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411 समाचार
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व्यपगत का सिद्धान्त

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(Doctorine of lapse)व्यपगत का सिद्धान्त या हड़प नीति या चूक की नीति (अँग्रेजी: The Doctrine of Lapse, 1848-1856)।पैतृक वारिस के न होने की स्थिति में सर्वोच्च सत्ता कंपनी के द्वारा अपने अधीनस्थ क्षेत्रों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की नीति व्यपगत का सिद्धान्त या हड़प नीति कहलाती है। यह परमसत्ता के सिद्धान्त का उपसिद्धांत था, जिसके द्वारा ग्रेट ब्रिटेन ने भारतीय उपमहाद्वीप के शासक के रूप में अधीनस्थ भारतीय राज्यों के संचालन तथा उनकी उत्तराधिकार के व्यवस्थापन का दावा किया।John Keay,India: A History. Grove Press Books, distributed by Publishers Group West. United States: 2000 ISBN 0-8021-3797-0, p. 433. यह विस्तारवादी नीति थी। कंपनी के गवर्नर जनरलों ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने के उद्देश्य से कई नियम बनाए। उदाहरण के लिये, किसी राजा के निःसंतान होने पर उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन जाता था। राज्य हड़प नीति के कारण भारतीय नरेशों में बहुत असंतोष पैदा हुआ था। 1857 में हुए ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय प्रतिरोध को जन्म देने में इस नीति की महत्वपूर्ण भूमिका थी।डलहौजी ने इस सिद्धान्त पर कार्य किया कि जिस प्रकार भी संभव हो सके,ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार किया जाए मापदण्ड हिन्दू कानून के अनुसार, कोई व्यक्ति या शासक, जिसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं है, किसी व्यक्ति को गोद ले सकता है, जिसे उसके बाद पुत्र के सभी व्यक्तिगत और राजनीतिक अधिकार मिल जाएँगे। S.N.Sen History of Modern India 2006 New Age International (P) Ltd 8122417744, 978-8122-41774-6 50 लॉर्ड डलहौजी ने ऐसे दत्तक ग्रहण को मंजूरी देने एवं आश्रित राज्यों के मामले में दत्तक की अनुपस्थिति में अपने विवेकानुसार कार्यवाई करने के परम अधिकारों पर ज़ोर दिया। व्यावहारिक तौर पर इसका मतलब अंतिम क्षण के दत्तक ग्रहण को अस्वीकृत करना तथा स्वाभाविक या दत्तक उत्तराधिकारी न होने पर राज्यों का विलय था, क्योंकि लॉर्ड डलहौजी का मानना था कि पूर्वी के बजाय पश्चिमी शासन बेहतर है और जहां संभव हो इन्हें लागू करना चाहिए। इंदू जैन भारत ज्ञानकोश प्रथम पाँच पोप्युलर प्रकाशन मुंबई 81-715-4993-4 211 राज्यों का विलय स्वाभाविक या दत्तक न होने के कारण सतारा , जैतपुर-संभलपुर, बघाट , उदयपुर , झाँसी , नागपुर , करौली राज्यों का विलय कर दिया गया। व्यपगत सिद्धान्त के अनुसार विलय किया गया प्रथम राज्य सतारा था। सतारा के राजा अप्पा साहब ने अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अनुमति के बिना एक 'दत्तक पुत्र' बना लिया था। लॉर्ड डलहौज़ी ने इसे आश्रित राज्य घोषित कर इसका विलय कर लिया। 'कामन्स सभा' में जोसेफ़ ह्नूम ने इस विलय को 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की संज्ञा दी थी। इसी प्रकार संभलपुर के राजा नारायण सिंह, झांसी के राजा गंगाधर राव और नागपुर के राजा रघुजी तृतीय के राज्यों का विलय क्रमशः 1849 ई., 1853 ई. एवं 1854 ई. में उनके पुत्र या उत्तराधिकारी के अभाव में किया गया। उन्हें दत्तक पुत्र की अनुमति नहीं दी गयी।Wolpert, Stanley. A New History of India; 3rd ed., pp. 226-28. Oxford University Press, 1989. +लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा विलय किये गये राज्य राज्य वर्ष सतारा 1848 ई. जैतपुर, संभलपुर 1849 ई. बघाट 1850 ई. उदयपुर 1852 ई. झाँसी 1853 ई. नागपुर 1854 ई. करौली 1855 ई. अवध 1856 ई. लॉर्ड डलहौज़ी ने उपाधियों तथा पेंशनों पर प्रहार करते हुए 1853 ई. में कर्नाटक के नवाब की पेंशन बंद करवा दी। 1855 ई. में तंजौर के राजा की मृत्यु होने पर उसकी उपाधि छीन ली। डलहौज़ी मुग़ल सम्राट की भी उपाधि छीनना चाहता था, परन्तु सफल नहीं हो सका। उसने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 1853 ई. में मृत्यु होने पर उसके दत्तक पुत्र नाना साहब को पेंशन देने से मना कर दिया। उसका कहना था कि पेंशन पेशवा को नहीं, बल्कि बाजीराव द्वितीय को व्यक्तिगत रूप से दी गयी थी। हैदराबाद के निज़ाम का कर्ज़ अदा करने में अपने को असमर्थ पाकर 1853 ई. में बरार का अंग्रेज़ी राज्य में विलय कर लिया गया। 1856 ई. में अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर लखनऊ के रेजीडेन्ट आउट्रम ने अवध का विलय अंग्रेज़ी साम्राज्य में करवा दिया, उस समय अवध का नवाब 'वाजिद अली शाह' था। सन 1849 में लार्ड डलहोजी की घोषणा के अनुसार बहादुर शाह ज़फ़र के उत्तराधिकारी को ऐतिहासिक लाल किला छोड़ना पडेगा और शहर के बाहर जाना होगा और सन 1856 में लार्ड कैन्निग की घोषणा कि बहादुर शाह ज़फ़र के उत्तराधिकारी राजा नहीं कहलायेंगे ने मुगलों को कंपनी के विद्रोह में खडा कर दिया।http://books.google.co.in/books?id=t-WqXkeAH0gC&pg=PA82&lpg=PA82&dq=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8+%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%AF+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4&source=bl&ots=6JJheOsV8O&sig=xLj0Jh-YpR-Z8jEF7ggkxvjn5Ak&hl=hi&sa=X&ei=c0MsU9emPI6WrAeQjYHIAg&ved=0CDsQ6AEwBA#v=onepage&q=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%AF%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4&f=false गूगल बूक: आधुनिक भारत का इतिहास 21 मार्च 2014 https://web.archive.org/web/20140322013540/http://books.google.co.in/books?id=t-WqXkeAH0gC&pg=PA82&lpg=PA82&dq=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8+%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%AF+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4&source=bl&ots=6JJheOsV8O&sig=xLj0Jh-YpR-Z8jEF7ggkxvjn5Ak&hl=hi&sa=X&ei=c0MsU9emPI6WrAeQjYHIAg&ved=0CDsQ6AEwBA#v=onepage&q=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%AF%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4&f=false 22 मार्च 2014 live परिणाम इस सिद्धान्त का अधिकार क्षेत्र आश्रित हिन्दू राज्यों तक सीमित था, इस कारण इन विलयों से इन राज्यों के राजाओं और उनके अभिजात वर्ग में आशंका और रोष पैदा हो गया। आमतौर पर माना जाता है, कि 1857 के भारतीय बगावत के शुरू होने और फैलाने के पीछे जो असंतोष था, उसे भड़काने में इस सिद्धान्त का भी योगदान था। सन्दर्भ इन्हें भी देखें १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बाहरी कड़ियाँ Indian Princely States ब्रिटिश भारत की रियासतें लार्ड डलहौजी की लैप्स की नीति या हडप नीति क्या है? औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था भारतीय रियासतों के झंडे विलय की नीति के मुख्य कर्त्ताधर्ता श्रेणी:आधुनिक भारत का इतिहास श्रेणी: भारत का इतिहास श्रेणी:देशानुसार इतिहास श्रेणी:भारत में ब्रिटिश राज श्रेणी:भारत में ब्रिटिश शासन