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सतनामी आंदोलन
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सतनामी आन्दोलन सतनामी आंदोलन 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध (विशेषकर 1820-1830 के मध्य) में गुरु घासीदास के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की धरती पर उपजा एक बहुआयामी विद्रोह था। यह केवल एक धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं था, बल्कि जातिवाद, सामंतवाद, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध एक सशक्त प्रजातांत्रिक क्रांति थी।
पुराने अभिलेखो में इसे सतनामी आंदोलन या सतनामी क्रांति के नाम से दर्ज किया गया है, लेकिन बाद में सतनाम आंदोलन लिखा जाने लगा।https://www.google.co.in/books/edition/Satnam_Satnami_Dharma_Va_Satnami_Aandola/gWaxEAAAQBAJ सतनाम, सतनामी धर्म व सतनामी आंदोलन और ब्रिटिशकालीन अभिलेख रामकुमार लहरे
सतनामी आंदोलन: भूमि और संपत्ति पर अधिकार का संघर्ष
सतनामी आंदोलन छत्तीसगढ़ के इतिहास में न केवल एक आध्यात्मिक क्रांति थी, बल्कि यह सामाजिक न्याय और अपनी खोई हुई भूमि व संपत्ति पर पुनः अधिकार प्राप्त करने का एक बड़ा आर्थिक संघर्ष भी था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मराठा आक्रमण और बेदखली
सन 1741 ईस्वी में छत्तीसगढ़ पर मराठा सेनापति भास्कर पंत के आक्रमण के बाद यहाँ आतंक का साम्राज्य स्थापित हो गया। लगभग सात शताब्दियों से चले आ रहे हैहैयवंशी कलचुरी शासन और स्थानीय आदिवासियों की स्वतंत्र सत्ता को समाप्त कर दिया गया। मराठा शासन के दौरान स्थानीय निवासियों की भूमि और संपत्तियों पर मराठा पेशवा समर्थकों, ब्राह्मणों, सामंतों और जमींदारों ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा करना शुरू कर दिया।डॉ. हीरालाल शुक्ला (1995), गुरु घासीदास: संघर्ष, समन्वय और सिद्धांत, पृ. 127
धीरे-धीरे यहाँ के मूल भूमि स्वामी 'भूदास' (Land Slaves) बनते गए और एक बड़ा वर्ग भूमिहीन हो गया।
भू-स्वामित्व का विवरण
इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ला के अनुसार, रायपुर क्षेत्र में सर्वाधिक भू-स्वामित्व ब्राह्मणों के पास था। वे 606 गाँवों के मालगुजार थे, जिनमें से 185 गाँवों के मालगुजार मराठा ब्राह्मण थे जो भोंसला काल में नागपुर से आए थे। इसी प्रकार बिलासपुर क्षेत्र में भी लगभग एक चौथाई गाँवों के मालगुजार ब्राह्मण थे। इन बाहरी मालगुजारों ने स्थानीय निवासियों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल कर दिया था।ग्रांट (1870), सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर, पृ. 415
अन्य आंदोलनों से तुलना और विशिष्टता
सतनामी आंदोलन की प्रकृति अन्य किसान आंदोलनों (जैसे दिनाजपुर विद्रोह, बारासात आंदोलन या 1857 के विद्रोह) से भिन्न और अधिक प्रभावी थी। जहाँ अन्य आंदोलनों में किसानों ने केवल ऋण पत्रों और दस्तावेजों को नष्ट किया, वहीं सतनामी आंदोलन एक कदम आगे बढ़ा:
**चयनात्मक आक्रमण:** सतनामियों ने केवल शोषक मालगुजारों की संपत्ति को लक्ष्य बनाया और आम जनता को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया।
**स्वामित्व की प्राप्ति:** इस आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं, बल्कि उन गाँवों का मालगुजार बनना था जहाँ उन्हें दास बनाकर रखा गया था।
**जर्मन किसान आंदोलन से समानता:** हिल्टन जैसे विद्वानों ने इसकी तुलना जर्मनी के किसान आंदोलन से की है, जहाँ 'नाइट्स' (सामंतों) पर चयनात्मक हमले किए गए थे।
गुरु घासीदास और गुरु बालकदास का नेतृत्व
सन 1820 से गुरु घासीदास के नेतृत्व में यह महान आंदोलन तीव्र हुआ। इसे सोनाखान के राजा रामराय और उनके पुत्र वीर नारायण सिंह के साथ आदिवासियों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।उत्तम कुमार (2018), दक्षिण कौशल (पत्रिका), जुलाई-सितंबर अंक, पृ. 21
इस आंदोलन के मुख्य परिणाम निम्नलिखित रहे:
**सामंती तत्वों का निष्कासन:** आंदोलनकारियों ने जातिवादी सामंती तत्वों को क्षेत्रों से खदेड़ना शुरू कर दिया।
**भूदास प्रथा का अंत:** पेशवाशाही मराठा सामंतों द्वारा लूटी गई जमीनों पर दोबारा अधिकार कर भूदास प्रथा को समाप्त किया गया।
**सामूहिक खेती:** कई क्षेत्रों में सामंतों को कर देना बंद कर सामूहिक खेती (Collective Farming) प्रारंभ की गई।मानवाधिकार स्वाभिमान दिवस (2018), विशेष लेख, पृ. 16
सामाजिक और आर्थिक बदलाव
साहेब सर्वोत्तम स्वरुप के अनुसार, गुरु घासीदास ने शोषितों में स्वाभिमान का संचार किया। उनके प्रभाव से:
समाज के जो लोग बदहाली का जीवन जी रहे थे, वे कई गाँवों में खेती-बाड़ी और मठ-मकानों के स्वामी बन गए।
शोषणकारी व्यवस्था, जहाँ मजदूरों को केवल एक-डेढ़ किलो धान मिलता था, उसे चुनौती दी गई।
गुरु घासीदास के विचारों ने उस "राख में छिपी आग" को कुरेद दिया, जिससे समाज जुल्म करने वाले मालगुजारों के विरुद्ध खड़ा हो गया।साहेब सर्वोत्तम स्वरुप (2016), गुरु घासीदास और उनका सतनाम आंदोलन, पृ. 173-175
मालगुजारी और ब्रिटिश अभिलेख
सेवक साहेब (1885-1975) के अनुसार, आंदोलन के प्रभाव से सतनामी समाज के पास लगभग 900 मालगुजार (गाँव के मालिक) हो गए थे। हालाँकि, सन 1860 में गुरु बालकदास की हत्या के बाद सतनामियों की भूमि पर पुनः बलपूर्वक कब्जे की कोशिशें की गईं। ब्रिटिश अभिलेखों में ऐसे 362 गाँवों का उल्लेख मिलता है जहाँ संघर्ष के बावजूद सतनामियों का कब्जा बरकरार रहा।साहेब सर्वोत्तम स्वरुप (2016), तदैव
निष्कर्ष
सतनामी आंदोलन की मुख्य विशेषता छीनी हुई भूमि पर पुनः अधिकार प्राप्त करना था। इसकी इसी प्रकृति के कारण विद्वान ब्रिक्स (Briggs, 1920) ने इसे एक **"आर्थिक संघर्ष" (Economic Struggle)** के रूप में परिभाषित किया है।ब्रिक्स (1920), पृ. 223
संदर्भ
इन्हें भी देखें
गुरु घासीदास
छत्तीसगढ़ का इतिहास
सोनाखान
श्रेणी:छत्तीसगढ़ के आंदोलन
श्रेणी:भारत के किसान आंदोलन
श्रेणी:सतनामी संप्रदाय