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झूठा सच
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झूठा सच (1958-60) हिन्दी के सुप्रसिद्ध कथाकार यशपाल का सर्वोत्कृष्ट एवं वृहद्काय उपन्यास है। 'वतन और देश' तथा 'देश का भविष्य' नाम से दो भागों में विभाजित इस महाकाय उपन्यास में विभाजन के समय देश में होने वाले भीषण रक्तपात एवं भीषण अव्यवस्था तथा स्वतन्त्रता के उपरान्त चारित्रिक स्खलन एवं विविध विडम्बनाओं का व्यापक फलक पर कलात्मक चित्र उकेरा गया है। यह उपन्यास हिन्दी साहित्य के सर्वोत्तम उपन्यासों में परिगण्य माना गया है।
परिचय
यह उपन्यास दो भागों में विभाजित है। इसका पहला भाग 'वतन और देश' 1958 ई० में विप्लव कार्यालय, लखनऊ से प्रकाशित हुआ और दूसरे भाग 'देश का भविष्य' का प्रकाशन 1960 ई० में हुआ। इसके पहले भाग में लाहौर के भोला पांधे की गली के परिवारों के बहाने जन सामान्य के जीवन का चित्रण करते हुए देश के विभाजन एवं उससे उत्पन्न भीषण सांप्रदायिक दंगे आदि का चित्रण करते हुए शरणार्थियों के एक देश छोड़कर दूसरे में पलायन की विवशता तक का चित्रण किया गया है। दूसरे भाग में देश के निर्माण में होने वाली चूकों, नेताओं की भ्रष्टता, क्रांतिशील चेतना के भटकाव, स्वार्थ लिप्सा की ट्रेजेडी में फँसा मध्यवर्ग और इस सब के बावजूद जनता की निर्णायक विजयिनी शक्ति का सांकेतिक चित्रण विस्तृत फलक पर किया गया है।
विषय-वस्तु
झूठा सच के प्रमुख पात्र हैं जयदेव पुरी, उसकी बहन तारा और जयदेव पुरी की पत्नी कनक। तारा और जयदेव पुरी का एक परिवार है, कनक का दूसरा परिवार है। इन दोनों परिवार की कहानियों के माध्यम से उपन्यास की कहानी आगे बढ़ती है और अत्यधिक विस्तार में जाकर बहुआयामी हो जाती है।
झूठा सच की कहानी सन् 1947 में भारत की आजादी के समय मचे भयंकर दंगे की पृष्ठभूमि के रूप में बुनी गयी है। ब्रिटिश औपनिवेशिकता, उसकी 'फूट डालो और राज करो' की नीति तथा मुस्लिम लीग के 'दो राष्ट्र का सिद्धांत' से मिलकर बृहत्तर भारतीय समाज में स्वतः मौजूद छुआछूत की निम्न भावना एवं सांप्रदायिकता की दबी चेतना ऐसी उभरी कि पूरा भारत वर्ष ऐसी ज्वाला से धधक उठा जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिल पाता है।हिन्दी उपन्यास का इतिहास, गोपाल राय, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेपरबैक संस्करण-2009, पृष्ठ-203. मानवीय यातना के इतिहास में यह विश्व की क्रूरतम घटनाओं में से एक घटना मानी जाएगी। लगभग एक दशक (1946 से 56 तक) इस उपद्रव का प्रभाव बना रहा।आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास, बच्चन सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-1997, पृष्ठ-330-31. तात्कालिक ही सही पर वहशी भावनाओं की गिरफ्त में आये हिंसक पशु बने मनुष्यों द्वारा सांप्रदायिक दंगों में हजारों-हजार व्यक्ति मौत के घाट उतार डाले गये, लाखों विस्थापित हो गये, स्त्रियों और बच्चों के साथ अमानुषिक अत्याचार किये गये और पूरे देश की एक विशाल जनसंख्या को अपना देश या वतन छोड़कर भारत या पाकिस्तान में नये सिरे से बसना पड़ा। झूठा सच के प्रथम भाग 'वतन और देश' में इन स्थितियों का अत्यंत मार्मिक एवं विस्तृत चित्रण किया गया है। इस भाग के अंत में शरणार्थियों को लेकर आने वाली एक बस का ड्राइवर कहता है "रब्ब ने जिन्हें एक बनाया था, रब्ब के बन्दों ने अपने वहम और जुल्म से उन्हें दो कर दिया।"यशपाल रचनावली, खण्ड-3 (झूठा सच, भाग-1 'वतन और देश') लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पेपरबैक संस्करण-2007, पृष्ठ-415.
झूठा सच के दूसरे खंड 'देश का भविष्य' में स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के दशक में देश के विकास और भावी निर्माण में बुद्धिजीवियों और नेताओं की प्रगतिशील और प्रतिगामी भूमिका का यथार्थ तथा प्रभावपूर्ण अंकन किया गया है। जयदेव पुरी और सूद प्रतिगामी शक्तियों के प्रतिनिधि रूप में भ्रष्ट राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत करता हैहिन्दी उपन्यास का इतिहास, गोपाल राय, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेपरबैक संस्करण-2009, पृष्ठ-203. और तारा जैसी क्रांतिकारी चेतना से युक्त विकास की राह पर चलने वाली स्त्री भी सुख-समृद्धि एवं प्रभाव की लिप्सा में पड़कर विडंबना का दुःखद उदाहरण प्रस्तुत करती है। कर्म-कर्म की रट लगाने वाले प्रधानमंत्री स्वयं केवल भाषण का सहारा लेते और फिजूलखर्ची का भीषण उदाहरण प्रस्तुत करते दिखते हैं।उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, वीरेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन प्रा० लि०, नयी दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ-59. कुल मिलाकर विस्तृत चित्र-फलक पर यशपाल दिखलाते हैं कि देश का भविष्य अंततः देश की सामान्य जनता के ही हाथ में है जो समग्र स्थितियों का अवलोकन कर सही वस्तुस्थिति को पहचान सके। इसीलिए यशपाल विभिन्न स्थितियों का चित्र उकेरते हैं, किसी पात्र का एक रैखिक या आदर्शवादी चित्रण नहीं करते हैं, क्योंकि व्यवहारिक जीवन में ऐसा हो पाना काम्य तो है, परंतु बहुधा संभव नहीं हो पाता है।
इस उपन्यास में देश की दुरवस्था के लिए जनता की अंदरूनी कमजोरियों एवं निर्जीवता को भी काफी उत्तरदायी दिखलाया गया है। परंतु, उपन्यास के अंत तक जाकर यह प्रमाणित होता है कि यह चित्रण वस्तुतः वस्तुस्थिति की सही पहचान करवाने के उद्देश्य से ही किया गया है। उपन्यास के अंत में कांग्रेस के भ्रष्टाचारी परंतु प्रबलता प्राप्त नेता सूद चुनाव हार जाता है और इस परिणाम पर डॉक्टर नाथ गंभीर होकर टिप्पणी करता है -- "गिल, अब तो विश्वास करोगे, जनता निर्जीव नहीं है। जनता सदा मूक भी नहीं रहती। देश का भविष्य नेताओं और मंत्रियों की मुट्ठी में नहीं है, देश की जनता के ही हाथ में है।"यशपाल रचनावली, खण्ड-3 (झूठा सच, भाग-2 'देश का भविष्य') लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पेपरबैक संस्करण-2007, पृष्ठ-540.
रचनात्मक गठन
झूठा सच भारत विभाजन (1947) की पृष्ठभूमि पर केंद्रित वृहत्तर एवं बहुआयामी फलक वाला उपन्यास है। इसमें विभाजन के पहले से लेकर विभाजन के बाद तक के समय का बारीक चित्रांकन किया गया है। जयदेव पुरी एवं उसकी बहन तारा को केंद्र में रखने के बावजूद यह उपन्यास नायक या नायिका प्रधान नहीं है और इस रूप में भी यह उपन्यास पूर्व निर्मित बँधे-बँधाये औपन्यासिक ढाँचे को अतिक्रमितउपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, वीरेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन प्रा० लि०, नयी दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ-54. करता है। यह उपन्यास वस्तुतः विभिन्न धर्मों एवं वर्गों में बँटे वृहत्तर जन-समाज के उत्थान-पतन की सुविस्तीर्ण गाथा है, जिसका चित्रण विभाजन को केंद्र में रखते हुए किया गया है। विभाजन से पहले लोगों के मन में उत्पन्न होने वाले विघटनवादी भाव तथा विभाजन के बाद देश अथवा शासन के संघटन के लिए आवश्यक समर्पण एवं सूझबूझ में होने वाली कमी -- दोनों पर सूक्ष्म दृष्टि रखते हुए यशपाल ने इस उपन्यास का ताना बाना बुना है। सांप्रदायिक चेतना किस प्रकार मानवीय नियति को दूर तक प्रभावित करती है तथा परिस्थितियों की विकट मार जनसामान्य में निहित क्रांतिकारी चेतना को भी किस प्रकार कुंठित करते हुए स्वार्थ लिप्सा की ओर मोड़ सकती है, इसका अत्यंत मार्मिक चित्रण यशपाल ने इस उपन्यास में किया है। भारत का मध्य वर्ग क्रांतिकारी चेतना से युक्त होकर पूंजीपति वर्ग के पाखंड की आलोचना करते हुए भी किस प्रकार स्वयं वैसा ही जीवन जीनेकथा विवेचना और गद्य शिल्प, रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-1999, पृष्ठ-77-78. की ट्रैजेडी की ओर बढ़ते जाता है, इसका औपन्यासिक रचाव देखने योग्य है।
उपन्यास का रचनात्मक गठन इतना कुशल है कि इस महाकाय उपन्यास की महाकाव्यात्मकता इस रहस्य में अंतर्निहित मानी गयी है कि इसके कथा-संघटन में यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि 'झूठा सच' तारा की नियति कथा के बहाने देश के विभाजन का वृत्तांत है या कि देश विभाजन के परिणाम स्वरूप है तारा की नियति।उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, वीरेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन प्रा० लि०, नयी दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ-71. उपन्यास में तारा स्वयं करती है- "मेरे भाग्य के कारण देश का बँटवारा हुआ या देश के भाग्य के कारण मेरी दुर्गति हुई।"
समीक्षकों की दृष्टि में
डॉ॰ रामविलास शर्मा यशपाल के घोर विरोधी के रूप में माने जाते हैं, परंतु उन्होंने संभवतः सबसे पहले यह घोषित कर दिया था: " 'झूठा सच' यशपाल जी के उपन्यासों में सर्वश्रेष्ठ है। उसकी गिनती हिन्दी के नये-पुराने श्रेष्ठ उपन्यासों में होगी-- यह भी निश्चित है।"कथा विवेचना और गद्य शिल्प, रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-1999, पृष्ठ-75.
नेमिचंद्र जैन ने इस उपन्यास पर अनेक आरोप लगाते हुए यह निष्कर्ष दिया था कि हिन्दी उपन्यास साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण कृतियों में होने पर भी 'झूठा सच' अंततः किसी आत्यन्तिक सार्थक उपलब्धि के स्तर को छूने में असफल ही रह जाता है।अधूरे साक्षात्कार, नेमिचन्द्र जैन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2002, पृष्ठ-81.
कवि कुँवर नारायण ने इस उपन्यास की समीक्षा ही 'कविदृष्टि का अभाव' शीर्षक से लिखी थी।विवेक के रंग, संपादक- देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ-200.
इसके बरअक्स आनंद प्रकाश का स्पष्ट मत है कि इस उपन्यास का एक बहुत बड़ा गुण है इसकी रोचकता और अत्यधिक साहित्यिकता। ...निश्चय ही 'सामाजिक वातावरण' और 'ऐतिहासिक यथार्थ' (यशपाल द्वारा प्रयुक्त शब्द) के बेबाक चित्रण को ज्यादातर सही साहित्यिक समझ और अभिव्यक्ति से जोड़ पाने में यशपाल को पर्याप्त सफलता मिली है।आनन्द प्रकाश लिखित 'झूठा सच' की समीक्षा, आधुनिक हिन्दी उपन्यास, संपादक- भीष्म साहनी एवं अन्य, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-1980, पृष्ठ-131.
शिवकुमार मिश्र के अनुसार 'झूठा सच' को पाठकों की व्यापक सराहना मिली। उस पर 'अखबारी कतरन' होने के आरोप भी इधर-उधर से आये परन्तु रमेश कुंतल मेघ ने उसे 'कला जैसा लिखा गया इतिहास' कह कर उसकी रचनात्मक प्रकृति की सही पहचान की। इतने विशद पट पर, आधुनिक इतिहास की एक रचनात्मक घटना इतिहास से विलग कैसे रह सकेगी? यशपाल की खूबी है कि उन्होंने उस इतिहास को कला के अपने सौष्ठव से जोड़कर प्रस्तुत किया।आलोचना के प्रगतिशील सरोकार, शिवकुमार मिश्र, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, संस्करण-2012, पृष्ठ-136-37.
इस उपन्यास पर लगाये गये विभिन्न आरोपों के परिप्रेक्ष्य में रामदरश मिश्र जी का मानना है: "बातें बहुत सी है किंतु मुझे लगता है कि लेखक ने तत्कालीन घटनाओं और परिस्थितियों के विस्तार तथा मानवीय अन्तर् सत्यों की गहनता, आधुनिक नियति और मूल्य का बहुत सुंदर सामंजस्य किया है। यह शिकायत की गयी है कि इस उपन्यास में लेखक की अपनी दृष्टि (यानी मार्क्सवादी दृष्टि) आर-पार व्यापत नहीं है किंतु मुझे लगता है कि यह लेखक की सर्जनात्मक दृष्टि के लिए शुभ लक्षण है कि वह यथार्थ के लोक की मुक्त यात्रा करती है, इसी पूर्वग्रह से आक्रांत नहीं है। यह रचनात्मक दृष्टि एक ओर लेखक को यथार्थ के सही स्वरूप को देखने के लिए प्रेरित करती है, दूसरी ओर चूँकि यह सर्जन दृष्टि है, घटनाओं और तथ्यों को ज्यों-का-त्यों न देखकर उन्हें मानवीय सत्यों के संदर्भ में देखती है और उसके भीतर से कुछ निर्मित करती है। प्रस्तुत महाकाव्यात्मक उपन्यास में यशपाल की दृष्टि ने कहीं साथ नहीं छोड़ा है, वह आरपारदर्शी है और उसे इस बात की पहचान है कि क्या होकर भी झूठ है और क्या ना होकर भी सही है। लेखक मार्क्सवादी है किंतु इस उपन्यास में उसकी मार्क्सवादी विचारधारा अपने-आप में हावी न होकर उसकी कलात्मक दृष्टि की सहायक है।"हिन्दी उपन्यास : एक अन्तर्यात्रा, रामदरश मिश्र, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2004, पृष्ठ-139-40.
इस विशालकाय उपन्यास को पूरी तरह पढ़े बिना कुछ सुनी-सुनाई या लिखी-पढ़ी टिप्पणियों के अनुसार मूल्यांकित करने को बिल्कुल अपर्याप्त एवं अनुचित मानते हुए उपन्यासों के नवीन अंतर्दर्शी समीक्षक वीरेन्द्र यादव का कहना है: "सच तो यह है कि झूठा सच एक औपन्यासिक कृति मात्र न होकर विभाजन के दौर और उसके बाद के भारतीय समाज व राजनीति का कालजयी दस्तावेज है। कई अर्थों में यह भारत विभाजन के सुपरिचित विमर्शों व प्रभुत्वशाली चिंतन का प्रतिपक्ष भी है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी यह है कि न तो यह सरहद के इस पार के लेखक की रचना लगती है और न ही किसी पुरुष लेखक की। ...दो राय नहीं कि 'झूठा सच' को हिन्दी उपन्यासों में 'क्लैसिक' का दर्जा हासिल है, लेकिन जरूरी है उन कारणों का जानना जिनके कारण यह 'क्लैसिक' की कोटि में है। इसलिए आवश्यक है इसका पढ़ा जाना।"उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, वीरेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन प्रा॰ लि॰, नयी दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ-71-72.
कुँवर नारायण जी के द्वारा लगाये गये आरोपों के जवाब में यशपाल के प्रामाणिक भाष्यकार माने जाने वाले मधुरेश ने ' 'झूठा सच' : उपन्यास में महाकाव्य' शीर्षक से विस्तृत समीक्षात्मक आलेख लिखा और कुँवर नारायण जी के आरोपों का विश्लेषणात्मक उत्तर देते हुए घोषित किया कि 'झूठा सच' यशपाल की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में तो स्वीकृत है ही, वह हिन्दी के दस श्रेष्ठ और उल्लेखनीय उपन्यासों में से भी एक है।यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश, मधुरेश, आधार प्रकाशन प्रा॰ लि॰, पंचकूला, हरियाणा, पेपरबैक संस्करण-2006, पृष्ठ-229.
इन्हें भी देखें
यशपाल
हिन्दी उपन्यास
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
श्रेणी:हिन्दी साहित्य
श्रेणी:हिन्दी उपन्यास
यँहा कुछ नहीं है