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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मैकालेवाद

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दाएँ|अंगूठाकार|304x304पिक्सेल| थॉमस बबिंगटन मैकाले (1800-1859)। मैकालेवाद का तात्पर्य ब्रिटिश उपनिवेशों में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली आरम्भ करने की नीति से है। यह शब्द ब्रिटिश राजनेता थॉमस बबिंगटन मैकाले (1800-1859) के नाम से लिया गया है, जिसने गवर्नर-जनरल की परिषद में सेवा की और भारत में उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मैकाले की शैक्षिक नीतियां अत्यधिक विवादास्पद थीं, और आज भी विवादास्पद बनी हुई हैं। शिक्षा पर मैकाले के विचार इस विश्वास पर आधारित थे कि पश्चिमी संस्कृति और जीवन-मूल्य अन्य संस्कृतियों से श्रेष्ठ हैं, और इसलिए शिक्षा के माध्यम से पश्चिमी संस्कृति और मूल्यों का प्रसार करना महत्वपूर्ण है। बहुत से लोगों का विचार है कि मैकाले की शिक्षा नीति का भारत में शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा हैमैकाले ने नष्ट की हमारी ज्ञान परंपरा क्योंकि यह प्रणाली विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि के लोगों का पक्ष लेती है और कम विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि के लोगों के साथ भेदभाव करती है। कुछ दूसरे लोगों का तर्क है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति ने सभी पृष्ठभूमि के लोगों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करके भारत में शिक्षा में सकारात्मक भूमिका निभाई है। मैकाले की शैक्षिक नीतियों को पहली बार 1835 में लागू किया गया था। उस समय मैकाले को भारत में नव स्थापित शिक्षा समिति के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था। मैकाले की समिति को भारत के लिए शिक्षा की एक नई प्रणाली तैयार करने का काम सौंपा गया था, जो सदियों से चली आ रही पारम्परिक प्रणाली को बदल देगी। मैकाले की समिति ने सिफारिश की थी कि भारतीय स्कूलों में शिक्षा की भाषा अंग्रेजी होनी चाहिए और पाठ्यक्रम पूर्वी मूल्यों के बजाय पश्चिमी मूल्यों और विचारों पर आधारित होना चाहिए। इन सिफारिशों को लागू किया गया, और अंग्रेजी जल्दी ही भारतीय स्कूलों में शिक्षा की प्रमुख भाषा बन गई। मैकाले का विवरण-पत्र मैकाले ने 2 फरवरी, 1835 को अपने विवादास्पद भाषण में शिक्षा पर विवरण-पत्र (मिनट) गवर्नर जनरल की परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जिसे गवर्नर विलियम बैंटिक ने स्वीकार करते हुए अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम, 1835 पारित किया। इसने भारत में आधुनिक ब्रिटिश शिक्षा की नींव रखी। मैकाले के भाषण के कुछ प्रमुख अंश नीचे दिये गये हैं-2035 में भारत में अंग्रेजी भाषा को थोपे 200 साल हो जाएंगे... 'मैकाले माइंडसेट' के खिलाफ क्यों हैं PM मोदी?आख़िर क्या कहा था लार्ड मकाले ने? मुझे बताया गया कि यहाँ की शिक्षा 1813 के ब्रिटिश अधिनियम के तहत निर्धारित की गयी है, जिसमें कोई भी बदलाव संवैधानिक माध्यम से ही संभव है। फ़िलहाल एक ख़ास रकम साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए मुहैया की गयी है। यहाँ साहित्य का अर्थ वे तमाम संस्कृत और अरबी ग्रंथ हैं। मैं पूछता हूँ, क्या यहाँ के लोगों को मिल्टन की कविताएँ और न्यूटन की भौतिकी नहीं पढ़नी चाहिए? क्या वे कुश-घास से देवताओं की पूजा करना ही सीखते रहेंगे? अगर हम मिस्र का उदाहरण लें, तो वहाँ भी कभी समृद्ध सभ्यता थी। अब वे कहाँ हैं? क्या उन्हें भी आदि काल के चित्रलेख (हीरोग्लिफिक्स) ही पढ़ाए जाएँ? मुझे तर्क दिया गया कि यहाँ के समाज को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया। लेकिन, क्या अरबी और संस्कृत जैसी भाषाएँ अब यहाँ के समाज में भी मृतप्राय नहीं है? मैं धर्म के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना चाहता, लेकिन शिक्षा में बदलाव तो अपेक्षित है। क्या जेनर द्वारा स्मॉल पॉक्स के टीका खोजे जाने के बाद भी इन्हें टीका सिर्फ इसलिए नहीं दिया जाए क्योंकि यहाँ की संस्कृति नहीं है?आज भारत में बोली जाने वाली एक भी ऐसी भाषा नहीं, जिसमें कोई उत्तम साहित्य रचा जा रहा हो, या जो अनुवाद योग्य हो। उन्हें एक ऐसी भाषा में शिक्षा देनी होगी, जो सर्वथा मानक है। कमिटी के आधे लोग अरबी-संस्कृत के पक्ष में हैं, आधे अंग्रेज़ी के। आप ही बताएँ कि तीनों में सबसे उपयुक्त कौन सी भाषा है? मुझे संस्कृत और अरबी का कोई ज्ञान नहीं, किंतु मैंने अनुवाद पढ़े हैं और विद्वानों से विमर्श किया है। मैं यह ताल ठोक कर कहता हूँ कि तमाम अरबी और संस्कृत साहित्य मिला कर वह ज्ञान नहीं दे सकते, जो आज यूरोपीय पुस्तकालय का मात्र एक कोना दे सकता है। संस्कृत के सभी ग्रंथों से मिला ज्ञान तो हमारे प्राथमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रम के समकक्ष है।हमें उन्हें अंग्रेज़ी में शिक्षा देनी ही होगी, जो विश्व की भाषा बनती जा रही है। तमाम साहित्य, इतिहास, विज्ञान, तत्त्वमीमांसा, संस्कृति अध्ययन अंग्रेज़ी में हो रहा है। भारत का शासक-वर्ग अंग्रेज़ी पढ़ता और जानता है। यहाँ के समृद्ध परिवार के लोग अंग्रेज़ी ही पढ़ते हैं। दूसरी बात यह कि हम इन्हें यूरोपीय विज्ञान पढ़ाएँगे। इनके पुस्तकों में है क्या? एक तीस फ़ीट के राजा मिलते हैं, जो तीन हज़ार वर्ष जीते हैं? एक समुद्र मिलता है, जो मक्खन से भरा है? हम इन्हें अरबी और संस्कृत पढ़ाने के लिए अपने खजाने से खर्च करते रहे हैं, फिर भी कम लोग पढ़ने आते हैं। इन भाषाओं की किताबें आपने छपवाई, मगर कितनी बिकी? मैंने तो रसीद देखे हैं, अब तक कुछ हज़ार रुपए से अधिक की किताबें बिकी ही नहीं। यहीं के रईस अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए फ़ीस भर कर हमारे खजाने में धन डालते रहे हैं। इसी से स्पष्ट है कि यहाँ की जनता क्या चाहती है। अगर हम इन्हें अंग्रेज़ी की शिक्षा देने पर खर्च करें, तो गरीब भी यह भाषा पढ़ पाएँगे। इतना ही नहीं, इन्हें अरबी और संस्कृत पढ़ा कर आप अपनी अंग्रेज़ी शिक्षा के ख़िलाफ़ एक विपक्ष खड़ा कर रहे हैं। ये जब एकजुट होंगे, फिर इनकी ताकत आपको मालूम पड़ेगी, जो हमारे शासन को हिला कर रख देगी।मैंने हिन्दुओं में यह बात ग़ौर की है कि वह जितनी आसानी से अंग्रेज़ी सीख लेते हैं, उतनी आसानी से संस्कृत नहीं पढ़ पाते। मुझे ऐसे हिन्दू मिले जिन्हें मिल्टन की कविताएँ कंठस्थ हैं। मुझे नहीं लगता कि यह भाषा उनके लिए कठिन होगी। मुझे मालूम है कि अभी हमारे पास इतना धन नहीं कि पूरे भारत को शिक्षित कर सकें। मगर हमें एक ऐसा भारतीय वर्ग तैयार करना है, ‘जिसका रंग भारतीय हो, रग़ों में भारतीय खून दौड़ता हो, लेकिन उसका स्वाद अंग्रेज़ों जैसा हो। जो नीति और बुद्धि से अंग्रेज़ हो’। वह वर्ग ही शेष भारत को धीरे-धीरे अपने रंग में ढालेगा।मेरा बस चले तो मैं आज ही सभी अरबी और संस्कृत के प्रेस बंद कर दूँ। कलकत्ता के मदरसों और संस्कृत कॉलेज पर ताला लगा दूँ। सिर्फ बनारस का संस्कृत महाविद्यालय और दिल्ली का मुस्लिम कॉलेज रहने दिया जाए। जिन्हें रुचि होगी, वहाँ पढ़ लेंगे। ''अगर आपकी कमिटी मुझ से सहमत नहीं, तो मैं सदस्यता से इस्तीफ़ा देता हूँ। मैं यहाँ की भाषाओं में लिखे वाहियात विज्ञान और इतिहास को पढ़ाने के लिए सरकारी ख़ज़ाना खर्च करने के समर्थन में क़तई नहीं। यहाँ के लोग वर्तमान शिक्षा-पद्धति में पढ़ते रहे, तो भविष्य में भूखे मरेंगे। मैं इस पाप का भागी नहीं बनना चाहता। नरेन्द्र मोदी का 10-वर्षीय प्रतिज्ञा आह्वान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत को मैकाले द्वारा 1835 में शुरू किए गए औपनिवेशिक अभियान के 200 वर्ष पूर्ण होने तक-अर्थात अगले 10 वर्षों में—ऐसी मानसिकता से मुक्त करना होगा जो: अंग्रेजी को श्रेष्ठ मानती है, भारतीय भाषाओं को हीन समझती है, पश्चिमी संस्कृति को ‘आधुनिक’ बताती है, और भारतीय ज्ञान प्रणालियों को अप्रासंगिक। नरेन्द्र मोदी के अनुसार, यह केवल शिक्षा सुधार नहीं बल्कि मानसिक पुनरुत्थान का अभियान है।मैकाले की शिक्षा नीति और औपनिवेशिक मानसिकता: भारत में ज्ञान, संस्कृति और शासन का पुनर्गठन सन्दर्भ इन्हें भी देखें एक और स्वामी विवेकानन्द चाहिए एक नए ओणम के समय से गांधी की शैक्षिक भावना का स्मरण! (एम नागेश्वर राव) मैकाले ने सोच को गुलाम बनाया, अब आजादी जरूरी... भारतीय शिक्षा प्रणाली पर बोले प्रधानमन्त्री मोदी मैकाले का विवरण-पत्र श्रेणी:नव उपनिवेशवाद श्रेणी:भारत में शिक्षा का इतिहास श्रेणी:ब्रिटिश भारत