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रत्नहरि
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रत्नहरि वा रत्न सिंह (जन्म 1848 वि. सियालकोट) रीतिकाल के एक भक्त कवि थे जो उदासी सम्प्रदाय से थे।वे एक क्षत्रिय परिवार से थे। उनके पिता का नाम गुलाबसिंह और माता का नाम रामकुमारी था।वह पंजाब के प्रसिद्ध महाराजा रणजीत सिंह के समय के एक प्रसिद्ध व्यक्ति थे।वे अत्यंत स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी थे। इसका प्रमाण यह है कि महाराजा रणजीत सिंह द्वारा कई बार आमंत्रित किए जाने के बावजूद, उन्होंने अमृतसर छोड़कर लाहौर जाना स्वीकार नहीं किया। रत्नहरि रीतिकाल और आधुनिककाल की संधिवेला में पंजाब में हुए एक उच्च कोटि के भक्त कवि थे।
== साहित्यिक विशेषताएँ ==
इनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे लोकगीत शैली के बहुत करीब हैं। इनकी भाषा साधारण बोलचाल की ब्रजभाषा है, जो इसे जनमानस के लिए सुलभ बनाती है। रत्नहरि मुख्य रूप से एक रामभक्त कवि थे। उनकी अधिकांश कविताएँ रामभक्ति पर आधारित हैं। वे अपनी रचनाओं की शुरुआत (मंगलाचरण) में अपने आराध्य श्री राम का स्मरण करते हैं, जो उनके अनन्य भक्त होने का प्रमाण है। भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित 'उत्तरभक्तमाल' में भी इनका विवरण मिलता है, जो इनके महत्व को रेखांकित करता है।रामकथा को अपने मतानुसार ब्रज भाषा में कृतियों रघुवीर पद रत्नावली, रघुवीर लीला, विनय बाहरी (द्वादशी), राम रहस्य को लिखा। इन्होने 32 काव्यग्रंथों की रचना की है।
== सन्दर्भ ==