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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

पूर्ण प्रतियोगिता

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जुलाई 2016 पूर्ण प्रतियोगिता बाजार के उस रूप का नाम है जिसमें विक्रेताओं की संख्या की कोई सीमा नहीं होती। फ़लतः कोई भी एक उत्पादक (विक्रेता) बाजार में वस्तु की कीमत पर प्रभाव नडाल सकता। अर्थशास्त्र में बाजार को मुख्त्यः दो रूपों में बांटा जाता है : पूर्ण प्रतियोगिता और अपूर्ण प्रतियोगिता। बाजार संरचना के दो चरम बिन्दुओं पर पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार पूर्ण प्रतियोगिता के लक्षण पूर्ण प्रतियोगिता के होने के लिये कुछ पूर्वानुमान लिये जाते हैं जो इस प्रकार हैं : १. प्रत्येक उत्पादक बाजार की पूरी आपूर्ति का इतना छोटा हिस्सा प्रदान करता है की वो अकेला बाजार में वस्तु की कीमत पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। २. प्रत्येक उत्पादक के द्वारा बनाई गयी वस्तु समान होती है। ३. प्रत्येक उत्पादक बाजार में उप्लब्ध उत्पादन तकनीक तक पहुंच रखता है। ४. किसी भी नये उत्पादक के बाजार में आने पर अथवा बाजार में उपस्थित किसी उत्पादक के बाजार से निकलने पर कोई रोक टोक नहीं है। ५. बाजार में विद्यमान प्रत्येक क्रेता और विक्रेता को बाजार का पूर्ण ज्ञान है। यद्यपि पूर्ण प्रतियोगिता व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं है, पर शेयर बाजार इसकी विशेषताओं की दृष्टि से बहुत पास पहुंच जाता है। कृषि क्षेत्र(चावल, गेहूं आदि) में भी प्रतियोगिता पूर्ण प्रतियोगिता के समान ही होती है। ~ सदैव पूर्ण प्रतियोगिता के बाज़ार का मूल्य निर्धरण कम रहता है एकाधिकार बाज़ार के तुलना में। पूर्ण प्रतियोगिता में बाजार मूल्य का निर्धारण पूर्ण प्रतियोगिता में कोई भी विक्रेता वस्तू का मूल्य स्वंय निर्धारित नहीं कर सकता। अतः वस्तु का मूल्य बाजार में निर्धारित होता है। मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया को समझने के लिये मांग और आपूर्ति को समझना आवश्यक है। मांग: एक निश्चित मूल्य पर किसी वस्तु की जितनी मात्रा लोग खरीद कर उपयोग करना चाहते हैं उसे वस्तु की मांग कहते हैं। आपूर्ति: किसी वस्तु के उत्पादक उसकी जितनी मात्रा एक निर्धारित मुल्य पर बाजार में बेचना चाहते हैं उसे वस्तू की बाजार में आपूर्ति कहते हैं। जब बाजार में कोइ वस्तु आती है तो उसके मांग और उसकी आपूर्ति में सम्बन्ध स्थापित होता है और मूल्य का निर्धारण होता है। विक्रेता द्वारा उपयुक्त विक्रय परिमाण का निर्धारण पूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेता का मांग-वक्र पुर्णतः लोचशील होता है क्योंकि वह बाजार निर्धारित मूल्य पर जितना चाहे उत्पादन कर सकता है और उसे बेच सकता है। अतः उसे उप्युक्त परिमाण निर्धारित करने के लिये अपने सीमांत लागत वक्र का निर्धरण करना होता है। सीमांत लागत का अर्थ है वर्तमान स्थिति में एक और वस्तु के उत्पाद करने का लागत। सीमांत लागत वक्र अंग्रेजी के अक्षर 'U' के आकार का होता है। इसका अर्थ है कि जब उत्पादन क्षमता का पूरा प्रयोग नहीं हो रहा है तब सीमांत लागत घट रहा होता है, एक निश्चित क्षमता तक पहुंचने के बाद यह बढ़ने लगता है। जिस बिन्दु पर सीमांत लागत वक्र उत्पादक के मांग वक्र को काटता है, उस बिन्दु पर उपयुक्त उत्पादन का निर्धारण होता है। जब उत्पादक एक वस्तु का उत्पादन करता है तो उसका मुख्य उद्देश्य होता है लाभ। जब सीमांत लागत अर्थात एक इकाई के उत्पादन का लागत बाजार में स्थापित वस्तु के मुल्य से ऊपर चला जाता है तो इसका अर्थ है कि विक्रेता को उसके उत्पादन से घाटा होगा। अतः जिस बिन्दु पर सीमांत लागत वक्र, विक्रेता के मांग वक्र को काट कर उसके ऊपर चला जाता है, उस बिन्दु के पार उत्पादन करने से विक्रेता को अपना उत्पाद लागत से कम भाव पर बेचना होगा। अतः उत्पादक इस बिन्दु पर पहुंचने के उपरान्त उत्पादन रोक देता है। श्रेणी:सूक्ष्म अर्थशास्त्र श्रेणी:बाज़ार (अर्थशास्त्र) श्रेणी:आर्थिक सिद्धांत