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कल्पवृक्ष
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right|thumb|300px|कल्पवृक्ष की रक्षा करते हुए किन्नर और किन्नरी
कल्पवृक्ष देवलोक का एक वृक्ष। इसे कल्पद्रुप, कल्पतरु, सुरतरु, देवतरु तथा कल्पलता इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। भारतीय संस्कृति में यह वृक्ष समृद्धि, निरंतर विकास और सकारात्मक ऊर्जा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। न केवल भारत में, बल्कि विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में भी इसे जीवन, सृष्टि की उत्पत्ति, ज्ञान, प्राकृतिक संतुलन और मानवीय चेतना के विकास का एक सार्वभौमिक (Universal) प्रतीक स्वीकार किया गया है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी शामिल था। यह देवराज इंद्र को दे दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन वन में कर दी थी। कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की जाए, वही यह प्रदान कर देता है। 'तूबा' नाम से ऐसे ही एक पेड़ का वर्णन इस्लामी धार्मिक साहित्य में भी मिलता है जो सदा अदन (मुसलमानों के स्वर्ग का उपवन) में फूलता-फलता रहता है।
सिद्ध, नाथ और संत कल्पलता या कल्पवल्लरी संज्ञा 'उन्मनी' को देते हैं क्योंकि उनके मतानुसार सहजावस्था या कैवल्य की प्राप्ति के लिए उन्मनी ही एकमात्र साधन है जो न केवल सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है अपितु स्वयं अविनश्वर भी है और जिसे मिल जाती है, उसे भी अविनश्वर बना देती है। http://navbharattimes.indiatimes.com/-/holy-discourse/religious-discourse/--/articleshow/3126692.cms मन ही है इच्छा पूरी करने वाला कल्पवृक्ष नवभारत टाइम्स हिन्दी १३ जून २००८
सन्दर्भ
कल्पवृक्ष
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