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पार्वती गिरी
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पार्वती गिरि ପାର୍ବତୀ ଗିରି ओड़िआ १९ जनवरी १९२६ समलाईपदार, बरगढ़ जिला, ओड़िशा १७ अगस्त १९९५ ओड़िशा, भारत भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सेवा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस धनंजय गिरि
पार्वती गिरि (१९ जनवरी १९२६ – १७ अगस्त १९९५) ओड़िशा की स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी थीं। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में किशोरावस्था में भाग लिया और १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गतिविधियों के कारण उन्हें दो वर्ष के कारावास की सजा हुई। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने अपना जीवन गरीबों, अनाथों, महिलाओं और वंचित लोगों की सेवा के लिए समर्पित किया।Parbati Giri Azadi Ka Amrit Mahotsav संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार 5 August 2022Parbati Giri - Mother Teresa Of Western Odisha Employment News भारत सरकार 27 November 2021
उन्हें पश्चिमी ओड़िशा में उनके सामाजिक कार्यों के कारण “पश्चिमी ओड़िशा की मदर टेरेसा” कहा जाता है। उन्हें “बन्हीकन्या” अर्थात् “अग्निकन्या” के नाम से भी जाना जाता है।Mann Ki Baat, December 2025 भारत सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय
प्रारंभिक जीवन
पार्वती गिरि का जन्म १९ जनवरी १९२६ को वर्तमान बरगढ़ जिला के समलाईपदार गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम धनंजय गिरि था। उस समय समलाईपदार पश्चिमी ओड़िशा में राष्ट्रवादी राजनीतिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। उनके चाचा रामचंद्र गिरि स्थानीय कांग्रेस नेता थे और गाँव में स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित बैठकों का आयोजन करते थे।Bargarh District Gazetteer Government of Odisha
बाल्यावस्था में पार्वती अपने चाचा के साथ कांग्रेस नेताओं की बैठकों में जाया करती थीं। इन बैठकों में स्वतंत्रता आंदोलन की योजनाओं और कार्यक्रमों पर होने वाली चर्चाओं ने उन पर प्रभाव डाला। बाद में उन्होंने अपना जीवन स्वतंत्रता आंदोलन और समाजसेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।
उन्होंने औपचारिक शिक्षा तीसरी कक्षा तक प्राप्त की। लगभग ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने विद्यालय छोड़ दिया और कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में भाग लेने लगीं।Panda Saroj Kumar Parbati Giri - The Outstanding Women Freedom Fighter Orissa Review 2005 August Government of Odisha
बारी आश्रम में प्रशिक्षण
१९३८ में लगभग बारह वर्ष की आयु में पार्वती गिरि घर से निकलकर जाजपुर के निकट स्थित बारी आश्रम पहुँचीं। यह आश्रम गोपबंधु चौधरी और रमा देवी चौधरी जैसे गांधीवादी कार्यकर्ताओं से जुड़ा हुआ था और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
बारी आश्रम में उन्होंने लगभग दो वर्ष बिताए। इस दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा और स्वावलंबन के सिद्धांतों का अध्ययन किया तथा कताई, बुनाई और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण प्राप्त किया। आश्रम में रमा देवी और गोपबंधु चौधरी के संपर्क ने उनके राजनीतिक और सामाजिक विचारों को प्रभावित किया।
आश्रम से लौटने के बाद उन्होंने पश्चिमी ओड़िशा में कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय भाग लेना शुरू किया। उन्होंने बरगढ़, संबलपुर, पदमपुर, पानीमारा और घेंस सहित विभिन्न क्षेत्रों में लोगों से संपर्क किया।
स्वतंत्रता आंदोलन
पार्वती गिरि ने कम आयु में ही ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस के कार्यक्रमों का प्रचार शुरू कर दिया था। वे गाँव-गाँव जाकर लोगों को खादी अपनाने, चरखा चलाने और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती थीं। उन्होंने ग्रामीण लोगों को सूत कातने और खादी बुनने का प्रशिक्षण भी दिया।
१९४० में उन्होंने खादी आंदोलन के प्रचार के लिए पश्चिमी ओड़िशा के विभिन्न गाँवों में अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने लोगों को चरखा चलाने और खादी पहनने के लिए प्रोत्साहित किया।
उनकी गतिविधियाँ केवल खादी आंदोलन तक सीमित नहीं थीं। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक सभाओं और जनसंगठन में भी सक्रिय थीं। बरगढ़ और संबलपुर क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए युवाओं और ग्रामीण जनता को संगठित किया।
भारत छोड़ो आंदोलन
१९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ होने के समय पार्वती गिरि की आयु केवल १६ वर्ष थी। उन्होंने आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और तिरंगा लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जुलूसों तथा सभाओं में भाग लिया।
उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन और उसके संस्थानों के विरुद्ध असहयोग का आह्वान किया। बरगढ़ न्यायालय में उन्होंने वकीलों से ब्रिटिश प्रशासन के साथ सहयोग न करने तथा न्यायालय छोड़ने का आग्रह किया। कुछ वकीलों द्वारा उनके आग्रह का पालन किया गया, जबकि अन्य को उन्होंने विरोध के प्रतीक के रूप में चूड़ियाँ दीं।
उनके स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी कार्यों का एक प्रसिद्ध प्रसंग बरगढ़ के उप-मंडल अधिकारी (एसडीओ) के कार्यालय से संबंधित है। एक अवसर पर वे कुछ साथियों के साथ एसडीओ के कार्यालय में पहुँचीं और एसडीओ की कुर्सी पर बैठकर स्वयं को न्यायाधीश के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने साथ आए युवकों से एसडीओ को रस्सी से बाँधकर उनके सामने लाने का आदेश दिया। इस घटना के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
ब्रिटिश शासन ने उनकी गतिविधियों को गंभीरता से लिया और उन्हें दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
कम आयु के बावजूद उनके निर्भीक राजनीतिक व्यवहार ने उन्हें पश्चिमी ओड़िशा के स्वतंत्रता आंदोलन में एक उल्लेखनीय महिला कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया।
कारावास
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पार्वती गिरि को ब्रिटिश प्रशासन ने गिरफ्तार किया और दो वर्ष के लिए जेल भेजा गया। कारावास के बावजूद उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों से समझौता नहीं किया और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी।
कारावास से मुक्त होने के बाद वे पुनः खादी और गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रमों से जुड़ गईं। उन्होंने गाँवों में खादी, स्वावलंबन और सामाजिक सुधार का प्रचार जारी रखा। बाद में वे खादी कार्यक्रमों में अधिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए वर्धा आश्रम भी गईं।
स्वतंत्रता के बाद सामाजिक सेवा
१९४७ में भारत की स्वतंत्रता के बाद पार्वती गिरि ने सक्रिय दलीय राजनीति से दूरी बनाए रखी और अपना अधिकांश जीवन सामाजिक सेवा को समर्पित किया।
१९५० में उन्होंने इलाहाबाद स्थित प्रयाग महिला विद्यापीठ में अपनी शिक्षा पूरी की। १९५४ में वे रमा देवी के राहत कार्यों से जुड़ीं।
१९५१ में ओड़िशा में अकाल और खाद्य संकट के समय उन्होंने प्रभावित लोगों के बीच राहत कार्य किया। वे गरीब और पीड़ित लोगों तक सहायता पहुँचाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में गईं।
१९५५ में वे संबलपुर जिले में स्वास्थ्य और स्वच्छता की स्थिति सुधारने के लिए चलाए जा रहे एक अमेरिकी परियोजना से जुड़ीं। इस दौरान उनका कार्य ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता से संबंधित था।
अनाथ एवं निराश्रित लोगों के लिए कार्य
पार्वती गिरि ने अनाथ बच्चों और निराश्रित महिलाओं के लिए संस्थागत सहायता उपलब्ध कराने को अपने सामाजिक कार्य का प्रमुख क्षेत्र बनाया। उन्होंने नृसिंहनाथ में कस्तूरबा गांधी मातृनिकेतन की स्थापना की, जहाँ महिलाओं और अनाथ बच्चों को आश्रय और सहायता दी जाती थी।
उन्होंने संबलपुर जिले के जुजुमुरा क्षेत्र के बीरसिंहगढ़ में डॉ. संतरा बाल निकेतन नामक संस्था की स्थापना में भी योगदान दिया। इन संस्थाओं के माध्यम से अनाथ बच्चों, महिलाओं और समाज के अन्य वंचित वर्गों के लिए आश्रय, शिक्षा तथा देखभाल की व्यवस्था की गई।
बाद के वर्षों में उनका सामाजिक कार्य ग्रामीण शिक्षा, महिलाओं के कल्याण, अनाथ बच्चों की देखभाल तथा सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की सहायता तक विस्तृत हुआ।
अन्य सामाजिक कार्य
पार्वती गिरि ने कुष्ठ रोग के प्रति सामाजिक जागरूकता बढ़ाने और इसके उन्मूलन के प्रयासों में भी भाग लिया। उन्होंने जेलों की परिस्थितियों में सुधार के लिए काम किया और कैदियों के पुनर्वास तथा मानवीय व्यवहार की आवश्यकता पर जोर दिया।
उनके सामाजिक कार्यों में महिलाओं के सशक्तीकरण, अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरोध तथा ग्रामीण समुदायों में शिक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी शामिल था।
वे राजनीतिक पदों की अपेक्षा सामाजिक सेवा को अधिक महत्व देती थीं। भारत सरकार के *Employment News* में प्रकाशित उनके जीवनवृत्त के अनुसार स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से उन्हें राज्यसभा या राज्य विधानसभा में भेजे जाने के प्रस्ताव मिले, लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति के बजाय समाजसेवा को प्राथमिकता दी।
उपाधियाँ और सम्मान
पार्वती गिरि को उनके सामाजिक कार्यों और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के कारण “पश्चिमी ओड़िशा की मदर टेरेसा” के नाम से जाना जाता है।
उनके निर्भीक राष्ट्रवादी स्वभाव और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध के कारण उन्हें “बन्हीकन्या” अर्थात् “अग्निकन्या” के नाम से भी संबोधित किया गया।
१९८४ में भारत सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा उन्हें उनके सामाजिक कार्यों के लिए सम्मानित किया गया।
१९८८ में संबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की।
निधन
पार्वती गिरि का निधन १७ अगस्त १९९५ को हुआ। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दशकों तक सामाजिक सेवा, अनाथ बच्चों के कल्याण, महिलाओं की सहायता और वंचित समुदायों के उत्थान के लिए काम किया।
उनकी मृत्यु के बाद भी पश्चिमी ओड़िशा में उनके सामाजिक कार्यों और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को स्मरण किया जाता रहा है। उनके नाम पर सामाजिक एवं विकास संबंधी संस्थानों और योजनाओं का नामकरण भी किया गया है।Parbati Giri Mega Lift Irrigation Project Government of Odisha Mega Lift Irrigation
विरासत
पार्वती गिरि को ओड़िशा की महिला स्वतंत्रता सेनानियों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद अपना जीवन राजनीतिक पद प्राप्त करने के बजाय सामाजिक सेवा को समर्पित किया।
उनकी जीवन-यात्रा में गांधीवादी विचार, खादी और स्वावलंबन, औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध तथा स्वतंत्रता के बाद गरीबों और वंचितों की सेवा एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
ओड़िशा सरकार ने उनके सम्मान में सिंचाई क्षेत्र की एक प्रमुख योजना का नाम पार्वती गिरि मेगा लिफ्ट सिंचाई परियोजना रखा है। यह योजना ऊँची भूमि वाले कृषि क्षेत्रों तक सिंचाई जल पहुँचाने के उद्देश्य से संचालित की जाती है।
बरगढ़ जिला प्रशासन भी पार्वती गिरि को जिले की स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल करता है और उनके १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में योगदान का उल्लेख करता है।History of Bargarh District Government of Odisha, Bargarh District
यह भी देखें
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन
बरगढ़ जिला
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
पार्वती गिरि — आजादी का अमृत महोत्सव, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
Parbati Giri — Employment News, भारत सरकार
Parbati Giri — The Outstanding Women Freedom Fighter, Orissa Review
बरगढ़ जिला — इतिहास, ओड़िशा सरकारसितंबर 2026 InternetArchiveBot
Parbati Giri Mega Lift Irrigation Project — ओड़िशा सरकारसितंबर 2026 InternetArchiveBot
श्रेणी:१९२६ में जन्मे लोग
श्रेणी:१९९५ में निधन
श्रेणी:ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:ओड़िशा की महिला स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:भारत छोड़ो आंदोलन
श्रेणी:गांधीवादी
श्रेणी:भारतीय समाज सुधारक
श्रेणी:ओड़िशा के समाजसेवी
श्रेणी:बरगढ़ जिले के लोग
श्रेणी:संबलपुर जिले के लोग