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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

कनकधारा स्तोत्र

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हिन्दू धर्म आदि शंकराचार्य संस्कृत कनकधारा स्तोत्र की कथा का चित्रण करने वाली चित्रकला २२ कनकधारा स्तोत्र अंगूठाकार|इस स्तोत्र के रचयिता आदि शङ्कराचार्य की मूर्ति कनकधारा स्तोत्र (sa कनकधारा स्तोत्रम्, Kanakadhārāstotram) एक हिन्दू स्तोत्र है, जिसे संस्कृत में आदि शंकराचार्य (आदि शङ्कराचार्य) द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र उनका प्रथम काव्यरचना था, जो उन्होंने बाल्यावस्था में अष्टवर्षीय (८ वर्ष; विक्रम संवत् ८४२, ईस्वी सन् ७८६) आयु में किया था।https://books.google.com/books?id=3FwoDwAAQBAJ&dq=kanakadhara+lakshmi&pg=PT208 Shakti: Realm of the Divine Mother Vanamali 2008-07-21 Simon and Schuster 978-1-59477-785-1 208 en व्युत्पत्ति कनकधारा का अर्थ है – “स्वर्ण (कनक) की धारा (प्रवाह)”। इस स्तोत्र को यह नाम इस कारण प्राप्त हुआ कि परम्परा के अनुसार जब आदि शंकराचार्य ने इसका पाठ किया, तब महालक्ष्मी देवी ने उनके निर्धन ब्राह्मण उपकारक के कुटीर में स्वर्णधारा का वर्षण किया।https://books.google.com/books?id=3FwoDwAAQBAJ&dq=kanakadhara+lakshmi&pg=PT208 Shakti: Realm of the Divine Mother Vanamali 2008-07-21 Simon and Schuster 978-1-59477-785-1 208 en वर्णन यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य, जो एक परमपूज्य हिन्दू दार्शनिक थे, से सम्बद्ध है। परम्परा के अनुसार, बालक शंकराचार्य भिक्षा हेतु गृहनिर्गत हुए और एक अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मणी के गृहद्वार पर पहुँचे। उस गृहिणी के पास भक्ष्य पदार्थ कुछ भी न था। उसने व्याकुल होकर अपने गृह में खोज की और अन्ततः एक मात्र आँवला फल प्राप्त किया, जिसे उसने शंकराचार्य को अर्पित किया। उस स्त्री की अद्भुत निःस्वार्थता से शंकराचार्य अत्यन्त भावविभोर हुए और तत्काल काव्यरचना कर देवी लक्ष्मी की स्तुति में २२ श्लोक गाये। स्तोत्र की सौन्दर्यपूर्ण स्तुति से प्रसन्न होकर महालक्ष्मी ने उस ब्राह्मणी के गृह में स्वर्णफलरूप आँवले बरसाये।https://books.google.com/books?id=3FwoDwAAQBAJ&dq=kanakadhara+lakshmi&pg=PT208 Shakti: Realm of the Divine Mother Vanamali 2008-07-21 Simon and Schuster 978-1-59477-785-1 208 en स्तोत्र कनकधारा स्तोत्रम् का प्रथम श्लोक इस प्रकार है:https://books.google.com/books?id=3FwoDwAAQBAJ&dq=kanakadhara+lakshmi&pg=PT208 Shakti: Realm of the Divine Mother Vanamali 2008-07-21 Simon and Schuster 978-1-59477-785-1 208 en  अङ्गं हरेः पुलक-भूषणम् आश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् । अङ्गीकृताखिल विभूतिरपाङ्गलीला मा-गल्यदास्तु मम मङ्गल-देवतायाः ॥ कनकधारा स्तोत्र श्लोक १भावार्थ : श्रीहरि के शरीर में निवास करने वाली, जो परम आनन्द को भूषण रूप में धारण करती हैं; जैसे भृंग (भृङ्ग - मधुमक्खी) पुष्पित तमाल वृक्ष में आश्रय ग्रहण करता है; जो सम्पूर्ण विभूतियों की अधिष्ठात्री हैं; और जो स्वयं मंगलस्वरूपा (मङ्गलस्वरूपा) हैं, उनकी दृष्टि मेरे लिए कल्याणप्रदा हो। सम्बन्धित विषय अष्टलक्ष्मी स्तोत्र en Ashtalakshmi Stotra श्री स्तुति en Sri Stuti श्री सुक्त सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्री कनकधारा स्तोत्र सीखें कनकधारा स्तोत्र कहाँ पढ़ें श्रेणी:हिन्दू ग्रन्थ