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अदह
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सितंबर 2014
right|thumb|300px|एस्बेस्टस की चादरों का से बनी छत
अदह्य (ऐस्बेस्टस) कई प्रकार के खनिज सिलीकेटों के समूह को, जो रेशेदार तथा अदह्य होते हैं, कहते हैं। इसके रेशे चमकदार होते हैं। इकट्ठा रहने पर उनका रंग सफेद, हरा, भूरा या नीला दिखाई पड़ता है, परंतु प्रत्येक अलग रेशे का रंग चमकीला सफेद ही होता है। इस पदार्थ में अनेक गुण हैं, जैसे रेशेदार बनावट, आततन बल, कड़ापन, विद्युत के प्रति असीम रोधशक्ति, अम्ल में न घुलना और अदहता। इन गुणों के कारण यह बहुत से उद्योंगों में काम आता है।
रासायनिक गुण तथा प्राप्ति स्थान
right|thumb|250px|ऐस्बेस्टस
अदह को साधारण रूप से निम्नलिखित दो जातियों में बाँटा जा सकता है-
(१) रेशेदार सरपेंटाइन या क्राइसोटाइल;
(२) ऐंफ़ीबोल समूह के रेशेदार खनिज पदार्थ, जैसे क्रोसिडोलाइट, ट्रेमोलाइट, ऐक्टीनोलाइट तथा ऐंथोफिलाइट आदि।
क्राइसोटाइल
अदह की सबसे अधिक उपयोग होने वाली जाति का क्राइसोटाइल है। यह पदार्थ सरपेंटाइन की शिलाओं की पतली धमनियों में पाया जाता है और रासायनिक दृष्टि से साधारण मैगनीशियम सिलिकेट होता है। इन धमनियों में सफेद या हरे रंग का मणिम रेशमी रेशा पाया जाता है। इस प्रकार के अदह का ७० प्रतिशत भाग कैनाडा की क्विबेक खदानों से निकाला जाता है। क्राइसोटाइल-युक्त चट्टान में क्राइसोटाइल-अदह की मात्रा भारानुसार ५ से १० प्रतिशत होती है। इस मेल के रेशे बहुत अच्छे, मजबूत, लचीले और आतनन बल वाले होते हैं। इनको आसानी से सूत की तरह कपड़ों के रूप में बुना जा सकता है। ऐंफीबोल समूह की अपेक्षा (क्रोसीडोलाइट को छोड़कर) उष्मारोधी शक्ति कम होती है तथा अम्ल में घुलनशीलता अधिक। भारतवर्ष में उपयुक्त मेल के अदर हिमाचल प्रदेश (शिमला के पास शाली की पहाड़ियों में), मध्य प्रदेश (नरसिंहपुर), आं्ध्रा प्रदेश (कडप तथा करनूलु) और मैसूर (शिनगोरा) में पाए जाते हैं।
रेशों के खदान में से खोदकर और अदहयुक्त पत्थर को मशीन ड्रिलों के द्वारा निकाला जाता है; तत्पश्चात यांत्रिक विधियों से रेशों को अलग कर लिया जाता है। इसके लिए पत्थर को पहले तोड़ा तथा सुखाया जाता है, फिर क्रमानुसार घूमने वाली चक्कियों (क्रर्शस), बेलनों (रोलल्स), कुट्टकों (फ़ाइब्राइलर्स), पंखों तथा अधोपाती कक्षों (सेटलिंग चेंबर्स) में पहुँचाया जाता है और अंत में रेशों को इकट्ठा कर लिया जाता है।
ऐंफ़ीबोल अदह
इस प्रकार का अदह रेशों के पुंज के रूप में पाया जाता है, परंतु रेशे बहुधा अनियमित क्रम के होते हैं।
इन धमनियों की लंबाई कभी-कभी कई फुट तक होती है। इस प्रकार के अदह निम्नलिखित उपजातियों के पाए जाते हैं:
1. ऐंथोफिलाइट- जो लोहे और मैगनीशियम का सिलिकेट होता है। इसमें आतनन बल कम होता है, परंतु यह क्राइसोटाइल की अपेक्षा अम्ल में कम घुलता है और इसकी उष्मारोधक शक्ति अधिक होती है। यह बहुत भंजनशील होता है और इसीलिए इसकी कातना बहुत कठिन होता है।
2. क्रोसोडोलाइट- जो लोहे और सोडियम का सिलीकेट है। यह हल्के नीले रंग का और रेशम की तरह चमकीला होता है। इसमें आततन बल पर्याप्त होता है।
3. ट्रेमोलाइट- जो कैलसियम मैगनीशियम सिलीकेट होता है।
4. एकटिनोलाइट- जो मैगनीशियम, कैलसियम और लोहे का मिला हुआ सिलीकेट है।
पिछली दोनों उपजातियों के अदह का रंग सफेद से हल्का हरा तक होता है। रंग का गाढापन लोहे की मात्रा के ऊपर निर्भर है। इनके रेशे में अधिक लोच नहीं होती, अत ये बुनने के काम में नहीं आ सकते। ये कठिनता से पिघलते और अम्ल में बहुत कम घुलते हैं। इनकी अम्ल छानने और विद्युत उपकरण बनाने के काम में लाया जाता है।
भारतवर्ष में अदह की ऐकटिनोलाइट तथा ट्रेमोलाइट उपजातियाँ ही बहुतायत से पाई जाती हैं। इनके मिलने की जगहें निम्नलिखित हैं:
उत्तराखण्ड (कुमाऊँ तथा गढ़वाल), मध्य प्रदेश (सागर तथा भंडारा), बिहार (मुँगेर, बरवाना तथा भानपुर), उड़ीसा (मयूरभंज, सरायकेला), तमिलनाडु (नीलगिरि तथा कोयंबटूर) और कर्नाटक (बँगलोर, मैसूर तथा हसान)।
स्वास्थ्य को खतरा
एस्बेस्टस फेफड़ों के कैंसर का कारण बनता है। इस फेफड़ों के कैंसर को ठीक नहीं किया जा सकता है। अभ्रक के कारण कई लोगों की कम उम्र में मृत्यु हो गई। अभ्रक का उपयोग और उत्पादन यूरोप और अधिकांश विकसित देशों में निषिद्ध है।स्वास्थ्य को खतरा
खान से निकालना
अदह की खानें मिट्टी की सतह के नीचे मिलती हैं। ५०० से ६०० फुट नीचे तक पाए जाने वाले अदह को खुली मैदान विधि से निकाला जाता है। इससे और अधिक गहराई में पाए जाने वाले अदह के निकालने में वे ही विधियाँ प्रयुक्त होती हैं जो अन्य धातुओं के लिए अपनाई जाती हैं। भारतवर्ष में अदह हाथ-बरमी से छेदकर और विस्फोट पदार्थ तथा हथौड़ों द्वारा फोड़कर निकाले जाते हैं, परंतु दूसरे देशों, जैसे दक्षिणी अमरीका और संयुक्त राष्ट्र (अमरीका) में, वायुचालित बरमों का प्रयोग किया जाता है। अदह को छेदते समय जल का प्रयोग नहीं किया जाना, क्योंकि पानी के साथ मिलने पर स्पंजी (बहुछिद्रमय) मिश्रण बन जाता है, जिसमें से इसको अलग निकालना कठिन हो जाता है। कच्चे अदह को छानने के पश्चात् हथौड़ों से खूब पीटा जाता है। इससे अदह के रेशों में लगे हुए पत्थर के टुकड़े तथा अन्य वस्तुएँ दूर हो जाती हैं। इसके बाद इसे कुचलने वाली चक्की में डाला जाता है। बाद में रेशों को हवा के झोंके से अलग कर लिया जाता है। अंत में हिलते हुए छनने पर डालकर उनके द्वारा शोषक पंपों से हवा चूसकर धूलि पूर्णतया खींच ली जाती है। इसके उपरांत अदह का मूल्यांकन होता है। अदह के निम्नलिखित चार मेल बाजार में भेजे जाते है:
(१) एकहरा माल (सिंगिल स्टॉक)
(२) महीन माल (पेपर स्टॉक)
(३) सीमेंट में मिलाने योग्य (सीमेंट स्टॉक)
(४) चूरा (शॉर्ट्स)
अदह का मूल्यांकन इसको जलाने के बाद बची हुई राख के आधार पर किया जाता है-
अदह की उपजाति जलने के बाद बची हुई राख प्रतिशत क्रोसिडोलाइट ३.८ ट्रमोलाइट २.३ एंथोफिलाइट २.२३ एकटिनोलाइट १.९९ क्राइसोटाइल १४.५
क्षेत्र परीक्षण
यदि अच्छे अदह को उँगलियों के बीच रगड़ा जाए तो उससे रेशमी डोर जैसी वस्तु बन जाती है जो खींचने पर शीघ्र टूटती नहीं। घटिया मेल के अदह के छोटे-छोटे टुकड़े हो जाते हैं; वह कठोर भी होता है।
अच्छे अदह के पतले पुंज को यदि अँगूठे के नख से धीरे-धीरे खींचा जाए तो लचीले तथा अच्छे आतनन वाले रेशे मिलते हैं अथवा वे महीन रेशों में विभाजित हो जाते हैं, परंतु निम्न कोटि के अदह के रेशे बिलकुल टूट जाते हैं। उत्तम कोटि के अदह के रेशों को मसलने से कोमल गोलियाँ बनाई जा सकती हैं, परंतु घटिया अदह के रेशे टूट जाते हैं।
अदह के उपयोग
right|thumb|300px|ऐस्बेस्टस के तंतु
अदह के सभी प्रकार के विद्युतरोधक अथवा उष्मारोधक (इंस्यूलेटर) बनाने के काम में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त इन्हें अम्ल छानने, रासायनिक उद्योग तथा रंग बनाने के कारखानों में इस्तेमाल किया जाता है। लंबे रेशों को बुन या बटकर कपड़ा तथा रस्सी आदि बनाई जाती है। इनसे अग्निरक्षक परदे, वस्त्र और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ बनाई जाती हैं।
भारत में अदह का मुख्य उपयोग अदहयुक्त सीमेंट तथा तत्संबंधी वस्तुएँ, जैसे स्लेट, टाईल, पाइप और चादरें बनाने में किया जाता है।
इन्हें भी देखें
निर्माण सामग्री
बाहरी कड़ियाँ
खनिज एवं खनन के लिंक
Parachrysotile (asbestos) at the webmineral.com Mineral Database
Univ. of Minn.: Asbestos
Asbestos Newspaper Articles Archive
White Gold Pioneers: Asbestos Mining—The origins of asbestos mining, illustrated with many early photographs
स्वास्थ्य एवं पर्यावरण
About Your House — General Series — Asbestos
Hazards magazine's comprehensive asbestos resource pages
The Miracle Mineral Fiber - Asbestos
CBC Digital Archives - Asbestos: Magic mineral or deadly dust?
The Wittenoom Tragedy, Asbestos Diseases Society of Australia.
About Asbestos (2006) – European Agency for Safety and Health at Work (OSHA)
A USGS map of "Naturally Occurring Asbestos" in Eastern America
EPA refused to warn of asbestos dangers
A guide to asbestos in the home (From The Wrekin Housing Trust)
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