Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

आर्य समाज

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

Arya Samaj 2000 stamp of India.jpg सन २००० में आर्यसमाज को समर्पित एक डाकटिकट "कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"(विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाते चलो।) 1875 04 10 yes yमुम्बई) धार्मिक संगठन न्यास (Foundation) समाज सुधार, शैक्षिक, धार्मिक शिक्षा, अध्यात्म नई दिल्ली 26.4499 N 74.6399 E inline,title हिन्दी परोपकारिणी सभा भारतीय आर्य समाज 200px दयानन्द सरस्वती सम्पूर्ण विश्व में http://www.thearyasamaj.org आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आन्दोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने १८७५ में बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानन्द की प्रेरणा से की थी।http://hindi.webdunia.com/religion/religion/personality/0903/07/1090307025_2.htm आधुनिक भारत का रहस्य-1 7 फ़रवरी 2010 https://web.archive.org/web/20131228021928/http://hindi.webdunia.com/religion/religion/personality/0903/07/1090307025_2.htm 28 दिसंबर 2013 dead यह आन्दोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारम्भ हुआ था। आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अन्धविश्वासों को अस्वीकार करते थे। इसमें छुआछूत व जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। आर्य समाज का आदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम् , जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो। प्रसिद्ध आर्य समाजी जनों में स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द, महात्मा हंसराज, श्यामजी कृष्ण वर्मास्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक श्याम कृष्ण वर्मा लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, राम प्रसाद 'बिस्मिल', पंडित गुरुदत्त, स्वामी आनन्दबोध सरस्वती, चौधरी छोटूराम, चौधरी चरण सिंह, उदयवीर शास्त्री, पंडित वन्देमातरम रामचन्द्र राव, बाबा रामदेव स्‍वामी रामदेव के गुरु आचार्य बलदेव का देहान्त आदि आते हैं। इतिहास दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल सन् 1875 ई. (चैत्र शुक्ला पंचमी, शनिवार, सम्वत् १९३२ विक्रमी) को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। इससे पूर्व उन्होंने 6 या 7 सितम्बर, 1872 को वर्तमान बिहार प्रदेश के ‘आरा’ स्थान पर आगमन पर भी वहां आर्यसमाज स्थापित किया था। उपलब्ध इतिहास व जानकारी के अनुसार यह प्रथम आर्यसमाज था। परन्तु उसके एक-दो ही अधिवेशन हुए। स्वामी जी के आरा से चले जाने के पश्चात् थोड़े ही दिन में उसकी गतिविधियां बन्द हो गईं। स्वामी दयानन्द ने 31 दिसम्बर 1874 से 10 जनवरी 1875 तक राजकोट में प्रवास कर वैदिक धर्म का प्रचार किया। यहां जिस कैम्प की धर्मशाला में स्वामी ठहरे, वहां उन्होंने आठ व्याख्यान दिये जिनके विषय थे - ईश्वर, धर्मोदय, वेदों का अनादि और अपौरुषेय होना, पुनर्जन्म, विद्या-अविद्या, मुक्ति और बन्धन, आर्यों का इतिहास और कर्तव्य। यहां स्वामीजी ने पं० महीधर और जीवनराम शास्त्री से मूर्तिपूजा और वेदान्त-विषय पर शास्त्रार्थ भी किया। स्वामीजी का यहां राजाओं के पुत्रों की शिक्षा के काॅलेज, राजकुमार काॅलेज में एक व्याख्यान हुआ। उपदेश का विषय था ‘‘अंहिसा परमो धर्मः”। यहां स्कूल की ओर से स्वामीजी को प्रो. मैक्समूलर सम्पादित ऋग्वेद भेंट किया गया था। राजकोट में आर्यसमाज की स्थापना के विषय में पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय रचित महर्षि दयानन्द के जीवन चरित में निम्न विवरण प्राप्त होता है- https://www.pravakta.com/establishment-of-arya-samaj-anf-its-disciple/ आर्यसमाज की स्थापना और इसके नियमों पर एक दृष्टि 4 अप्रैल 2020 https://web.archive.org/web/20170731112639/http://www.pravakta.com/establishment-of-arya-samaj-anf-its-disciple/ 31 जुलाई 2017 live स्वामीजी ने यह प्रस्ताव किया कि राजकोट में आर्यसमाज स्थापित किया जाए और प्रार्थना समाज को ही आर्यसमाज में परिणत कर दिया जाए। प्रार्थना-समाज के सभी लोग इस प्रस्ताव से सहमत हो गये। वेद के निर्भ्रान्त होने पर किसी ने आपत्ति नहीं की। स्वामीजी के दीप्तिमय शरीर और तेजस्विनी वाणी का लोगों पर चुम्बक जैसा प्रभाव पड़ता था। वह सबको नतमस्तक कर देता था। आर्यसमाज स्थापित हो गया, मणिशंकर जटाशंकर और उनकी अनुपस्थियों में उत्तमराम निर्भयराम प्रधान का कार्य करने के लिए और हरगोविन्ददास द्वारकादास और नगीनदास ब्रजभूषणदास मन्त्री का कर्तव्य पालन करने के लिए नियत हुए। आर्यसमाज के नियमों के विषय में इस जीवन-चरित में लिखा है कि- "स्वामीजी ने आर्यसमाज के नियम बनाये, जो मुद्रित कर लिये गये। इनकी 300 प्रतियां तो स्वामीजी ने अहमदाबाद और मुम्बई में वितरण करने के लिए स्वयं रख लीं और शेष प्रतियां राजकोट और अन्य स्थानों में बांटने के लिए रख ली गई जो राजकोट में बांट दी र्गइं, शेष गुजरात, काठियावाड़ और उत्तरीय भारत के प्रधान नगरों में भेज दी गईं। उस समय स्वामी जी की यह सम्मति थी कि प्रधान आर्यसमाज अहमदाबाद और मुम्बई में रहें। आर्यसमाज के साप्ताहिक अधिवेशन प्रति रविवार को होने निश्चित हुए थे।" इसके बाद मुम्बई में 10 अप्रैल, सन् 1875 को आर्यसमाज की स्थापना हुई। इससे सम्बन्धित विवरण पं. लेखराम रचित महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र से प्रस्तुत है-"स्वामीजी के गुजरात की ओर चले जाने से आर्यसमाज की स्थापना का विचार जो बम्बई वालों के मन में उत्पन्न हुआ था, वह ढीला हो गया था। परन्तु स्वामी जी के पुनः आने से फिर बढ़ने लगा और अन्ततः यहां तक बढ़ा कि कुछ सज्जनों ने दृढ़ संकल्प कर लिया कि चाहे कुछ भी हो, बिना (आर्यसमाज) स्थापित किए हम नहीं रहेंगे। स्वामीजी के लौटकर आते ही फरवरी मास, सन् 1875 में गिरगांव के मोहल्ले में एक सार्वजनिक सभा करके स्वर्गवासी रावबहादुर दादू बा पांडुरंग जी की प्रधानता में नियमों पर विचार करने के लिए एक उपसभा नियत की गई। परन्तु उस सभा में भी कई एक लोगों ने अपना यह विचार प्रकट किया कि अभी समाज-स्थापन न होना चाहिये। ऐसा अन्तरंग विचार होने से वह प्रयत्न भी वैसा ही रहा (आर्यसमाज स्थापित नहीं हुआ)।"इसके बाद पण्डित लेखराम जी लिखते हैं, "और अन्त में जब कई एक भद्र पुरुषों को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब समाज की स्थापना होती ही नहीं, तब कुछ धर्मात्माओं ने मिलकर राजमान्य राज्य श्री पानाचन्द आनन्द जी पारेख को नियत किए हुए नियमों (राजकोट में निर्धारित 26 नियम) पर विचारने और उनको ठीक करने का काम सौंप दिया। फिर जब ठीक किए हुए नियम स्वामीजी ने स्वीकार कर लिए, तो उसके पश्चात् कुछ भद्र पुरुष, जो आर्यसमाज स्थापित करना चाहते थे और नियमों को बहुत पसन्द करते थे, लोकभय की चिन्ता न करके, आगे धर्म के क्षेत्र में आये और चैत्र सुदि 5 शनिवार, संवत् 1932, तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को शाम के समय, मोहल्ला गिरगांव में डाक्टर मानक जी के बागीचे में, श्री गिरधरलाल दयालदास कोठारी बी.ए., एल.एल.बी. की प्रधानता में एक सार्वजनिक सभा की गई और उसमें यह नियम (28 नियम) सुनाये गये और सर्वसम्मति से प्रमाणित हुए और उसी दिन से आर्यसमाज की स्थापना हो गई।" 28 नियमों के बाद पण्डित लेखराम लिखते हैं कि फिर अधिकारी नियत किये गए। तत्पश्चात् प्रति शनिवार सायंकाल की आर्यसमाज के अधिवेशन होने लगे, परन्तु कुछ मास के पश्चात् शनिवार का दिन सामाजिक पुरुषों के अनुकूल न होने से रविवार का दिन रखा गया, जो अब तक है। मुम्बई के बाद लाहौर में स्थापित आर्यसमाज का विशेष महत्त्व है। यहां न केवल महर्षि दयानन्द जी द्वारा आर्यसमाज की स्थापना ही की गई अपितु मुम्बई में जो 28 नियम स्वीकार किए गये थे उन्हें संक्षिप्त कर 10 नियमों में सीमित कर दिया गया और 8 सितम्बर, सन् 1877 को उन्हें विज्ञापित भी कर दिया गया। यह संक्षिप्त किये गये 10 नियम वर्तमान में भी प्रचलित हैं। पण्डित लेखराम ने स्वामी दयानन्द का विस्तृत जीवनचरित लिखा। सिद्धान्त आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ और प्रगतिशील। अतः आर्य समाज का अर्थ हुआ श्रेष्ठ और प्रगतिशीलों का समाज, जो वेदों के अनुकूल चलने का प्रयास करते हैं। दूसरों को उस पर चलने को प्रेरित करते हैं। आर्यसमाजियों के आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगिराज कृष्ण हैं। महर्षि दयानन्द ने उसी वेद मत को फिर से स्थापित करने के लिए आर्य समाज की नींव रखी। आर्य समाज के सब सिद्धांत और नियम वेदों पर आधारित हैं। आर्य समाज की मान्यताओं के अनुसार फलित ज्योतिष, जादू-टोना, जन्मपत्री, श्राद्ध, तर्पण, व्रत, भूत-प्रेत, देवी जागरण, मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा मनगढ़ंत हैं, वेद विरुद्ध हैं। आर्य समाज सच्चे ईश्वर की पूजा करने को कहता है, यह ईश्वर वायु और आकाश की तरह सर्वव्यापी है, वह अवतार नहीं लेता, वह सब मनुष्यों को उनके कर्मानुसार फल देता है, अगला जन्म देता है, उसका ध्यान घर में किसी भी एकांत में हो सकता है। thumb|450px|center|बालकों को यज्ञोपवीत-संस्कारित करने के उद्देश्य से बुलायी गयी बैठक इसके अनुसार दैनिक यज्ञ करना हर आर्य का कर्त्तव्य है। परमाणुओं को न कोई बना सकता है, न उसके टुकड़े ही हो सकते हैं। यानी वह अनादि काल से हैं। उसी तरह एक परमात्मा और हम जीवात्माएं भी अनादि काल से हैं। परमात्मा परमाणुओं को गति दे कर सृष्टि रचता है। आत्माओं को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। फिर चार ऋषियों के मन में २०,३७८ वेदमंत्रों का अर्थ सहित ज्ञान और अपना परिचय देता है। सत्यार्थ प्रकाश आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। अन्य माननीय ग्रंथ हैं - वेद, उपनिषद, षड् दर्शन, गीता व वाल्मीकि रामायण इत्यादि। महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में इन सबका सार दे दिया है। १८ घंटे समाधि में रहने वाले योगिराज दयानन्द ने लगभग आठ हजार किताबों का मंथन कर अद्भुत और क्रांतिकारी सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। मान्यताएँ ईश्वर का सर्वोत्तम और निज नाम ओम् है। उसमें अनन्त गुण होने के कारण उसके ब्रह्मा, महेश, विष्णु, गणेश, देवी, अग्नि, शनि आदि अनन्त नाम हैं। इनकी अलग-अलग नामों से मूर्ति पूजा ठीक नहीं है। आर्य समाज वर्णव्यवस्था यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र को कर्म से मानता है, जन्म से नहीं। आर्य समाज स्वदेशी, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वधर्म का पोषक है। आर्य समाज सृष्टि की उत्पत्ति का समय चार अरब ३२ करोड़ वर्ष और इतना ही समय प्रलय काल का मानता है। योग से प्राप्त मुक्ति का समय वेदों के अनुसार ३१ नील १० खरब ४० अरब यानी एक परांत काल मानता है। आर्य समाज, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' को मानता है, लेकिन भूमंडलीकरण को देश, समाज और संस्कृति के लिए घातक मानता है। आर्य समाज वैदिक समाज रचना के निर्माण व आर्य चक्रवर्ती राज्य स्थापित करने के लिए प्रयासरत है। इससमाज में मांस, अंडे, बीड़ी, सिगरेट, शराब, चाय, मिर्च-मसाले आदि वेद-विरुद्ध होते हैं। आर्य समाज के दस नियम thumb|आर्यसमाज मंदिर का हवन-कक्ष (१) सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है। (२) ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है। (३) वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना–पढ़ाना और सुनना–सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। (४) सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। (५) सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए। (६) संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। (७) सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये। (८) अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। (९) प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। (१०) सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में स्वतंत्र रना चाहिए। आर्यसमाज का योगदान आर्य समाज शिक्षा, समाज-सुधार एवं राष्ट्रीयता का आन्दोलन था। भारत के ८५ प्रतिशत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आर्य समाज ने पैदा किया। स्वदेशी आन्दोलन का मूल सूत्रधार आर्यसमाज ही है।http://indorearyasamaj.com/2016/09/19/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AF%E0%A5%8B/ आर्यसमाज का राष्ट्र को योगदान 22 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20180422203828/http://indorearyasamaj.com/2016/09/19/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AF%E0%A5%8B/ 22 अप्रैल 2018 dead आर्य समाज का विस्तार स्वामी जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया।http://hindi.webdunia.com/religion/religion/personality/0903/07/1090307025_2.htm आधुनिक भारत का रहस्य-1 7 फ़रवरी 2010 https://web.archive.org/web/20131228021928/http://hindi.webdunia.com/religion/religion/personality/0903/07/1090307025_2.htm 28 दिसंबर 2013 dead आज विदेशों तथा योग जगत में नमस्ते शब्द का प्रयोग बहुत साधारण बात है। एक जमाने में इसका प्रचलन नहीं था - हिन्दू लोग भी ऐसा नहीं करते थे। आर्यसमाजियो ने एक-दूसरे को अभिवादन करने का ये तरीका प्रचलित किया। ये अब भारतीयों की पहचान बन चुका है। स्वामी दयानन्द ने हिंदी भाषा में सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक तथा अनेक वेदभाष्यों की रचना की। वस्तुतः आर्यसमाजियों द्वारा की गयी हिन्दी-सेवा अद्वितीय है। सन् १८८६ में लाहौर में स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज ने दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी। सन् १९०१ में स्वामी श्रद्धानन्द ने कांगड़ी में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की। अनेक आर्यसमाजी विदेशों में जाकर हिन्दुओं में हिन्दी भाषा एवं स्वातंत्र्य-चेतना का प्रसार किया। आर्यसमाज ने भारत को संस्कृत, हिन्दी, इतिहास, विज्ञान और अन्यान्य विषयों के हजारों उत्कृष्ट विद्वान दिये। आर्यसमाज ने विधवा विवाह का प्रावधान किया और आर्यों ने अपने घर में विधवा बहुएँ ला करके उदाहरण प्रस्तुत किया।आर्यसमाज द्वारा किये गये १५० ऐतिहासिक कार्य वेलेन्टाइन शिरोल (Valentine Chirole) नामक एक अंग्रेज ने 'इंडियन अनरेस्ट' (indian unrest) नामक अपनी पुस्तक में तो सत्यार्थ प्रकाश को 'ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें खोखली करने वाला' और दयानन्द सरस्वती को 'भारतीय अशांति का जन्मदाता' बताया है।https://www.pratiyogitatoday.com/2023/11/swami-dayanand-saraswati-arya-samaj.html स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज Mahender Kumar October 2023 Pratiyogita Today https://web.archive.org/web/20240114080109/https://www.pratiyogitatoday.com/2023/11/swami-dayanand-saraswati-arya-samaj.html 14 जनवरी 2024 dead आर्य समाज और भारत का नवजागरण आर्य समाज ने भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इसके अनुयायियों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ-चढ कर भाग लिया। आर्य समाज के प्रभाव से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ हुआ था। स्वामीजी आधुनिक भारत के धार्मिक नेताओं में प्रथम महापुरूष थे जिन्होने 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया। आर्य समाज ने हिन्दू धर्म में एक नयी चेतना का आरंभ किया था। स्वतंत्रता पूर्व काल में हिंदू समाज के नवजागरण और पुनरुत्थान आंदोलन के रूप में आर्य समाज सर्वाधिक शक्तिशाली आन्दोलन था। यह पूरे पश्चिम और उत्तर भारत में सक्रिय था तथा सुप्त हिन्दू जाति को जागृत करने में संलग्न था। यहाँ तक कि आर्य समाजी प्रचारक फिजी, मारीशस, गयाना, ट्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका में भी हिंदुओं को संगठित करने के उद्देश्य से पहुँच रहे थे। आर्य समाजियों ने सबसे बड़ा कार्य जाति व्यवस्था को तोड़ने और सभी हिन्दुओं में समानता का भाव जागृत करने का किया। भारतीय स्वतंत्रता का सशस्त्र आन्दोलन सन् 1857 के पश्चात की क्रांति के जन्मदाता महर्षि दयानन्द सरस्वती और उनके शिष्य श्याम जी कृष्ण वर्मा (जो क्रांतिकारियों के गुरु थे), प्रसिद्ध क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, भाई परमानन्द, सेनापति बापट, मदनलाल ढींगरा, रामप्रसाद बिस्मिल, गोपालकृष्ण गोखले, सरदार भगत सिंह इत्यादि शिष्यों ने स्वाधीनता आन्दोलन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इंग्लैण्ड में भारत के लिए जितनी क्रांति हुई वह श्याम जी कृष्ण वर्मा के ‘‘इण्डिया हाउस’’ से ही हुई। सरदार भगत सिंह तो जन्म से ही आर्य समाजी थे। इनके दादा सरदार अर्जुन सिंह विशुद्ध आर्य समाजी थे और इनके पिता श्री किशन सिंह भी आर्य समाजी थे। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता थे। http://www.aryasamajonline.co.in/index.php/arya-samaj/22-freedom स्वतंत्रता संग्राम में आर्यसमाज का योगदान 4 अप्रैल 2020 https://web.archive.org/web/20180416123255/http://www.aryasamajonline.co.in/index.php/arya-samaj/22-freedom 16 अप्रैल 2018 dead http://aryapratinidhisabha.org/AryaMaryada_23_1608_1908.pdf बलिदान देने वाले कुछ आर्य शहीदों के संक्षिप्त परिचय 26 जनवरी 2021 31 जनवरी 2021 https://web.archive.org/web/20210131095536/http://aryapratinidhisabha.org/AryaMaryada_23_1608_1908.pdf dead समाज सुधार भारत को जिस तरह ब्रिटिश सरकार का आर्थिक उपनिवेश और बाद में राजनीतिक उपनिवेश बना दिया गया था, उसके विरूद्ध भारतीयों की ओर से तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। चूंकि भारत धीरे-धीरे पश्चिमी विचारों की ओर बढ़ने लगा था, अतः प्रतिक्रिया सामाजिक क्षेत्र से आना स्वाभाविक कार्य थी। यह प्रतिक्रिया १९वीं शताब्दी में उठ खड़े हुए सामाजिक सुधार आन्दोलनों के रूप में सामने आई। ऐसे ही समाज सुधार आंदोलनों में आर्यसमाज का नाम आता है। आर्यसमाज ने विदेशी जुआ उतार फेंकने के लिए, समाज में स्वयं आंतरिक सुधार करके अपना कार्य किया। इसने आधुनिक भारत में प्रारम्भ हुए पुर्नजागरण को नई दिशा दी। साथ ही भारतीयों में भारतीयता को अपनाने, प्राचीन संस्कृति को मौलिक रूप में स्वीकार करने, पश्चिमी प्रभाव को विशुद्ध भारतीयता यानी 'वेदों की ओर लौटो' के नारे के साथ समाप्त करने तथा सभी भारतीयों को एकताबद्ध करने के लिए प्रेरित किया। १९वीं शताब्दी में भारत में समाज सुधार के आंदोलनों में आर्यसमाज अग्रणी था। हरिजनों के उद्धार में सबसे पहला कदम आर्यसमाज ने उठाया, लड़कियों की शिक्षा की जरूरत सबसे पहले उसने समझी। वर्ण व्यवस्था को जन्मगत न मानकर कर्मगत सिद्ध करने का सेहरा उसके सिर है।http://www.aryasamajmpcg.com/index.php/arya-samaj/151-2014-09-07-05-53-27 आर्यसमाज का योगदान 17 अप्रैल 2021 17 अप्रैल 2021 https://web.archive.org/web/20210417180225/http://www.aryasamajmpcg.com/index.php/arya-samaj/151-2014-09-07-05-53-27 dead जातिभेद भाव और खानपान के छूतछात और चौके-चूल्हे की बाधाओं को मिटाने का गौरव उसी को प्राप्त है। अन्धविश्वास और धर्म के नाम पर किये जाने वाले हजारों अनाचारों कब्र उसी ने खोदी। १८७५ में स्थापना के शीघ्र बाद ही इसकी प्रसिद्धि तत्कालीन समाज विचारकों, आचार्यों, समाज सुधारकों आदि को प्रभावित करने में सफल हुई, और कुछ वर्षों बाद ही आर्यसमाज की सम्पूर्ण भारत के प्रमुख शहरों में शाखायें स्थापित हो गईं। स्वामीजी के विद्वतापूर्ण व्याख्यानों तथा चमत्कारिक व्यक्तित्व ने युवाओं को आर्यसमाज की ओर मोड़ा। अन्य समकालीन सामाजिक धार्मिक आंदोलनों की अपेक्षा आर्यसमाज सही अर्था में अधिक राष्ट्रवादी था। यह भारत में पनप रहे पश्चिमीकरण के विरूद्ध अधिक आक्रमणकारी स्वभाव रखने वाला आंदोलन था। आर्य समाज ने अपनी स्थापना से ही सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध आन्दोलन का शंखनाद किया, जैसे- जातिवादी जड़मूलक समाज को तोड़ना, महिलाओं के लिए समानाधिकार, बालविवाह का उन्मूलन, विधवा विवाह का समर्थन, निम्न जातियों को सामाजिक अधिकार प्राप्त होना आदि। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना के पीछे उपर्युक्त सामाजिक नवजागरण को मुख्य आधार बनाया। उनका विश्वास था कि नवीन प्रबुद्ध भारत में, नवजागृत होते समाज में, नये भारत का निर्माण करना है तो समाज को बन्धनमुक्त करना प्रथम कार्य होना चाहिए। स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी स्वामी जी ने ब्राह्मणों की सत्ता के खण्डन का प्रतिपादन किया और धार्मिक अंधविश्वास व कर्मकाण्डों की तीव्र भर्त्सना की। अल्पकाल में ही वे भारत के समाज सुधार के क्षेत्र में नवीन ज्ञान-ज्योति के रूप में उदयीमान हुए। इसमें उन्होनें पाया कि भारतीय युवा पाश्चात्य अनुकरण पर जोर दे रहा है। अतः उन्होनें पाश्चात्य संस्कृति पर शक्तिशाली प्रहार किया और भारतीय गौरव को सदैव ऊंचा किया। सामान्यतः स्वामीजी ने भारतीय समाज तथा हिन्दूधर्म में प्रचालित दोषों को उजागर करने के साथ ही आंचलिक पंथों और अन्य धर्मो की भी आलोचना की। पुरोहितवाद पर करारा प्रहार करते हुए स्वामीजी ने माना था कि स्वार्थों और अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों जैसे ग्रंथो का सहारा लेकर हिन्दू धर्म का भ्रष्ट किया है। स्वामी जी धर्म सुधारक के रूप में मूर्तिपूजा, कर्मकाण्ड, पुराणपंथी, तन्त्रवाद के घोर विरोधी थे। इसके लिए उन्होने वेदों का सहारा लेकर विभिन्न दृष्टांत किए। इससे इन्होंने सुसुप्त भारतीय जनमानस को चेतन्य करने का अदभुत प्रयास किया। स्वामी जी ने हिन्दुओं को हीन, पतित और कायर होने के भाव से मुक्त किया और उनमें उत्कट आत्मविश्वास जागृत किया। फलस्वरूप समाज पश्चिम की मानसिक दासता के विरुद्ध दृढ़ आत्मविश्वास तथा संकल्प के साथ विद्रोह कर सके। इन्ही कारणों से वेलेंटाइन शिरोल नामक अंग्रेज ने 'इण्डियन अरनेस्ट' नामक अपने ग्रन्थ में स्वामीजी को 'भारतीय अशान्ति का जनक' कहा है। शिक्षा का प्रसार देखिये, दयानंद एंग्लो वैदिक विद्यालय, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय स्वामी दयानन्द के मूलमन्त्र था कि जनता का विकास और प्रगति सुनिश्चित करने और उनके अस्तित्व की रक्षा करने का सर्वोत्तम साधन शिक्षा है। इसी मन्त्र को गाँठ में बाँध कर आर्यसमाज ने कार्य किया। आर्यसमाज ने इस तथ्य को आत्मसात कर लिया था कि शिक्षा की जड़ें राष्ट्रीय भावना और परम्परा में गहरी जमी होनी चाहिये। हम एक प्राचीन और श्रेष्ठ परम्परा के उत्तराधिकारी हैं। हमारी शिक्षा में भारतीय नीतिशास्त्र और दर्शन को सर्वोपरि स्थान प्राप्त होगा। 1892-1893 ई. में आर्य समाज में दो भागों में विभाजित हो गई। उसके बाद दो दलों में से एक ने पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन किया। इस दल में लाला हंसराज और लाला लाजपत राय प्रमुख नेता थे। इन्होंने 'दयानन्द एंग्लो-वैदिक कॉलेज' की स्थापना की। दूसरे दल ने पाश्चात्य शिक्षा का विरोध किया और इसके नेता स्वामी श्रद्धानन्द जी ने 1902 ई. में हरिद्वार (कांगड़ी) में एक गुरुकुल की स्थापना की। इस संस्था में वैदिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से दी जाती थी। आज भी २०० से अधिक गुरुकुल संचालित हैं आर्यसमाज और गुरुकुल दक्षिण भारत में आर्यसमाज का योगदान https://web.archive.org/web/20240902221332/https://aryamantavya.in/contribution-of-arya-samaj-in-south-india-2/ 2 सितंबर 2024 (डॉ. ब्रह्ममुनि) जिसमें ज्वालापुर, देहरादून, मेरठ, झज्जर, पौन्धा (श्रीमद् दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुलम् पौन्धा, देहरादून ), लुधियाना, सुन्दरगढ़ (उड़ीसा) आदि स्थानों के गुरुकुल विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शिक्षा के क्षेत्र में गुरुकुल व डीएवी कालेज स्थापित कर शिक्षा जगत में आर्यसमाज ने अग्रणी भूमिका निभाई। स्त्रीशिक्षा में आर्यसमाज का उल्लेखनीय योगदान रहा। 1885 के प्रारम्भ तक आर्यसमाज की अमृतसर शाखा ने दो महिला विद्यालयों की स्थापना की घोषणा की थी तथा तीसरा कटरा डुला में प्रस्तावित था। 1880 के दौरान लाहौर आर्यसमाज महिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना हुआ था। 1889 ई0 में फिरोजपुर आर्यसमाज ने एक कन्या विद्यालय स्थापित किया था। हिन्दी-सेवा आर्य समाज से जुड़े लोग भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम के साथ-साथ भारत की संस्कृति, भाषा, धर्म, शिक्षा आदि के क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुड़े रहे। स्वामी दयानन्द की मातृभाषा गुजराती थी और उनका संस्कृत का ज्ञान बहुत अच्छा था, किन्तु केशव चन्द्र सेन के सलाह पर उन्होने सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी में की। दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिन्दी में रचकर हिन्दी को एक प्रतिष्ठा दी। आर्यसमाज ने हिन्दी को 'अर्यभाषा' कहा और सभी आर्यसमाजियों के लिये इसका ज्ञान आवश्यक बताया। दयानन्द जी वेदों का की व्याख्या संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में भी की। स्वामी श्रद्धानन्द ने हानि उठाकर भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी में किया जबकि उनका प्रकाशन पहले उर्दू में होता था।http://aryasamajmandirpune.blogspot.in/2013/11/blog-post_4155.html स्वामी दयानंद और आर्यसमाज की हिंदी भाषा को देन 18 जुलाई 2014 https://web.archive.org/web/20140726135326/http://aryasamajmandirpune.blogspot.in/2013/11/blog-post_4155.html 26 जुलाई 2014 dead आर्यसमाज हिन्दी के सम्वर्द्धन के मैदान में अग्रगामी बना। सैकड़ों गुरुकुलों, डीएवी स्कूल और कॉलेजों में हिंदी भाषा को प्राथमिकता दी गई और इस कार्य के लिए नवीन पाठ्यक्रम की पुस्तकों की रचना हिंदी भाषा के माध्यम से गुरुकुल कांगड़ी एवं लाहौर आदि स्थानों पर हुई जिनके विषय विज्ञान, गणित, समाज शास्त्र, इतिहास आदि थे। यह एक अलग ही किस्म का हिन्दी भाषा में परीक्षण था जिसके वांछनीय परिणाम निकले।https://www.pravakta.com/role-of-rishi-dayanand-in-spread-of-hindi/ आर्यभाषा हिन्दी के प्रचार व प्रसार में ऋषि दयानन्द का योगदान 18 मई 2018 https://web.archive.org/web/20180518200420/https://www.pravakta.com/role-of-rishi-dayanand-in-spread-of-hindi/ 18 मई 2018 live विदेशों में भवानी दयाल सन्यासी, भाई परमानन्द, गंगाप्रसाद उपाध्याय, डॉ. चिरंजीव भारद्वाज, मेहता जैमिनी, आचार्य रामदेव, पंडित चमूपति आदि ने हिंदी भाषा का प्रवासी भारतीयों में प्रचार किया जिससे वे मातृभूमि से दूर होते हुए भी उसकी संस्कृति, उसकी विचारधारा से न केवल जुड़े रहे अपितु अपनी विदेश में जन्मी सन्तति को भी उससे अवगत करवाते रहे। आर्यसमाज द्वारा न केवल पंजाब में हिंदी भाषा का प्रचार किया गया अपितु सुदूर दक्षिण भारत में, असम, बर्मा आदि तक हिंदी को पहुँचाया गया। न्यायालय में दुष्कर भाषा के स्थान पर सरल हिंदी भाषा के प्रयोग के लिए भी स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा प्रयास किये गये थे।“ऋषि दयानन्द द्वारा हिन्दी अपनाने से इसका देश देशान्तर में प्रचार हुआ” आर्य समाज की हिन्दी पत्रकारिता आर्यसमाज : हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम कलश ने देश को राष्ट्रीय संस्कृति, धर्मचिन्तन, स्वदेशी का पाठ पढ़ाया। आर्यसमाज के माध्यम से ज्ञानमूलक व रसात्मक दोनों प्रकार से साहित्य की अभूतपूर्व वृद्धि हुई। स्वामी दयानन्द पत्रकारिता द्वारा धर्म प्रचार व्यापक रूप से करना चाहते थे। वे स्वयं कोई पत्र नहीं निकाल सके परन्तु आर्य समाजियों को पत्र-पत्रिकाएँ निकालने के लिए प्रोत्साहित किया। आर्य समाज की विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रसारित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में ‘पवमान’, ‘आत्म शुद्धि पथ’, ‘वैदिक गर्जना’, ‘आर्य संकल्प’, ‘वैदिक रवि’, ‘विश्वज्योति’, ‘सत्यार्थ सौरभ’, ‘दयानन्द सन्देश’, ‘महर्षि दयानन्द स्मृति प्रकाश’, ‘तपोभूमि’, ‘नूतन निष्काम पत्रिका’, ‘आर्य प्रेरणा’ , ‘आर्य संसार’, ‘सुधारक’, ‘टंकारा समाचार’, ‘अग्निदूत’, ‘आर्य सेवक’, ‘भारतोदय’, ‘आर्य मुसाफिर’, ‘आर्य सन्देश’, ‘आर्य मर्यादा’, ‘आर्य जगत’, ‘आर्य मित्र’, ‘आर्य प्रतिनिधि’, ‘आर्य मार्तण्ड’, ‘आर्य जीवन’, ‘परोपकारी’, ‘सम्वर्द्धिनी’ आदि मासिक, पाक्षिक व वार्षिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं जिससे हिन्दी पत्रकारिता को नव्य आलोक मिल रहा है।https://www.researchgate.net/publication/310464112_Arya_Samaj_Golden_Pot_of_Hindi_Journalism आर्यसमाज : हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम कलश 22 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20180422202804/https://www.researchgate.net/publication/310464112_Arya_Samaj_Golden_Pot_of_Hindi_Journalism 22 अप्रैल 2018 live आर्यसमाज के प्रचार की भाषा हिन्दी ही रही। आर्य समाज ने हिन्दी पत्रकारिता के उन्नयन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। विद्वानों की पूर्ति आर्यसमाज ने भारत को संस्कृत, हिन्दी, समाजविज्ञान, इतिहास, विज्ञान के हजारों विद्वान दिए। इनमें महाशय चिरंजीलाल 'प्रेम', युधिष्ठिर मीमांसक, ब्रह्मदत्त 'जिज्ञासु', पण्डित लेखराम आर्य, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय, आचार्य रामदेव, स्वामी सोमदेव, गुरुदत्त विद्यार्थी, सत्यकेतु विद्यालंकार, गुरुदत्त, पद्मसिंह शर्मा, यशपाल, क्षेम चंद 'सुमन', जयचन्द विद्यालंकार, अत्रिदेव विद्यालंकार, पंडित आर्यमुनि, सत्यप्रकाश सरस्वती, राजवीर शास्त्री, इन्द्र विद्यावाचस्पति, डॉ फतह सिंह, बुद्धदेव विद्यालंकार, शांति प्रकाश, ओम आनन्द सरस्वती, राम नारायण आर्य, महात्मा आनन्द स्वामी, स्वामी इन्द्रवेश, आचार्य सोमदेव शास्त्री, उदयवीर शास्त्री, स्वामी आनन्दबोध, आचार्य धर्मवीर, राजेन्द्र जिज्ञासु आदि आते हैं। रामचन्द्र देहलवी, ठाकुर अमरसिंह, बुद्धदेव मीरपुरी, गंगाप्रसाद उपाध्याय, पंडित तुलसी स्वामी, पंडित गणपति शर्मा, रामदयालु शर्मा, पंडित भगवान स्वरूप, पण्डित देवदत्त शर्मा, लक्ष्मीदत्त आर्यमुसाफिर, शुक्रराज शास्त्री, सत्यमित्र शास्त्री, मनसाराम वैदिक तोप, आत्माराम अमृतसरी, ठाकुर प्रसाद शास्त्री, लोकनाथ तर्कवाचस्पति, शिवशंकर शर्मा,महान विद्वान पं. शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ का प्ररेणादायक साहित्य गोपाल पत्रकार, चन्द्रमणि, राजाराम शास्त्री, विश्वबंधु शास्त्री, भगवद्दत्त रिसर्चस्कॉलर, स्वामी ब्रह्ममुनि, रामलाल, ओमप्रकाश शास्त्री, मुन्शीराम, हंसराज, श्री राम आर्य, जे. पी. चौधरी, पं. वेद भूषण, मुन्शी इंद्रमणि आदि प्रसिद्ध आर्यसमाजी शास्त्रार्थकर्ता थे। आर्य समाज का संगठन कम से कम नौ सभासदों का एक समाज होता है। प्रत्येक सभासद को अपनी आय का सौवां भाग (एक सौ रूपये पर एक रूपया) चन्दे में देना चाहिये। शतांश चन्दा न देने वाले तथा सदाचार से न रहने वाले व्यक्ति सभासदी से पृथक किये जा सकते हैं। प्रान्त के समाजों को संगठित करने के लिये प्रान्तीय प्रतिनिधि सभायें हैं जिनमें प्रत्येक समाज के प्रतिनिधि जाते हैं। प्रतिनिधि भेजने का नियम है कि प्रति ३५ सभासद या किसी विशेष काम के लिये एक प्रतिनिधि भेजा जाता है। प्रान्तीय प्रतिनिधि सभा के प्रबन्ध के लिये एक अन्तरंग सभा होती है। प्रतिनिधि सभाओं द्वारा चुने हुए सभासदों की सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभा है जिसका स्थान दिल्ली में है।आर्य समाज क्या है ? संसार भर के आर्यसमाजों की संख्या २५०० है। प्रचारकों की संख्या लगभग १००० के करीब है। भारत के अतिरिक्त पूर्वी तथा दक्षिणी, अफ्रीका, मारिशस, फिजी, ब्रिटिश, और डच गायना तथा दक्षिणी अमेरिका, ट्रिनिडाड आदि में बहुत आर्य समाज हैं और सार्वदेशिक आर्यप्रतिनिधिसभा के साथ सम्बद्ध आर्यप्रतिनिधिसभायें भी इन प्रदेशों में स्थापित हो गई हैं। कई आर्य प्रचारक आर्यसंस्कृति, धर्म प्रचार, हिन्दी-प्रचार आदि के कार्यों में लगे हुए हैं। आर्यसमाज की सार्द्ध शताब्दी आर्य समाज के प्रणेता महर्षि दयानन्द सरस्वती की 200वीं जयंती एवं आर्य समाज स्थापना के 150 वर्ष पूर्ण होने के पावन उपलक्ष्य में सन २०२५ एक ऐतिहासिक एवं भव्य आयोजन किया गया। यह महासम्मेलन 30 अक्टूबर से 2 नवंबर 2025 (कार्तिक, शुक्ल पक्ष ८-९-१०-११ वि.२०८२ ) को नई दिल्ली में आयोजित हुआ इसमें न केवल भारत के कोने-कोने से बल्कि विश्व के विभिन्न देशों से आर्यजन, विद्वान, समाजसेवी, युवा एवं श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लिये। महर्षि दयानन्द के जीवन, योगदान एवं विचारों पर वैश्विक विद्वानों के व्याख्यान, आर्य समाज के 150 वर्षों की यात्रा का चित्रात्मक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शन, वैदिक यज्ञ, संस्कार, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शृंखला, आर्यवीर दल के युवा वीरों का प्रदर्शन एवं वीरता प्रशिक्षण, महर्षि दयानन्द स्मृति ग्रंथों, शोध-पत्रों व साहित्य का विमोचन, अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों द्वारा आर्य समाज के विश्वव्यापी प्रभाव पर प्रस्तुति तथा आर्य समाज की शाखाओं, संगठनों व संस्थानों का परिचय व योगदान आदि इस समारोह के मुख्य आकर्षण रहे। महासम्मेलन के अवसर पर एक पुस्तक बाजार का आयोजन भी हुआ जिसमें वैदिक साहित्य, आयुर्वेदिक औषधियाँ, आध्यात्मिक ग्रंथ, शिक्षा एवं संस्कार साहित्य आदि के 200 से अधिक स्टॉल स्थापित किए गये थे। सन्दर्भ इन्हें भी देखें आर्य आर्यसमाज दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश भारतीय राष्ट्रवाद दक्षिण अफ्रीका में आर्य समाज फीजी में आर्य समाज गयाना में आर्य समाज बर्मा में आर्य समाज युगाण्डा में आर्य समाज मोजाम्बीक में आर्य समाज थाईलैंड में आर्य समाज सूरीनाम में आर्य समाज त्रिनिदाद और टोबैगो में आर्य समाज वाह्य सम्पर्क सूत्र स्वामी_दयानंद_सरस्वती आर्य समाज आर्य समाज की आधिकारिक वेबसाइट महर्षि दयानन्द सरस्वती साहित्य कोष https://web.archive.org/web/20221120100505/http://vedickosh.com/index.html 20 नवंबर 2022 आर्यसमाज : एक वैश्विक धार्मिक सामाजिक संस्था आर्य समाज की पत्र पत्रिकाएँ आर्य समाज के स्तम्भ आर्य मंतव्य - यहाँ आर्यसमाज के मनीषियों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर बहुत सारी सामग्री उपलब्ध है। श्रेणी:हिन्दू धर्म सुधार आन्दोलन श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना