प्रवास, कल्पवास आदि पूर्ण और फलित नहीं होंगे जबतक स्थान देेेेवता अर्थात भगवान श्री द्वादश माधव की परिक्रमा न की जाए।
आयुर्वेद सँहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज सँहिता, राजशास्त्र, यँत्र-सर्वस्व(विमान अभियाँत्रिकी) आदि ऋषि भारद्वाज के रचित प्रमुख ग्रँथ हैं।
ऋषि भारद्वाज खाण्डल विप्र समाज के अग्रज है। खाण्डल विप्रों के आदि प्रणेता ऋषि जगाने के लिए ऋषि एक स्थान पर कहते हैं-अग्नि को देखो यह मरणधर्मा मानवों स्थित अमर ज्योति है। यह अति विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कार्यों में प्रवीणतम ऋषि है जो मानव में रहती है। उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिए। अतः स्वयं को पहचानो। भाटुन्द गाँव के श्री आदोरजी महाराज भारद्वाज गोत्र के थे।
उत्तराखंड के उप्रेती और पंचुरी ब्राह्मण भारद्वाज गोत्र ब्राह्मण व बरनवाल हैं। उत्तराखंड के डंगवाल रावत भरद्वाज गौत्र के क्षत्रिय है। पंचुरी ब्राह्मण वेदिक काल से उत्तराखंड में रहते हैं। भारतीय व सनातन धर्मो के लिए ये सप्तऋषियों में से एक मने जाते है।जोशी अनिरुद्ध Bhardwaj Rishi ऋषि भारद्वाज और उनके वंश को जानिए https://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/bhardwaj-rishi-121021100017_1.html hindi.webdunia.com 2 नवम्बर 2021 hi
"पाठक" उपनाम लिखने वाले ब्राह्मण महर्षि भारद्वाज के वे वंशज हैं जिन्होंने उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल में पठन ,पाठन और अध्यापन की परंपरा को आगे बढ़ाया।
बाहरी कड़ियाँ
धरती की प्रथम परिक्रमा के जनक
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