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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

अमोघवर्ष नृपतुंग

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Old Kannada inscription (876 AD) of Rashtrakuta King Amoghavarsha I at Veerabhadra temple in Kumsi.jpg अमोघवर्ष राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष का शिलालेख जो 876 ई में पुरानी कन्नड भाषा में लिखा गया है। (कुम्सी के वीरभद्र मन्दिर में) ६ठा राष्ट्रकूट सम्राट 814 878 CE (64 वर्ष) गोविन्द तृतीय कृष्ण द्वितीय शर्व 800 ई 878 ई गोविन्द तृतीय जैन धर्मJaini 2000 339 जिनसेन right|thumb|300px|पट्टडकल का जैन नारायण मंदिर अमोघवर्ष नृपतुंग ने निर्मित कराया था। अमोघवर्ष नृपतुंग या अमोघवर्ष प्रथम (814 – 878) भारत के राष्ट्रकूट वंश के महानतम शासक थे। वे जैन धर्म के अनुयायी थे। इतिहासकारों ने उनकी शांतिप्रियता एवं उदारवादी धार्मिक दृष्टिकोण के लिये सम्राट अशोक से उनकी तुलना की है। उनके शासनकाल में संस्कृत एवं कन्नड के कई विद्वानों को प्रश्रय मिला जिनमें महान गणितज्ञ महावीराचार्य का नाम प्रमुख है। परिचय अमोघवर्ष राष्ट्रकूट राजा जो संवत् 814 ई० में गद्दी पर बैठा और 64 साल राज करने के बाद संभवतः 874 ईं. में मरा। वह गोविन्द तृतीय का पुत्र था। उसके किशोर होने के कारण पिता ने मृत्यु के समय करकराज को शासन का कार्य सँभालने को सहायक नियुक्त किया था। किन्तु मंत्री और सामन्त धीरे-धीरे विद्रोही और असहिष्णु होते गए। साम्राज्य का गंगवाडी प्रांत स्वतंत्र हो गया और वेंगी के चालुक्यराज विजयादित्य द्वितीय ने आक्रमण कर अमोघवर्ष को गद्दी से उतार तक दिया। परंतु अमोघवर्ष भी साहस छोड़नेवाला व्यक्ति न था और करकराज की सहायता से उसने राष्ट्रकूटों का सिंहासन फिर स्वायत्त कर लिया। राष्ट्रकूटों की शक्ति फिर भी लौटी नहीं और उन्हें बार-बार चोट खानी पड़ी। अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र के अभिलेख से समकालीन भारतीय राजनीति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है, यद्यपि उसमें स्वयं उसकी विजयों का वर्णन अतिरंजित है। वास्तव में उसके युद्ध प्रायः उसके विपरीत ही गए थे। अमोघवर्ष धार्मिक और विद्याव्यसनी था, महालक्ष्मी का परम भक्त। इस अभिलेख के अनुसार एक बार उसने अपने बांये हाथ की उंगली काटकर देवी लक्ष्मी के चरणों में चढ़ा दी थी। उसकी तुलना शिव/ दधीची जैसे पौराणिक व्यक्तियों से भी की जाती है। जैनाचार्य के उपदेश से उसकी प्रवृत्ति जैन हो गईं थी। 'कविराजमार्ग' और 'प्रश्नोत्तररत्नमालिका' का वह रचयिता माना जाता है। उसी ने मान्यखेट राजधानी बनाई थी। अपने अंतिम दिनों में राजकार्य मंत्रियों और युवराज पर छोड़ वह विरक्त रहने लगा था। सम्भवतःउसकी मृत्यु 878 ई. में हुई।[1] सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ दक्षिण भारत में जैनधर्म (गूगल पुस्तक ; लेखक - कैलाशचन्द्र जैन) प्रमुख ऐतिहासिक जैन पुरुष और महिलाएँ (गूगल पुस्तक ; लेखक - ज्योतिप्रसाद जैन) History of Karnataka, Mr. Arthikaje अमोघवर्ष https://web.archive.org/web/20200928084016/http://www.jainglory.com/research/amoghvarsha 28 सितंबर 2020 (जैन ग्लोरी) श्रेणी:राष्ट्रकूट वंश श्रेणी:९वीं शताब्दी के भारतीय शासक श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:भारत के शासक