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चन्द्रसेनीय कायस्थ
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चंद्रसेनीय कायस्थ प्रभु भारत में रहने वाली एक उच्च कोटि की जाति है जो महाराष्ट्र एवं पश्चिमी भारत में मुख्यतः निवास करते हैं। यह भारत में रहने वाले कलमकांडी कायस्थ महाजाति का एक हिस्सा है। इनकी उत्पत्ति राजा चंद्रसेन से बताई गई है इसी कारण यह क्षत्रिय धर्म का पालन करते हैं। उदय सहाय, IPS कायस्थ: एक एनसाइक्लोपीडिया अनकही कहानियों का https://www.kayasthencyclopedia.com/grand-narrative.html २०२१ SAUV कम्युनिकेशंस नई दिल्ली 978-81-941122-3-5 हिंदी 7 मार्च 2022 4 मार्च 2022 https://web.archive.org/web/20220304045639/https://www.kayasthencyclopedia.com/grand-narrative.html dead
उत्तपत्ति
त्रेता युग में भगवान परशुराम नें सहत्रार्जुन को मारकर क्षत्रियों के वंश को मिटाया। उस समय कुछ क्षत्रियों व क्षत्राणियों नें जंगल व पहाड़ की और भागकर अपनी रक्षा की थी। उनमें से चन्द्रसेन राजा की रानी गर्भावस्था में थीं। वह भागकर बगदालिया मुनी की कुटी में पहुंची। मुनी नें स्त्री को दुखी व अनाथ देखकर शरण दी। जब परशुराम जी को इस बात की खबर लगी तो वह बगदालिया मुनी के पास पहुंचे, बगदालिया मुनी भगवान परशुराम जी को आया देख बड़े ही आदरभाव से उनका सत्कार किया एवं पूरे विधी विधान से उनकी पूजा अर्चना कर उन्हे आसन दिया और प्रसाद तैयार करा कर भोजन ग्रहन करनें का निवेदन किया। बगदालिया मुनी का आदरभाव देख भगवान परशुराम जी ने भोजन ग्रहन किया और भोजनोपरांत भगवान परशुराम जी बोले आपकी कुटिया में चन्द्रसेन राजा की रानी गर्भ सहित आई है उसे मुझे सौप दिजीए जिससे मैं उसे गर्भ सहित मिटा सकूं। बगदालिया मुनी नें उन्हे देना स्वीकार किया। तब भगवान परशुराम जी बगदालिया मुनी पर खुश होकर उनसे एक मनोरथ मागनें को कहा तब बगदालिया मुनी नें कहा कि आप उसी स्त्री का गर्भ हमें दे दीजिए। भगवान परशुराम जी यह सुनकर हंसे और स्त्री को वापस करनें को स्वीकार किया। बगदालिया मुनी नें तब उस स्त्री से भगवान परशुराम जी के चरण कमल को प्रणाम करवाया। परशुराम जी नें प्रसन्न होकर बगदालिया मुनी से कहा कि आप तो जानते हैं मैं क्षत्रियों का नाश करनें वाका तीनो लोको में विदित हूँ परंतु आपनें इस स्त्री के गर्भ को मांग लिया है इस कारण अब मैं इसे नहीं मारूंगा किंतु मेरे रहते कोइ क्षत्रिय बच नहीं सकता इस कारण जब इस स्त्री की गर्भावस्था समाप्त हो तब इस बालक को चित्रगुप्त के वंश संस्कार कराकर इसे कायस्थ धर्म दीजिएगा। भविश्य में इस वंश वाले दालभ्य गोत्र कायस्थ कहे जाएगें। आगे चलकर राजा चंद्रसेन की रानी ने अपनी आजीविका चलाने के लिए अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सीवन कला का कार्य प्रारम्भ कर दिया और आगे चलकर इस परिवार के कुछ लोग सीवन कला से जुड़ गए कुछ ने कृषि इत्यादि कार्य अपना लिया कुछ ने कायस्थ धर्म अपनाया कुछ ने अपने को क्षत्रिय धर्म से अलग नहीं किया आगे चलकर यही कुनबा दो जातियों में बंट गया