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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मुकुंद काकोटी (Mukunda Kakati)

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मुकुंद काकोटी (Mukunda Kakati) मुकुंद काकोटी (निधन: 20 सितंबर 1942) असम के एक अमर क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। प्रारंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि मुकुंद काकोटी का जन्म असम के तत्कालीन अविभाजित दरांग जिले (वर्तमान में विश्वनाथ जिला) के गोहपुर क्षेत्र में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनका बचपन असम के ग्रामीण परिवेश में बीता, जहाँ उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के तहत किसानों और आम जनता पर होने वाले आर्थिक और प्रशासनिक शोषण को बहुत करीब से देखा। कम उम्र से ही वे स्थानीय सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे और महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन के संदेशों से गहरे प्रभावित थे। स्वतंत्रता संग्राम और 'मृत्यु वाहिनी' में भूमिका 1942 में महात्मा गांधी द्वारा दिए गए "करो या मरो" के आह्वान के बाद पूरे असम में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक उठी। दस्ते का गठन: आंदोलन को धार देने के लिए ज्योतिप्रसाद अग्रवाल और अन्य वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन में युवाओं का एक आत्मघाती दस्ता बनाया गया, जिसे 'मृत्यु वाहिनी' (Sui-cide Squad / Death Squad) नाम दिया गया। इस दस्ते का उद्देश्य अपनी जान जोखिम में डालकर भी सरकारी प्रतिष्ठानों पर तिरंगा फहराना और समानांतर शासन स्थापित करना था। सक्रियता: मुकुंद काकोटी ने बिना किसी हिचकिचाहट के इस दस्ते की सदस्यता ली। उन्होंने गोहपुर और आसपास के गाँवों में घूम-घूमकर ग्रामीणों को संगठित किया और उन्हें अहिंसक सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया। 20 सितंबर 1942: गोहपुर थाने का ऐतिहासिक मार्च 20 सितंबर 1942 को 'मृत्यु वाहिनी' ने गोहपुर पुलिस स्टेशन से ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक 'यूनियन जैक' उतारकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराने का निर्णय लिया। शांतिपूर्ण जुलूस: इस अभियान में लगभग 5,000 निहत्थे ग्रामीण और युवा शामिल हुए। जुलूस का नेतृत्व 17 वर्षीय वीरांगना कनकलता बरुआ कर रही थीं, जिनके ठीक पीछे मुकुंद काकोटी और अन्य युवा तिरंगे की सुरक्षा के लिए चल रहे थे। ब्रिटिश पुलिस का गतिरोध: थाने के द्वार पर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी रेवती मोहन सोम के नेतृत्व में सशस्त्र पुलिस बल तैनात था। पुलिस ने चेतावनी दी कि यदि कोई भी थाने की सीमा में घुसा तो गोलियाँ चला दी जाएँगी। कनकलता का बलिदान: सत्याग्रही बिना डरे आगे बढ़े। पुलिस ने सीधी फायरिंग शुरू कर दी और एक गोली कनकलता बरुआ के सीने में लगी, जिससे वे गिर पड़ीं। मुकुंद काकोटी की शहादत कनकलता के गिरते ही राष्ट्रीय ध्वज ज़मीन की ओर झुकने लगा। मुकुंद काकोटी ने एक क्षण भी व्यर्थ न गँवाते हुए आगे बढ़कर तिरंगे को अपने हाथों में थाम लिया ताकि वह धूल में न मिले। अदम्य साहस: हाथ में तिरंगा लेकर मुकुंद ने थाने की ओर बढ़ना जारी रखा और देशभक्ति के नारे लगाए। घातक प्रहार: पुलिस ने तुरंत उन पर भी गोलियाँ दाग दीं। गोलियाँ लगने के बाद भी उन्होंने झंडे को मजबूती से पकड़े रखा जब तक कि अन्य साथी (जैसे गोलक कलिता) ने उसे संभाल नहीं लिया। मुकुंद काकोटी ने घटनास्थल पर ही वीरगति प्राप्त की। ऐतिहासिक महत्व एवं विरासत मुकुंद काकोटी का नाम कनकलता बरुआ के साथ असम के स्वतंत्रता इतिहास में अमर हो गया। सर्वोच्च राष्ट्रभक्ति का प्रतीक: उनका यह कार्य दर्शाता है कि उस दौर के युवाओं के लिए राष्ट्रध्वज का मान उनके अपने प्राणों से कहीं अधिक मूल्यवान था। स्मारक: असम के गोहपुर में कनकलता और मुकुंद काकोटी की स्मृति में स्मारक और सार्वजनिक प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं, जहाँ हर वर्ष 20 सितंबर को 'शहीद दिवस' के रूप में श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।