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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

प्रमुद्य अनंता तुर

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प्रमुद्य अनंता तुर Pramoedya Ananta Toer Kesusastraan Indonesia Modern dalam Kritik dan Essai 1 (1962) p136.jpg प्रमोद्या का चित्र Pramoedya, 1955 1925 2 6 y ब्लोरा, डच ईस्ट इंडीज 2006 04 30 1925 2 6 y जकार्ता, इंडोनेशिया Novelist essayist बुरु चौकड़ी मानव जाति की यह धरती सभी राष्ट्रों का बच्चा फ़ुटस्टेप्स कांच का घर अरवाह इल्यास 1950 1954 div. मेमुना थमरीन 1955 2006 d. Signature of Pramoedya Ananta Toer.svg प्रमुद्य अनंता तुर (इंडोनेशियाई संशोधित वर्तनी: Pramudya Ananta Tur) (6 फ़रवरी 1925 - 30 अप्रैल 2006), जिन्हें प्रम भी कहा जाता है, एक इंडोनेशियाई उपन्यासकार और लेखक थे।https://nasional.kompas.com/read/2019/08/14/05300001/pram-dan-pulau-buru-tempat-lahirnya-bumi-manusia Pram dan Pulau Buru, Tempat Lahirnya Bumi Manusia ज़ुल्फ़ारोह अहमद नौफ़ल 14 अगस्त 2019 Kompas 1 अप्रैल 2023 प्रैम और बुरु द्वीप, मानव जाति की इस धरती का जन्मस्थान   उनके साहित्यिक रचनाएँ वलंदेज़ी उपनिवेशकाल के दौर, इंडोनेशिया की स्वतंत्रता संग्राम, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के अधीन कब्ज़ा, तथा स्वतंत्रता के बाद सुकर्णो और सुहार्तो की अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाओं तक फैली हुई हैं, और इनमें व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय इतिहास की गहरी छाप समाई हुई है। प्रमुद्य की रचनाएँ कभी-कभी औपनिवेशिक शासन और बाद में सत्ता में आई स्वदेशी अधिनायकवादी सरकारों की नज़रों में अप्रिय हो जाती थीं। सुधार-पूर्व युग (प्री-रिफ़ॉर्मासी काल) के दौरान, भले ही वे इंडोनेशिया के बाहर अच्छी तरह से प्रसिद्ध थे, फिर भी उन्हें इंडोनेशिया में अभिवेचन का सामना करना पड़ा। वलंदेज़ अधिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1947 से 1949 तक उन्हें कारावास में रखा। सुहार्तो शासन के संक्रमण काल के दौरान, वह राजनीतिक परिवर्तन और सत्ता संघर्ष की बदलती लहरों में उलझ गए। सुहार्तो ने उन्हें 1969 से 1979 तक मालुकू द्वीपसमूह के बूरू द्वीप पर कारावास में रखा और उन्हें कम्युनिस्ट घोषित कर दिया। पूर्ववर्ती शासन से संघर्ष करने के बावजूद, उन्हें उसी शासन का अवशेष मान लिया गया। बूरू द्वीप पर ही उन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध कृति, बूरू क्वार्टेट, की रचना की थी। लेखन सामग्री तक पहुँच की अनुमति न होने के कारण, उन्होंने यह कथा अन्य बंदियों को मौखिक रूप से सुनाई, जिसे बाद में लिपिबद्ध कर छुपाकर बाहर भेजा गया। प्रमुद्य ने संस्थापक राष्ट्रपति सुकर्णो की कुछ नीतियों का विरोध किया, साथ ही सुकर्णो के उत्तराधिकारी सुहार्तो की नई व्यवस्था (न्यू ऑर्डर) शासन का भी विरोध किया। उनकी रचनाओं में राजनीतिक आलोचना प्रायः सूक्ष्म रूप में होती थी, यद्यपि वे उपनिवेशवाद, नस्लवाद, और नई इंडोनेशियाई सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुखर थे। जिन अनेक वर्षों तक उन्होंने कारावास और नजरबंदी (बूरू में कारावास के बाद जकार्ता में) की यातना सही, उन दिनों वे मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर लोगों के लिए एक प्रतिष्ठित प्रतीक बन गए। प्रारंभिक वर्ष प्रमुद्य का जन्म 6 फ़रवरी 1925 को जावा के हृदयस्थल में स्थित ब्लोरा नामक नगर में हुआ था, जो उस समय डच ईस्ट इंडीज़ का हिस्सा था।Encyclopedia of the Novel Gogwilt Chris 1998 Fitzroy Dearborn Schellinger Paul Chicago, London PRAMOEDYA ANANTA TOER 1925- (INDONESIAN) वह अपने परिवार में प्रथम पुत्र थे; उनके पिता एक शिक्षक थे, जो बुदि उत्तमो (इंडोनेशिया का पहला मान्यता प्राप्त स्वदेशी राष्ट्रीय संगठन) में भी सक्रिय थे, और उनकी माता एक चावल व्यवसायी थीं। उनके नाना ने मक्का की हज यात्रा की थी।https://archive.org/details/historyofmoderni00adri/page/53 A History of Modern Indonesia विकर्स एड्रियन 2005 Cambridge University Press 0-521-54262-6 New York 53 registration जैसा कि उनकी अर्ध-आत्मकथात्मक लघु कथा-संग्रह "चरिता दरि ब्लोरा" में लिखा गया है, उनका नाम मूल रूप से प्रमुद्य अनंता मास-तुर था। हालाँकि, उन्हें लगा कि पारिवारिक उपनाम मास-तुर (जो उनके पिता का नाम था) कुछ अधिक अभिजात्य प्रतीत होता है। जावानी उपसर्ग "मास" किसी कुलीन परिवार के उच्च पद वाले पुरुष को सूचित करता है। नतीजतन, उन्होंने "मास" को हटा दिया और "तुर" को अपना पारिवारिक नाम बनाए रखा। वह सुराभया में रेडियो व्यावसायिक विद्यालय में पढ़ाई करने गए, लेकिन अभी वह विद्यालय से ठीक से स्नातक भी नहीं हो पाए थे कि 1942 में जापान ने सुराभया पर आक्रमण कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, प्रमुद्य ने (कई अन्य इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों की तरह, जिनमें सुकर्णो और सुहार्तो भी शामिल थे) प्रारंभ में साम्राज्यवादी जापान की कब्ज़ा करने वाली सेना का समर्थन किया। उन्हें विश्वास था कि डचों की तुलना में जापानी अपेक्षाकृत कम बुरे हैं। उन्होंने जकार्ता में एक जापानी समाचारपत्र के लिए टाइपिस्ट के रूप में कार्य किया। हालाँकि, जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, इंडोनेशियाई लोग युद्धकालीन राशन प्रणाली की कठोरता और जापानी सैन्य बलों द्वारा अपनाए गए अत्यधिक कठोर उपायों से निराश हो गए। सुकर्णो के प्रति निष्ठावान राष्ट्रवादी बलों ने जापान के विरुद्ध आने वाले मित्र राष्ट्रों का समर्थन करना शुरू कर दिया; सभी संकेत यही दर्शाते हैं कि प्रमुद्य ने भी ऐसा ही किया। 17 अगस्त 1945 को, जब मित्र राष्ट्रों की जापान पर विजय का समाचार इंडोनेशिया पहुँचा, तब सुकर्णो ने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की घोषणा की। इससे ब्रिटिश और डच शक्तियों के विरुद्ध इंडोनेशियाई राष्ट्रीय क्रांति की शुरुआत हुई। इस युद्ध में, प्रमुद्य करावांग, क्रांजी (पश्चिम जावा) में एक अर्धसैनिक समूह में शामिल हो गए और अंततः उन्हें जकार्ता में तैनात किया गया। इस दौरान उन्होंने लघु कहानियाँ और पुस्तकें लिखीं, साथ ही राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए अधिप्रचार सामग्री भी तैयार की। अंततः उन्हें 1947 में डच अधिकारियों द्वारा जकार्ता में कैद कर लिया गया, और वे वहाँ 1949 तक बंदी रहे — उसी वर्ष जब नीदरलैंड ने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को मान्यता दी। 1947 से 1949 तक इंडोनेशियाई क्रांति में अपनी भूमिका के कारण जब वे बुकित दुरी में कारावास में थे, तब उन्होंने अपनी पहली प्रमुख उपन्यासें "दि फ़्यूजिटिव" और "गेरिल्ला फ़ैमिली" लिखीं। इन कृतियों के लिए उन्हें ओप्बाउ-पेम्बांगुणान फ़ाउंडेशन से आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जिसने इन पुस्तकों का प्रकाशन भी किया। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ प्रमोद्या अनंत तोअर: आपको उन्हें क्यों जानना चाहिए (अल जज़ीरा, 6 फ़रवरी) प्रमोद्य अनंत तोर सूचना पृष्ठ प्रमोद्य अनंत तोएर, 81, इंडोनेशियाई उपन्यासकार, का निधन (द न्यूयॉर्क टाइम्स, 30 अप्रैल) इक्विनॉक्स पब्लिशिंग https://web.archive.org/web/20090301043248/http://www.equinoxpublishing.com/ 1 मार्च 2009 प्रमोद्य और राजनीति प्रमोद्य अनंत टूर डिजिटल चित्रण चित्र श्रेणी:1925 में जन्मे लोग श्रेणी:२००६ में निधन