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कराधान के सिद्धान्त
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सितंबर 2026
सितंबर 2026
कराधान के सिद्धान्तों को विभिन्न अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित किया गया है। जिनमे दो प्रमुख नाम आता है
एडम स्मिथ
जे एस मिल
इसकी निम्नलिखित प्रकार से व्याख्या की जा सकती हैः
1. समानता का सिद्धान्त : इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति की कर देने की क्षमता के अनुरूप ही उस पर कर लगाया जाना चाहिए। अमीर लोगों पर गरीबों से अधिक कर लगाया जाना चाहिए। अर्थात् अधिक आय वाले वर्ग पर अधिक कर और कम आय वाले वर्ग पर कम कर।
2. निश्चितता का सिद्धान्त : प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दिया जाने वाला कर निश्चित होना चाहिए तथा उसमें कुछ भी असंगत नहीं होना चाहिए। प्रत्येक करदाता का भुगतान का समय, भुगतान की राशि भुगतान का तरीका, भुगतान का स्थान, जिस अधिकारी को कर देना है, वह भी निश्चित होना चाहिए। निश्चितता का सिद्धान्त करदाताओं व सरकार दोनों के लिए जरूरी है।
3. सुविधा का सिद्धान्त : सार्वजनिक अधिकारियों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि करदाता को कर के भुगतान में कम से कम असुविधा हो। उदाहरण के लिए भू-राजस्व को फसलों के समय ले लिया जाना चाहिए,सरकारी कर्मचरियों को जो वेतन मिले उसी समय उससे कर वसूलना चाहिए।
4. मितव्ययता का सिद्धान्त : कर संग्रहण में कम से कम धन खर्च किया जाना चाहिए। संग्रह की गई राशि का अधिकतम अंश सरकारी खजाने में जमा करवाया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में फालतू खर्च से बचा जाना चाहिए।
5. उत्पादकता का सिद्धान्त : इस सिद्धान्त के अनुसार अनेक अनुत्पादक कर लगाने के स्थान पर कुछ उत्पादक कर लगाए जाने चाहिए। कर इतने अच्छे तरीके से लगाए जाने चाहिए कि वह लोगों की उत्पादन क्षमता को निरूत्साहित न करें।
6. लोचशीलता का सिद्धान्त : कर इस प्रकार के लगाए जाने चाहिए कि उनके द्वारा एकत्र होने वाली राशि को समय और आवश्यकतानुसार कम से कम असुविधा से घटायाया बढ़ाया जा सके।
7. विविधता का सिद्धान्त : इसके अनुसार देश की कर व्यवस्था में विविधता होनी चाहिए। कर का बोझ विभिन्न वर्ग के लोगों पर वितरित होना चाहिए।
इन्हें भी देखें
सार्वजनिक राजस्व
कर
श्श्रेणी:कर
श्रेणी:कर