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411 समाचार
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भारत में बाल श्रम

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thumb|upright=1.35|भारत समेत शेष विश्व में बाल श्रम, २००३ के दौरान १०-१८ आयु वर्ग में,तालिका २.८, डब्लू॰ डी॰ आइ॰ २००५, विश्व बैंक विश्व बैंक विश्व विकास संकेतक २००५, में अनुमानित ११% के साथ, १०-२०% के साथ हरे रंग में है देशों में घटना स्तर, लाल (३०%-४०%) और भूरे और काले (४०%-१००%) है। भारत में बच्चों का एक महत्वपूर्ण अनुपात बाल श्रम में लगा हुआ है। २०११ में, भारत की राष्ट्रीय जनगणना में पाया गया कि उस आयु वर्ग के कुल २५९.६४ मिलियन बच्चों में से [५-१४] आयु वर्ग के बाल श्रमिकों की कुल संख्या १०.१२ मिलियन थी।आयु डेटा C१३ तालिका (भारत/राज्य/संघ राज्य क्षेत्र), अंतिम जनसंख्या—२०११ भारत की जनगणना बाल श्रम समस्या है भारत के लिए अद्वितीय नहीं; दुनियाँ भर में, लगभग २१७ मिलियन बच्चे काम करते हैं, जिनमें से कई पूर्णकालिक हैं। शीर्षक=बाल श्रम—ILO |वर्ष=२०११ |प्रकाशक=ILO, संयुक्त राष्ट्र}}</ref> बाल श्रम समस्या भारत के लिए बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है; दुनिया भर में, लगभग २१७ मिलियन बच्चे काम करते हैं, जिनमें से कई पूर्णकालिक हैं। बाल और किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, १९८६, २०१६ में संशोधित "सी॰एल॰पी॰आर॰ अधिनियम" के अनुसार, १४ और १८ वर्ष की आयु के बच्चों को "किशोर" के रूप में परिभाषित किया गया है और कानून किशोरों को सूचीबद्ध खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं को छोड़कर नियोजित करने की अनुमति देता है जिसमें खनन, ज्वलनशील पदार्थ और विस्फोटक संबंधी कार्य और फैक्ट्री अधिनियम के अनुसार कई अन्य खतरनाक प्रक्रिया शामिल है।, और सी॰एल॰पी॰आर॰ अधिनियम किसी भी बच्चे को ऐसे रोज़गार में जाने से रोक लगाता है। घरेलू सहायिका सहित ऐसे रोजगार में किसी भी काम के लिए बच्चो से मज़दूरी करवाना संदिग्ध अपराध है।http://www.mondaq.com/india/x/602434/employee+rights+labour+relations/Child+Labour+Prohibition+And+Regulation+Amendment+Act+2016+Of+India भारत में बाल श्रम (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट, 2016 ऑफ इंडिया कारण अगर इतिहास देखा जाए तो १८ वर्ष से कम आयु के बच्चों ने विभिन्न विधियों से परिवार कल्याण में योगदान दिया है। ग़रीबी बाल श्रम का सबसे बड़ा कारण है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनियाँ के विकसित और निम्न भागों के ग्रामीण और गरीब हिस्सों में बच्चों के पास कोई वास्तविक और सार्थक विकल्प नहीं है। और न ही स्कूल और शिक्षक उपलब्ध हैं। जो कि बाल श्रम के अप्राकृतिक परिणाम होते हैं। बीबीसी की रिपोर्ट, इसी तरह, गरीबी का निष्कर्ष निकालती है और भारत में बाल श्रम के कुछ कारण और भी हैं। बंधुआ बाल श्रम जबरन, या आंशिक रूप से मजबूर, श्रम की एक प्रणाली है जिसके तहत बच्चे या बच्चे के माता-पिता एक ऋणदाता के साथ मौखिक या लिखित समझौता करते हैं। बच्चा ऋण के प्रकार के पुनःर्भुगतान के रूप में कार्य करता है बाल श्रम के परिणाम बड़ी संख्या में बाल पक्षपात की उपस्थिति को आर्थिक कल्याण की दृष्टि से एक गंभीर माइल माना जाता है। जो बच्चे काम करते हैं वे आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने में परेशान रहते हैं। उन्हें भौतिक, गूढ़, मानसिक रूप से विकसित होने का अवसर नहीं मिलता। बच्चों की शारीरिक स्थिति के संदर्भ में, बच्चे लंबे समय तक काम के लिए तैयार नहीं होते हैं क्योंकि वे वयस्कों की तुलना में जल्दी अनुरोध कर लेते हैं। यह उनकी शारीरिक स्थिति को कम करता है और बच्चों को बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। भारत में बाल श्रम के खिलाफ पहल १९७९ में, भारत सरकार ने बाल श्रम के बारे में पता लगाने और इससे निपटने के लिए गुरुपदस्वामी समिति का गठन किया। बाल श्रम निषेध और विनियमन अधिनियम १९८६ में समिति की सिफारिशों के आधार पर अधिनियमित किया गया था। सन्दर्भ