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उपनिषद् सिद्धान्त
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मुख्य उपनिषदों में संसार के साथ समस्त जीवों की भिन्नता को दर्शाया गया है। उपनिषदिक सिद्धान्त के अनुसार केवल एक ब्रह्म ही है। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं जैसा कि "एकवाद्वितीयम् ब्रह्म" से दर्शित होता है। इस ब्रह्म में ही विक्षेप के कारण भ्रम रुपी माया का प्रादुर्भाव हुआ ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सागर में तरंगो से भिन्न भिन्न आकृतियाँ बन जाती है जिस प्रकार स्वर्ण एवं मिट्टी के बने समान में मूल तत्त्व स्वर्ण एवं मिट्टी होने के वाबजूद हमें भिन्न भिन्न आकृतियाँ ही दॄष्टिगोचर होती है और जिस प्रकार मकड़ी स्वयं से ही विशाल जाल का निर्माण कर देती है उसी प्रकार ब्रह्म से चेतन एवं अचेतन माया एवं इस अचेतन माया से इस संसार का प्रादुर्भाव हुआ। चेतन तथा अचेतन माया के संयोग से समस्त जीव समुदाय का प्रादुर्भाव हुआ।
श्रेणी:उपनिषद