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411 समाचार
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मंगलेश डबराल

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मंगलेश डबराल Manglesh Dabral. Dec 1993. New Delhi. By Amarjit Chandan.jpg दिसंबर 1993 में मंगलेश डबराल 1948 5 16 y काफलपानी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड, भारत 2020 12 9 1948 5 16 y नई दिल्ली, भारत हिन्दी कवि पत्रकार हम जो देखते हैं (काव्य संग्रह) साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000) मंगलेश डबराल (16 मई 1948 – 9 दिसंबर 2020) एक भारतीय हिंदी कवि और पत्रकार थे। वे हिंदी भाषा के समाचार पत्रों जनसत्ता, हिंदी पैट्रियट और पूर्वग्रह से जुड़े रहे। उनकी कुछ प्रमुख कृतियों में पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता और कवि का अकेलापन शामिल हैं। उन्हें वर्ष 2000 में अपने कविता-संग्रह हम जो देखते हैं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।Hindi poet-journalist Manglesh Dabral dies https://indianexpress.com/article/books-and-literature/famous-hindi-poet-manglesh-dabral-passes-away-7098627/ 7 फरवरी 2026 indianexpress.com जीवन मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गाँव में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा देहरादून में पूरी की। 9 दिसंबर 2020 को भारत में कोविड-19 महामारी के दौरान नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में कोविड-19 से उत्पन्न जटिलताओं के कारण उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु 72 वर्ष थी। एम्स में भर्ती किए जाने से पहले वे कुछ दिनों तक गाज़ियाबाद के एक निजी अस्पताल में उपचाराधीन थे, जहाँ से उन्हें एम्स लाया गया। एम्स में उनकी स्थिति और बिगड़ गई और उन्हें हृदयाघात हुआ।प्रख्यात लेखक और कवि मंगलेश डबराल का कार्डियक अरेस्ट की वजह से निधन https://hindi.news18.com/news/nation/famous-writer-and-poet-manglesh-dabral-dies-3370539.html 7 फरवरी 2026 hindi.news18.com 10 दिसंबर 2020 https://web.archive.org/web/20201210075916/https://hindi.news18.com/news/nation/famous-writer-and-poet-manglesh-dabral-dies-3370539.html dead लेखन और पत्रकारिता 1960 के दशक के उत्तरार्ध में दिल्ली आने के बाद डबराल ने हिंदी पैट्रियट, प्रतिपक्ष और आसपास जैसे हिंदी अख़बारों में काम किया। इसके बाद वे भोपाल चले गए, जहाँ उन्होंने भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह के संपादक के रूप में कार्य किया। आगे चलकर उन्होंने इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित अमृत प्रभात में काम किया, फिर जनसत्ता के संपादक बने और बाद में सहारा समय से भी जुड़े। उन्होंने नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादकीय सलाहकार के रूप में तथा हिंदी मासिक पत्रिका पब्लिक एजेंडा में संपादक के रूप में भी काम किया। वे जनसत्ता की साप्ताहिक पत्रिका रविवारी के संपादक के रूप में विशेष रूप से जाने गए, जहाँ उन्होंने हिंदी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मार्गदर्शन दिया। अपने विभिन्न दायित्वों में उन्हें साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा गया।मंगलेश डबराल: राजनीतिक चेतना और मानवीय आभा से दीप्त कवि का जाना https://www.bbc.com/hindi/india-55252617 7 फरवरी 2026 bbc.com उनकी कविताओं के पाँच संग्रह प्रकाशित हुए - पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज़ भी एक जगह है और नए युग में शत्रु। इसके अलावा उनके निबंधों की दो पुस्तकें—लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन तथा एक यात्रा डायरी—एक बार आयोवा प्रकाशित हुई। उन्होंने बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय के उपन्यास 'द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस' का हिंदी अनुवाद अपार खुशी का घराना शीर्षक से किया।हिंदी कवि मंगलेश डबराल का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। https://www.aninews.in/news/national/general-news/hindi-poet-manglesh-dabral-passes-away-at-7220201210025610/ 7 फरवरी 2026 aninews.in उन्हें वर्ष 2000 में अपने कविता-संग्रह हम जो देखते हैं के लिए भारत की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी द्वारा प्रदान किया जाने वाला साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। डबराल की कविताओं का अनुवाद भारत की सभी प्रमुख भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, डच, स्पेनिश, पुर्तगाली, इतालवी, फ़्रेंच, पोलिश और बल्गेरियाई सहित कई विदेशी भाषाओं में हुआ। वे अमेरिका के आयोवा विश्वविद्यालय के वर्ल्ड राइटर्स प्रोग्राम के फेलो भी रहे। वे सरकार के मुखर आलोचक थे और उनके लेखन में असहमति की स्पष्ट झलक मिलती है। 2015 में उन्होंने एक व्यापक विरोध के तहत अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया, जिसमें अनेक भारतीय लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस किए। उनकी अंतिम कृति नए युग में शत्रु को देश के समकालीन हालात पर एक काव्यात्मक टिप्पणी माना गया। डबराल को समकालीन हिंदी कविता के अग्रणी कवियों में गिना जाता है। उन्हें कम शब्दों में सटीक और संयत भाषा के प्रयोग के माध्यम से हिंदी कविता में नई संवेदनशीलता लाने का श्रेय दिया जाता है। हिंदी कवि असद ज़ैदी के अनुसार, “वे दिखावटी कवि नहीं थे, लेकिन अपनी सादगी में ही उन्होंने हिंदी कविता में जादू पैदा किया।” उनकी कविताओं में पहाड़ों के प्रति उनका आकर्षण, घर की अवधारणा और विस्थापन की पीड़ा प्रमुख रूप से उभरती है, जो उनके अपने जीवन-स्थानों का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी कई रचनाएँ शहर और घर के बीच के उस अनिश्चित भूभाग में फँसे व्यक्ति की संवेदनशीलता और विवशता को व्यक्त करती हैं, जो पहाड़ों में अपने घर लौटने की आकांक्षा रखता है। उनके पत्रकारिता संबंधी लेखन ने हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ दी। पत्रकार मृणाल पांडे ने कहा, “वे हिंदी के सबसे तीक्ष्ण बुद्धिजीवियों में से एक थे।” मंगलेश डबराल के सात काव्य संग्रह प्रकाशित हैं- पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है, नये युग में शत्रु, स्मृति एक दूसरा समय है और पानी का पत्थर जो इनके मरणोपरांत प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त इनके दो गद्य संग्रह लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन के साथ ही एक यात्रावृत्त एक बार आयोवा भी प्रकाशित हो चुके हैं।मंगलेश डबराल: मैं चाहता हूं कि स्पर्श बचा रहे… https://thewirehindi.com/150891/hindi-literature-remembering-manglesh-dabral/ 7 फरवरी 2026 thewirehindi.com प्रकाशित कृतियाँ पहाड़ पर लालटेन घर का रास्ता हम जो देखते हैं आवाज भी एक जगह है नये युग में शत्रु स्मृति एक दूसरा समय है पानी का पत्थर(मरणोपरांत) सम्मान साहित्य अकादमी पुरस्कार पहल सम्मान शमशेर सम्मान श्रीकांत वर्मा पुरस्कार कुमार विकल स्मृति सम्मान हिन्दी अकादमी साहित्कार सम्मान सन्दर्भ श्रेणी:साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी भाषा के साहित्यकार श्रेणी:हिन्दी गद्यकार श्रेणी:हिन्दी कवि