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जॉनी गद्दार (2007 फ़िल्म)
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जॉनी गद्दार 2007 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है।
== संक्षेप ==
फिल्म की शुरुआत एक बरसाती रात से होती है, जब मुंबई की सड़कों पर गश्त कर रही पुलिस वैन में चार पुलिसकर्मी आपस में बातचीत कर रहे होते हैं। तभी एक कार तेज़ी से आती है, उनकी गाड़ी से टकराते-टकराते बचती है, अचानक ब्रेक लगाती है और फिर लोहे के गेट वाले एक घर की ओर बढ़ जाती है। कार से एक जैकेट पहने आदमी उतरता है, गैरेज की तरफ जाता है और जैसे ही रोलर शटर खोलता है, पीछे से उस पर कई गोलियाँ चला दी जाती हैं। उसी समय पुलिस वैन में वायरलेस पर सूचना मिलती है कि आसपास कहीं गोली चलने की आवाज़ सुनी गई है, और वे तुरंत उस स्थान की ओर बढ़ते हैं।
इसके बाद पूरी फिल्म फ्लैशबैक में चली जाती है, जो धीरे-धीरे उसी गोलीकांड और पुलिस वैन वाले वर्तमान दृश्य तक कहानी को लेकर आती है।
कहानी पाँच लोगों के एक गैंग की है, जो एक जुआ क्लब चलाते हैं और कई गैरकानूनी कामों में शामिल हैं। इस गैंग के सदस्य हैं — विक्रम, शेषाद्रि, शार्दुल, प्रकाश और शिवा। एक दिन शेषाद्रि को बेंगलुरु में उसके पुलिस संपर्क कल्याण का फोन आता है, जो “फ्रेंच फर्नीचर” (ड्रग्स के लिए इस्तेमाल किया गया कोड शब्द) की 5 करोड़ रुपये की खेप 2.5 करोड़ रुपये में देने का प्रस्ताव रखता है। शेषाद्रि सभी पाँचों से 50-50 लाख रुपये लगाने को कहता है ताकि सौदा पूरा किया जा सके। शार्दुल भरोसा दिलाता है कि वह इस माल को 5 करोड़ से भी अधिक में बेच सकता है, जिससे हर सदस्य को कम से कम 50 लाख रुपये का अतिरिक्त फायदा होने की उम्मीद रहती है।
योजना के अनुसार शिवा पैसे लेकर ट्रेन से बेंगलुरु जाएगा, कल्याण से सौदा करेगा और उसी ट्रेन से वापस लौटेगा। लेकिन विक्रम, जो शार्दुल की पत्नी मिनी के साथ संबंध में है और उसके साथ कनाडा भाग जाना चाहता है, पैसे हड़पने की योजना बनाता है। वह ट्रेन में क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल कर शिवा को बेहोश करके पैसे चुराने का प्लान बनाता है।
गोवा में बिज़नेस के बहाने जाने का नाटक करते हुए वह पहले पुणे जाता है, जहाँ “जॉनी जी” नाम से होटल में ठहरता है, फिर गोवा की फ्लाइट लेता है। गोवा में वह शेषाद्रि के दोस्त एडवोकेट गोम्स से मिलता है ताकि जरूरत पड़ने पर उसके पास एक पुख्ता अलीबी हो। काम आधा अधूरा छोड़कर वह वापस मुंबई लौटता है, होटल में रुकता है और फिर उसी ट्रेन में सवार होता है जिसमें शिवा बेंगलुरु जा रहा होता है।
लेकिन योजना बिगड़ जाती है और विक्रम, बेहोश होने से पहले उसकी पहचान कर लेने वाले शिवा की हत्या कर देता है। इसके बाद शेषाद्रि, कल्याण, प्रकाश और शार्दुल — एक-एक करके विक्रम की सच्चाई जान जाते हैं, और वह सभी को बेरहमी से मार देता है। अंत में प्रकाश की पत्नी, विक्रम को शार्दुल समझकर गोली मार देती है, क्योंकि उसे लगता है कि शार्दुल ने ही उसके पति की हत्या की है।
फिल्म का अंत एक क्लिफहैंगर पर होता है, जहाँ यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि आखिरकार पैसे किसके हाथ लगते हैं।
== चरित्र ==
== मुख्य कलाकार ==
धर्मेन्द्र - शेषाद्रि
नील नितिन मुकेश - विक्रम
ज़ाकिर हुसैन - शारदुल
रिमी सेन - मिनी
विनय पाठक - प्रकाश
गोविन्द नामदेव - कल्याण
अश्वनी खलसेकर - वर्षा
== दल ==
== संगीत ==
== रोचक तथ्य ==
== परिणाम ==
=== बौक्स ऑफिस ===
=== समीक्षाएँ ===
== नामांकन और पुरस्कार ==
== बाहरी कड़ियाँ ==
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