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411 समाचार
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अर्जुन वृक्ष

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वृक्ष टर्मिनेलिया अर्जुन Fruit I IMG 9577.jpg कोलकाता में अर्जुन का फ़ल पादप मैग्नोलियोफाइटा मैग्नोलियोप्सीडा Myrtales Combretaceae Terminalia T. arjuna Terminalia arjuna अर्जुन वृक्ष भारत में होने वाला एक औषधीय वृक्ष है। इसे घवल, ककुभ तथा नदीसर्ज (नदी नालों के किनारे होने के कारण) भी कहते हैं। कहुआ तथा सादड़ी नाम से बोलचाल की भाषा में प्रख्यात यह वृक्ष एक बड़ा सदाहरित पेड़ है। लगभग 60 से 80 फीट ऊँचा होता है तथा हिमालय की तराई, शुष्क पहाड़ी क्षेत्रों में नालों के किनारे तथा बिहार, मध्य प्रदेश में काफी पाया जाता है। इसकी छाल पेड़ से उतार लेने पर फिर उग आती है। छाल का ही प्रयोग होता है अतः उगने के लिए कम से कम दो वर्षा ऋतुएँ चाहिए। एक वृक्ष में छाल तीन साल के चक्र में मिलती हैं। छाल बाहर से सफेद, अन्दर से चिकनी, मोटी तथा हल्के गुलाबी रंग की होती है। लगभग 4 मिलीमीटर मोटी यह छाल वर्ष में एक बार स्वयंमेव निकलकर नीचे गिर पड़ती है। स्वाद कसैला, तीखा होता है तथा गोदने पर वृक्ष से एक प्रकार का दूध निकलता है। अर्जुन के वृक्ष सामान्यतः राजस्थान में भवानी मंडी झालावाड़ में बहुतायत रूप से पाए जाते है।। विवरण पत्ते अमरुद के पत्तों जैसे 7 से 20 सेण्टीमीटर लंबे आयताकार होते हैं या कहीं-कहीं नुकीले होते हैं। किनारे सरल तथा कहीं-कहीं सूक्ष्म दाँतों वाले होते हैं। वे वसंत में नए आते हैं तथा छोटी-छोटी टहनियों पर लगे होते हैं। ऊपरी भाग चिकना व निचला रुक्ष तथा शिरायुक्त होता है। फल वसंत में ही आते हैं, सफेद या पीले मंजरियों में लगे होते हैं। इनमें हल्की सी सुगंध भी होती है। फल लंबे अण्डाकार 5 या 7 धारियों वाले जेठ से श्रावण मास के बीच लगते हैं व शीतकाल में पकते हैं। 2 से 5 सेण्टी मीटर लंबे ये फल कच्ची अवस्था में हरे-पीले तथा पकने पर भूरे-लाल रंग के हो जाते हैं। फलों की गंध अरुचिकर व स्वाद कसौला होता है। फल ही अर्जुन का बीज है। अर्जुन वृक्ष का गोंद स्वच्छ सुनहरा, भूरा व पारदर्शक होता है। अर्जुन जाति के कम से कम पन्द्रह प्रकार के वृक्ष भारत में पाए जाते हैं। इसी कारण कौन सी औषधि हृदय रक्त संस्थान पर कार्य करती है, यह पहचान करना बहुत जरूरी है।ककुभोर्ऽजुन नामाख्यो नदीसर्दश्च कीर्त्तितः। इन्द्रदुर्वीरवृक्षश्च वीरश्च धवलः स्मतः॥ ककुभो शीतलो हृद्यः क्षतक्षयविपाश्रजित। मेदोमेह वृणान हन्ति तुवरः कफपित्त कृत॥ 'ड्रग्स ऑफ हिन्दुस्तान' के विद्वान लेखक डॉ॰ घोष के अनुसार आधुनिक वैज्ञानिक अर्जुन के रक्तवाही संस्थान पर प्रभाव को बना सकने में असमर्थ इस कारण रहे हैं कि इनमें आकृति में सदृश सजातियों की मिलावट बहुत होती है। छाल एक सी दीखने परभी उनके रासायनिक गुण व भैषजीय प्रभाव सर्वथा भिन्न है। सही अर्जुन की छाल अन्य पेड़ों की तुलना में कहीं अधिक मोटी तथा नरम होती है। शाखा रहित यह छाल अंदर से रक्त सा रंग लिए होती है। पेड़ पर से छाल चिकनी चादर के रूप में उतर आती है। क्योंकि पेड़ का तना बहुत चौड़ा होता है। अर्जुन की छाल को सुखाकर सूखे शीतल स्थान में चूर्ण रूप में बंद रखा जाता है। होम्योपैथी में अर्जुन एक प्रचलित ख्याति प्राप्त औषधि है। हृदयरोग संबंधी सभी लक्षणों में विशेषकर क्रिया विकार जन्य तथा यांत्रिक गड़बड़ी के कारण उत्पन्न हुए विकारों में इसके तीन एक्स व तीसवीं पोटेन्सी में प्रयोग को होम्योपैथी के विद्वानों ने बड़ा सफल बताया है। अर्जुन संबंधी मतों में प्राचीन व आधुनिक विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। फिर भी धीरे-धीरे शोथ कार्य द्वारा शास्रोक्त प्रतिपादन अब सिद्ध होते चले जा रहे हैं। आयुर्वेद में हजारों वर्षो पहले अर्जुन की महत्ता लिख दी गई थी अर्जुन का क्षीर पाक हजारों वर्षो से उपयोग किया जाता रहा है। हृदय रोगों में इसका उपयोग किया जाता है आयुर्वेद से अर्जुन को लेकर होम्योपैथी और आधुनिक विद्वानों ने इसकी दवाई तैयार कर ली लेकिन अभी भी आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लेकर इसका उपयोग करना चाहिए। आयुर्वेद में इसकी बहुत सी दवाई उपलब्ध है। आयुर्वेदिक गुण अर्जुन से रक्तवाहिनी नलिकाओं का संकुचन होता है। विशेषकर सूक्ष्म कोशिकाओं व छोटी धमनियों पर इसके प्रभाव से रक्तमिश्रण क्रिया बढ़ती है। हृदय को ठीक पोषण मिलता है व धड़कन नियमित-व्यवस्थित होने लगती है। अर्जुन हृदय के विराम काल को बढ़ाते हुए उसे बल भी पहुँचाता है तथा शरीर में संचित नहीं होता। मूत्र की मात्रा बढ़ाकर यह मूत्र द्वारा ही बाहर निकल जाता है। किसी भी रोग की जटिल परिणति 'हार्ट फैल्योर' में इसका यह कर्म अति लाभकारी सिद्ध होता है।https://books.google.co.in/books?id=k-r7p2GKenoC&pg=PA94&dq=%E0%A4%B9%E0%A5%83%E0%A4%A6%E0%A4%AF+%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%97+%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&ovdme=1&sa=X&ved=2ahUKEwjwjbux8f6JAxX41jgGHWTDNS44FBDoAXoECAUQAw#v=onepage&q=%E0%A4%B9%E0%A5%83%E0%A4%A6%E0%A4%AF%20%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%97%20%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6&f=false Prakriti Dwara Swasthya- Phal Aur Phool Sharma Dr Rajeev Diamond Pocket Books (P) Ltd. 978-81-288-0977-4 नई दिल्ली 94 hi Paperback पेट के बढ़ने का रोग आयुर्वेद विद्वान, हृदय की दुर्बलता के कारण मानते हैं तथा इसकी वृद्धि से हृदय दुर्बल होता है, यह तथ्य भी सत्य मानते हैं। अर्जुन इस दूषित चक्र की गति बंद कर मेदो-वृद्धि का नाश करता है व हृदय के स्वयं के रक्तस्त्रोतों को बल प्रदान करता है। हृदयपेशियां अशक्त हों, रक्त न मिल पाने के कारण मृतप्राय हों, धमनियों में रक्तदाब कम हो गया हो व हृदय फूला हुआ (डाइलेटेड हाइपर, ट्रॉफीड) हो। इन लक्षणों से युक्त हृदय रोगों में अर्जुन कार्य कर सामान्य स्थिति वापस लाता है। यह हृदय की कोरोनरी धमनियों में रक्तप्रवाह बढ़ाकर तथा प्रतिरक्त स्तंभन (एण्टीकोएगुलैट) प्रभाव द्वारा करता है। अर्जुन से बनने वाली औषधियां अर्जुन घृत अर्जुन घृत ह्रदय रोगों के लिए काम में ली जाने वाली औषधि है। क्षयकाश इसका प्रयोग क्षय रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। अर्जुनरिष्ठ अर्जुनारिष्ट का प्रयोग मुख्य्तः उच्च एवं निम्न रक्तचाप को सामान्य करने, दर्द के निवारण एवं साँस से सम्बंधित समस्याओं में अधिक होता है। रासायनिक संगठन thumb|right|अर्जुन के पुष्प अर्जुन की छाल में पाए जानेवाले मुख्य घटक हैं- बीटा साइटोस्टेरॉल, अर्जुनिक अम्ल तथा फ्रीडेलीन। अर्जुनिक अम्ल ग्लूकोज के साथ एक ग्लूकोसाइड बनाता है, जिसे अर्जुनेटिक कहा जाता है। इसके अलावा अर्जुन की छाल में पाए जाने वाले अन्य घटक इस प्रकार हैं- (1) टैनिन्स-छाल का 20 से 25 प्रतिशत भाग टैनिन्स से ही बनताहै। पायरोगेलाल व केटेकॉल दोनों ही प्रकार के टैनिन होते हैं। (2) लवण-कैल्शियम कार्बोनेट लगभग 34 प्रतिशत की मात्रा में इसकी राख में होता है। अन्य क्षारों में सोडियम, मैग्नीशियम व अल्युमीनियम प्रमुख है। इस कैल्शियम सोडियम पक्ष की प्रचुरता के कारण ही यह हृदय की मांस पेशियों में सूक्ष्म स्तर पर कार्य कर पाता है। (3) विभिन्न पदार्थ हैं-शकर, रंजक पदार्थ, विभिन्न अज्ञात कार्बनिक अम्ल व उनके ईस्टर्स। अभी तक अर्जुन से प्राप्त विभिन्न घटकों के प्रायोगिक जीवों पर जो प्रभाव देखे गए हैं, उससे इसके वर्णित गुणों की पुष्टि ही होती है। विभिन्न प्रयोगों द्वारा पाया गया हे कि अर्जुन से हृदय की पेशियों को बल मिलता है, स्पन्दन ठीक व सबल होता है तथा उसकी प्रति मिनट गति भी कम हो जाती है। स्ट्रोक वाल्यूम तथा कार्डियक आउटपुट बढ़तती है। हृदय सशक्त व उत्तजित होता है। इनमें रक्त स्तंभक व प्रतिरक्त स्तंभक दोनों ही गुण हैं। अधिक रक्तस्राव होने की स्थिति से या कोशिकाओं की रुक्षता के कारण टूटने का खतरा होने परयह स्तंभक की भूमिका निभाता है, लेकिन हृदय की रक्तवाही नलिकाओं (कोरोनरी धमनियों) में थक्का नहीं बनने देता तथा बड़ी धमनी से प्रति मिनट भेजे जाने वाले रक्त के आयतन में वृद्धि करता है। इस प्रभाव के कारण यह शरीर व्यापी तथा वायु कोषों में जमे पानी को मूत्र मार्ग से बाहर निकाल देता है। खनिज लवणों के सूक्ष्म रूप में उपस्थित होने के कारण यह एक तीव्र हृत्पेशी उत्तेजक भी है। चित्र दीर्घा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ [अर्जुन से बनने वाली औषधियाँ] श्रेणी:टर्मिनेलिया श्रेणी:औषधीय पौधे