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कर्णभारम्
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अंगूठाकार|कुरुक्षेत्र में कर्ण
अंगूठाकार|अर्जुन और कर्ण के बीच युद्ध
अंगूठाकार|कर्ण की माँ कुंती, अपने पति पांडु के साथ
कर्णभारम् (शाब्दिक अर्थ कर्ण का बोझ या कान का भार) भास द्वारा रचित एक संस्कृत एकांकी नाटक है। यह नाटक कुरुक्षेत्र युद्ध के समय कर्ण के पिछले दिन के मानसिक कष्ट का वर्णन करता है।http://www.indianscriptures.com/scriptures/introduction-of-scriptures/classical-sanskrut-literature/karnabharam Hindu Scriptures | Vedic lifestyle, Scriptures, Vedas, Upanishads, Smrutis कर्णभारम अनिवार्य रूप से भारतीय महाकाव्य महाभारत के एक प्रकरण की पुनर्कथन है, लेकिन नाटक में कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
संस्कृत साहित्य में यह सम्भवतः एकमात्र दुखान्त नाटक है। यह "व्यायोग" नाटक है।
द्रोणाचार्य के परलोक सिधारे जाने पर कर्ण को सेनापति बनाया जाता है तथा युद्ध का भार उस पर आ पड़ता है, इसलिए नाटक का नाम "कर्णभार" है। "कर्णभार" शीर्षक की व्याख्या विद्वानों ने अनेक प्रकार से की है। प्रोफेसर ए० डी० पुसालकर की सम्मति में कानों (कर्ण) के भारभूत कुण्डलों का दानकर यहाँ कर्ण की अद्भुत दानशीलता वर्णित की गई है। अतः कानों के आधारभूत कुण्डलों के दान को केन्द्र मानकर इस नाटक की रचना करने से इस नाटक का नाम 'कर्णभार' है। डॉ विन्टरनित्स ने कर्णभार की व्याख्या कर्ण के कठिन कार्य से की है। डॉ॰ भट्ट की धारणा है कि कर्ण की चिन्ता ही भारस्वरूप हो गई है। इसी बात को ध्यान में रखकर इस नाटक का नाम कर्णभार रखा गया है। कुछ लोगों के मत में कर्ण द्वारा प्राप्त युद्ध कौशल उनके लिए भारभूत हो गया था, अतः इस नाटक का नाम कर्णभार पड़ा।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
कर्णभारम् (संस्कृत विकिस्रोत)
कर्णभारम् (हिन्दी व्याख्याकार - डॉ० सुधाकर मालवीय)
श्रेणी:संस्कृत नाटक
श्रेणी:संस्कृत नाटककार