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411 समाचार
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परिवार

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right|thumb|300px|सन् 1880 का एक मराठा परिवार परिवार (family) साधारणतया पति, पत्नी और बच्चों के समूह को कहते हैं, किंतु दुनिया के अधिकांश भागों में वह सम्मिलित वासवाले रक्त संबंधियों का समूह है जिसमें विवाह और दत्तक प्रथा स्वीकृत व्यक्ति भी सम्मिलित हैं। परिचय एवं महत्व सभी समाजों में बच्चों का जन्म और पालन पोषण परिवार में होता है। बच्चों का संस्कार करने और समाज के आचार व्यवहार में उन्हें दीक्षित करने का काम मुख्य रूप से परिवार में होता है। इसके द्वारा समाज की सांस्कृतिक विरासत एक से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। व्यक्ति की सामाजिक मर्यादा बहुत कुछ परिवार से ही निर्धारित होती है। नर-नारी के यौन संबंध मुख्यत: परिवार के दायरे में निबद्ध होते हैं। औद्योगिक सभ्यता से उत्पन्न जनसंकुल समाजों और नगरों को यदि छोड़ दिया जाए तो व्यक्ति का परिचय मुख्यत: उसके परिवार और कुल के आधार पर होता है। संसार के विभिन्न प्रदेशों और विभिन्न कालों में यद्यपि रचना, आकार, संबंध और कार्य की दृष्टि से परिवार के अनेक भेद हैं किंतु उसके यह उपर्युक्त कार्य सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। उसमें देश, काल, परिस्थिति और प्रथा आदि के भेद स एक या अनेक पीढ़ियों का और एक या अनेक दंपतियों अथवा पति-पत्नियों के समूहों का होना संभव है, उसके सदस्य एक पारिवारिक अनुशासन व्यवस्था के अतिरिक्त पति और पत्नी, भाई और बहन, पितामह और पौत्र, चाचा और भतीजे, सास और पुत्रवधू जैसे संबंधों तथा कर्तव्यों एवं अधिकारों से परस्पर आबद्ध, अन्य सामाजिक समूहों के संदर्भ में एक घनिष्ठतम अंतरंग समूह के रूप में रहते हैं। परिवार के दायरे में स्त्री और पुरुष के बीच कार्यविभाजन भी सार्वत्रिक और सार्वकालिक है। स्त्रियों का अधिकांश समय घर में व्यतीत होता है। भोजन बनाना, बच्चों की देख रेख और घर की सफाई करना और कपड़ों की सिलाई आदि ऐसे काम हैं जो स्त्री के हिस्से में आते हैं। पुरुष बाहरी तथा अधिक श्रम के कार्य करता है, जैसे खेती, व्यापार, उद्योग, पशुचारण, शिकार और लड़ाई आदि। तब भी यह कार्यविभाजन सब समाजों में एक सा नहीं है, कोई बड़ी सामान्य सूची भी बनाना कठिन है क्योंकि कई समाजों में स्त्रियाँ भी खेती और शिकार जैसे कामों में हिस्सा लेती हैं। परिवार को सेंट जॉर्ज से विरासत में मिला है और सार्वभौमिक विवाह शहादत आदमी महिला और बच्चे और भगवान द्वारा चुनी गई भविष्यवाणियों की अवधारणा विरासत में मिली है। जीवन दिन का प्रकाश सूर्य का रात का चंद्रमा अंधेरा का अंधेरा मौत नींद और आत्मा की आत्महत्या और आत्मा कोमा मानव और सभी जीवित प्राणी के रूपों पृथ्वी बलिदान जीवित और मानव प्राणियों में समय अंतरिक्ष समय पृथ्वी पर सभी बुद्धिमान जीवन के तीन तरीके और परिवार की अवधारणाएं हैं जो आज दुनिया के पैर हैं। उत्पत्ति मानव सभ्यता की पहली संस्कृति पवित्र जॉर्ज मैं भगवान के साथ बना रहा था परिवार के भाग्य दिन का भाग्य रात की नींद सपने की नींद आदमी औरत में तीन मानव ressures और एण्ड्रोजन माँ Androjan mammy महिला बच्चे और archet पिता पिता पुरुष बच्चे और रात की किस्मत चंद्रमा छाया अंधेरा है और यह परिवार के सूर्य के प्रकाश के दिन का भाग्य बनाता है क्योंकि यह सार्वभौमिक रूप से एकजुट होता है। विवाह के रूपों से परिवार के रूपों का घनिष्ठ संबंध है। लेविस मार्गन आदि विकासवादियों का मत है कि मानव समाज की प्रारंभिक अवस्था में विवाह प्रथा नहीं थी और पूर्ण कामाचार प्रचलित था। इसके बाद सामाजिक विकासक्रम में यूथ विवाह (कई पुरुषों और कई स्त्रियों का सामूहिक रूप से पति पत्नी होना), बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व और एकपत्नीत्व या एकपतित्व की अवस्था आई। वस्तुत: बहुविवाह और एकपत्नीत्व की प्रथा असभ्य और सभ्य सभी समाजों में पाई जाती है। अत: यह मत साक्ष्यसंमत नहीं प्रतीत होता। मानव शिशु के पालन पोषण के लिए लंबी अवधि अपेक्षित है और पहले बच्चें की बाल्यावस्था में ही अन्य छोटे बच्चे उत्पन्न होते रहते हैं। गर्भावस्था और प्रसूतिकाल में माता की देख-रेख आवश्यक है। फिर, पशुओं की भाँति मनुष्य में रति की कोई विशेष ऋतु नहीं है। अत: संभवत: मानव समाज के प्रारंभ में या तो पूरा समुदाय या फिर पति पत्नी तथा बच्चों का समूह ही परिवार था। मानव वैज्ञानिकों को कोई ऐसा समाज नहीं मिला जहाँ विवाह संबंध परिवार के अंदर ही होते हों, अत: पितृस्थानीय परिवार में पत्नी को और मातृस्थानीय परिवार में पति को अतिरिक्त सदस्यता प्रदान की जाती है। युगल परिवार में पति और पत्नी मिलकर अपनी पृथक् गृहस्थी स्थापित करते हैं। किंतु अधिकांश समाजों में यह परिवार बृहत्तर कौटुंबिक समूह का अंग माना जाता है और जीवन के अनेक प्रसंगों में परिवार पर बृहत्तर कौटुबिक समूह का, घनिष्ठ संबध के अतिरिक्त, नियंत्रण होता है। अमरीका जैसे उद्योगप्रधान देशों में कुटुंबियों के सम्मिलित परिवार के स्थान पर युगल परिवार की बहुलता हो गई है। यद्यपि वहाँ का समाज पितृवंशीय है, फिर भी युगल परिवार वहाँ किसी एक बृहत्तर कुटुंब का अंग नहीं माना जाता। युगल परिवार में पति पत्नी और, पैदा होने पर, उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। सम्मिलित परिवारों में इनके अतिरिक्त विवाहित बच्चे और उनकी संतान, विवाहित भाई अथवा बहन और उनके बच्चे साथ रह सकते हैं। सम्मिलित परिवार में रक्त संबंधियों की परिधि भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न है। भारत जैसे देश में एक सम्मिलित परिवार में साधारणत: 10-12 सदस्य होते हैं, किंतु कुछ परिवारों में सदस्यों की संख्या 50-60 या 100 तक होती है। विवाह, वंशावली, स्वामित्व और शासनाधिकार के विभिन्न रूपों के आधार पर परिवारों के विभिन्न रूप और प्रकार हो जाते हैं। मातृस्थानीय परिवार में पति अपनी पत्नी के घर का स्थायी या अस्थायी सदस्य बनता है, जबकि पितृस्थानीय परिवार में पत्नी पति के घर जाकर रहती है। मातृस्थानीय परिवार साधारणत: मातृवंशीय और पितृस्थानीय परिवार पितृवंशीय होते हैं। बहुधा परिवार की संपत्ति का स्वामित्व पितृस्थानीय परिवार में पुरुष को और मातृस्थानीय परिवार में नारी को प्राप्त है। प्राय: संपत्ति का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ संतान होती है। किंतु यह आवश्यक नहीं है। भारत की गारो जैसी जनजाति में सबसे छाटी लड़की ही पारिवारिक संपत्ति की स्वामिनी होती है। अनेक समाजों में परिवार के सभी स्त्री या पुरुष सदस्यों में स्वमित्व निहित होता है और कुछ में पुरुष तथा स्त्री दोनों को संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त है। परिवार का शासन अधिकांश समाजों में पुरुषों के हाथ होता है। अंतर इतना है कि पितृवंशीय परिवारों में साधारणत: पिता अथवा घर का सबसे बड़ा पुरुष और मातृवंशीय परिवारों में मामा या माता का अन्य सबसे बड़ा रक्तसंबंधी (पुरुष) घर का मुखिया होता है। अत: संसार के अधिकांश भागों में और समाजों में पुरुष की प्रधानता पाई जाती है। संसार में दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है, यद्यपि अनेक समाजों में पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की भी छूट है। इसके विपरीत टोडा और खस जनजातियों में और तिब्बत के कुछ प्रदेशों में बहुपति प्रथा तथा एक प्रकार के यूथ विवाह की प्रथा है। इसी प्रकार भारत में खासी, गारो और अमरीका में होपी, हैडिया जैसी जनजातियाँ भी हैं जो मातृस्थानीय और मातृवंशीय हैं। विवाह के इन रूपों में परिवार की रचना और स्वरूप में अंतर पड़ जाता है। आधुनिक औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परिवार की रचना और कार्यों में गंभीर परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं। पहले सभी समाजों में परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक संस्था थी। जीवन का अधिकांश व्यापार परिवार के माध्यम से संपन्न होता था। इन औद्योगिक समाजों में परिवार अब उत्पादन की इकाई नहीं है। बच्चों के शिक्षण का कार्य शिक्षण संस्थाओं ने लिया है। रसोई का कार्य व्यावसायिक भोजनालयों तथा जलपानगृहों में चला गया है। मनोरंजन के लिए पृथक् संगठन स्थापित हो गए हैं। सामाजिक सुरक्षा का उत्तरदायित्व राज्य के पास चला गया और धर्म के घटते हुए प्रभाव के कारण धार्मिक कृत्यों का स्थान गौण को गया है। पति और पत्नी का अधिकांश समय घर के बाहर व्यतीत होता है। फिर भी परिवार बना हुआ है और उसके द्वारा कुछ महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं, जिन्हें परिवार का स्थायी या अवशिष्ट कार्य कहा जाता है। उत्तर वैदिक काल में संयुक्त परिवार के विघटन की अनुभूति होने लगी, परन्तु आर्यों में मुख्यतः संयुक्त परिवार की परम्परा अभी भी प्रचलित थी। स्मृतियों में भी संयुक्त परिवारों का वर्णन मिलता है, परन्तु "एकल या स्वतंत्र परिवार" का समर्थन भी इसी युग का है।अध्याय – 26 – भारत में परिवारिक जीवन (अ) https://www.bharatkaitihas.com/family-life-in-india-part-a/ bharatkaitihas.com 7 मार्च 2023 कबीली परिवार जनजातियों में, जो सामाजिक विकासक्रम में आदिम अवस्था के अधिक निकट हैं, विवाह और परिवार के प्राय: सभी प्रकार मिलते हैं। इन विभिन्न प्रकारों में विकासक्रम की दृष्टि से पूर्वापर क्रम निर्धारित करना संभव नहीं है। कंद मूल और शिकार पर बसर करनेवाले अंडमानी आदिमवासियों में एकपत्नीत्व का नियम है और वे पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय हैं। उत्तरी अमरीका के खेतिहर होपी कबीले में एकपत्नीत्व या एकपतित्व की प्रथा है किंतु व मातृवंशीय और मातृस्थानीय है। अधिकांश जनजातीयों में परिवार का संयुक्त रूप है, किंतु जहाँ पति पत्नी अलग घर में रहते हैं, वे भी एक बृहत्तर परिवार के अंग होते हैं और यह परिवार सम्मिलित सम्पत्ति, आर्थिक क्रियाओं, धार्मिक कृत्यों तथा अनेक परिवारिक अधिकारों एवं कर्तव्यों आदि से ग्रथित एक पृथक् इकाई होता है। वंशावली के दो प्रकारों में से कोई कबीला या तो पितृवंशीय होता है या मातृवंशीय। जो कबीले मातृवंशीय हैं वे प्राय: मातृस्थानीय भी हैं, जहाँ पति परिवार का स्थायी या अस्थायी सदस्य होता है। गारो कबीले में तो वह आगंतुक मात्र है, जो रात भर का मेहमान होता है। किंतु मातृवंशीय और मातृस्थानीय कबीले बहुत कम हैं। बहुपतित्व कबीले तो और भी कम हैं। पितृवंशीय कबीलों में ही बहुपति प्रथा पाई गई है और इनमें नारी का वर्जा पुरुष की अपेक्षा हीन है। पितृस्थानीय कबीलों में पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने की प्राय: छूट है, किंतु ऐसा बहुत कम होता है कि विशिष्ट तथा शक्तिशाली लोग ही ऐसा कर पाते हैं। ऐसी अवस्था में पत्नियाँ एक घर में भी रहती हैं और पास पास बने अलग अलग घरों में भी। यूथ विवाह अपने शुद्ध रूप में किसी भी कबीले में नहीं मिलता। जौनसार बाबर में भ्रातुक बहुपति प्रथा है। वहाँ सगे भाई कभी कभी एक से अधिक पत्नियाँ रख लेते हैं और वे सब भाइयों की सामूहिक पत्नियाँ होती हैं, जो एक गृहस्थी तथा परिवार का अंग होती हैं। मातृवंशीय और मातृस्थानीय कबीलों में भी शासक वर्ग पुरुष है, किंतु नारी के अधिकारों तथा प्रतिष्ठा की दृष्टि से पितृवंशीय और पितृस्थानीय कबीलों की अपेक्षा इनकी स्थिति प्राय: अच्छी है। कई पितृवंशीय कबीलों में भी नर और नारी का दर्जा लगभग समान है, तथापि अधिकांश कबीलों में पुरुष की अपेक्षा उसका दर्जा हीन है। कबीलों में विवाहविच्छेद और पुनर्विवाह का नियम है और इस संबंध से स्त्री और पुरुष को प्राय: समान अधिकार हैं। वास्तव में अधिकांश कबीले पितृवंशीय हैं और नारी को विवाह के बाद पुरुष के परिवार, कुटुंब और बस्ती में जाना पड़ता है, जहाँ पति के माता, पिता, भाई तथा अन्य रक्त संबंधी और मित्र होते हैं। वहाँ उसे पति के कुटुबं का अंग होकर उसे बड़े लोगों के अनुशासन में रहना होता है और पति के कुलाचार का पालन करना होता है। विवाहविच्छेद की अवस्था में नारी को अपने माता पिता को शरण लेनी पड़ती है। मातृस्थानीय कबीलों में परिवार अधिक स्थायी दिखाई पड़ता है। यह रक्तसंबंधियों का नैसर्गिक समूह मालूम पड़ता है। बहुत कम कबीले ऐसे हैं जहाँ लड़के या लड़कियों को विवाह के पहले ब्रह्मचर्य पालन का नियम हो। कुछ कबीलों में विवाह के पूर्व परीक्षण काल की व्यवस्था होती है। जौनसार बाबर के खसों में अभ्यागतों के स्वागत में परिवार की अविवाहित लड़कियों का संभोग के लिए प्रस्तुत करने की प्रथा है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि परिवार का अस्तित्व नर नारी की वासनातृप्ति के लिए नहीं है, बल्कि परिवार द्वारा उसे मर्यादित किया जाता है। भारत में परिवार भारत मुख्यतः कृषिप्रधान देश है और यहाँ की पारिवारिक रचना प्राय: कृषि की आवश्यकताओं से प्रभावित है। इसके अतिरिक्त भारतीय परिवार की मर्यादाएँ और आदर्श परंपरागत है। किसी अन्य समाज़ में गृहस्थ जीवन की इतनी पवित्रता तथा पिता, पुत्र भाई भाई और पति पत्नी के इतने स्थायी संबंधों का उदाहरण नहीं मिलता। यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों और जतियों में सांपत्तिक अधिकार, विवाह तथा विवाहविच्छेद आदि की प्रथा की दृष्टि से अनेक भेद पाए जाते हैं तथापि संयुक्त परिवार का आदर्श सर्वमान्य है। संयुक्त परिवार में संबंधियों का दायरा पति, पत्नी तथा उनकी अविवाहित संतानों से भी अधिक व्यापक होता है। बहुधा उसमें तीन पीढ़ियों और कभी कभी इससे भी अधिक पीढ़ियों के व्यक्ति एक घर में एक ही अनुशासन में और एक रसोईघर से संबंध रखते हुए सम्मिलित संपत्ति का उपभोग करते हैं और परिवार के धार्मिक कृत्यों तथा संस्कारों में भाग लेते हैं। यद्यपि मुसलमानों और ईसाइयों में संपत्ति के नियम भिन्न हैं, तथापि संयुक्त परिवार के आदर्श, परंपराएँ और प्रतिष्ठा के कारण इन सांपत्तिक अधिकारों का व्यावहारिक पक्ष परिवार के संयुक्त रूप के अनुकूल ही रहता है। संयुक्त परिवार का मूल भारत की कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त प्राचीन परंपराओं तथा आदर्श में है। रामायण और महाभारत की गाथाओं द्वारा यह आदर्श जन जन तक पहुँचते हैं। कृषि ने सर्वत्र ही पारिवारिक जीवन की स्थिरता प्रदान की है। अत: भारतीय समाज में परंपरा से उत्पादन कार्य, उपभोग और सुरक्षा की बुनियादी इकाई परिवार है। अपवादों को छोड़कर भारतीय समाज पितृवंशीय, पितृस्थानीय और पितृभक्त है। यहाँ पुरुष की अपेक्षा नारी का दर्जा हीन माना जाता है। संपत्ति पर नारी का बहुत सीमित अधिकार माना गया है। फिर भी, गृहस्थी के अनेक मामलों में उसकी महत्ता स्वीकृत है। साधारणत: एक विवाह की मान्यता है। किंतु पुरुष को एकाधिक विवाह करने का अधिकार है। परंपरागत आदर्श के अनुसार विधवा विवाह का निषेध है, किंतु विधुर विवाह कर सकता है। पतिव्रता धर्म की बहुत महिमा है। पितर पूजा का भी भारी महत्व है। उच्च जातियों को छोड़कर अन्य सभी जातियों में प्राय: विवाह विच्छेद और विधवा विवाह प्रचलित है। परंतु जब कोई जाति अपनी मर्यादा को ऊँचा करना चाहती है तो इन दोनों प्रथाओं का निषेध कर देती है। घर का सबसे अधिक वयोवृद्ध पुरुष, यदि वह कार्यनिवृत्त न हो गया हो तो संयुक्त परिवार का कर्ता अथवा मुखिया होता है। कहीं कहीं उसे मालिक (स्वामी) भी कहते हैं। यह कर्ता अन्य वयोवृद्ध या वयस्क सदस्यों की सलाह से या उसके बिना ही परंपरा के आधार पर परिवार में कार्यविभाजन, उत्पादन, उपभोग आदि की व्यवस्था करता है और परिवार तथा उसके सदस्यों से संबधित सामाजिक महत्व के प्रश्नों का निर्णय करता है। घर की सबसे वयोवृद्ध नारी परिवार के महिला वर्ग की मुखिया होती है और जो कार्य महिलाओं के सुपुर्द है उनकी देखरेख तथा व्यवस्था करती है। भोजन तैयार करना बच्चों का पालन पोषण करना तथा कताई आदि महिलाओं के मुख्य काम हैं। यों वे खेती के या व्यवसाय के कुछ मामूली कार्यों में भी हाथ बँटाती हैं। संयुक्त परिवार में चाचा, ताऊ की विवाहित संतान और उसके विवाहित पुत्र, पौत्र आदि भी हो सकते हैं। साधारणतया पिता के जीवन में उसके पुत्र परिवार से अलग होकर स्वतंत्र गृहस्थी नहीं बसाते, किंतु यह अभेद्य परंपरा नहीं है। ऐसा समय आता है जब रक्तसंबंधों की निकटता के आधार पर एक संयुक्त परिवार दो या अनेक संयुक्त अथवा असंयुक्त परिवारों में विभक्त हो जाता है। असंयुक्त परिवार भी कालक्रम में संयुक्त रूप ले लेता है और संयुक्त परिवार का क्रम बना रहता है। संयुक्त परिवार और परिवर्तन संयुक्त परिवारप्रणाली यद्यपि बहुत प्राचीन है, तथापि इसके आंतरिक स्वरूप में बहिर्विवाह, उत्तराधिकार तथा सांपत्तिक अधिकार के नियमों में, कालक्रम में परिवर्तन होता रहा है। औद्योगिक क्रांति ने पाश्चात्य देशों में परंपरागत संयुक्त परिवार भंग कर दिया है जिसका कारण बढ़ते हुए यंत्रीकरण के फलस्वरूप व्यक्ति को परिवार से बाहर मिली आजीविका सुरक्षा और उन्नति की सुविधाओं को बताया जाता है। भारत में भी औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप नई अर्थव्यवस्था और नए औद्योगिक तथा आर्थिक संगठनों का आरंभ हो चुका है। यातायात तथा संचार के नए साधन उपलब्ध हो रहे हैं और नगरीकरण तीव्रता से हो रहा है। पाश्चात्य विचारधारा और पाश्चात्य ढंग की शिक्षा दीक्षा तथा आदर्शों का प्रभाव भी कम नहीं है। लोग एक शहर से दूसरे शहर काम के लिए जाने लगे है जिस कारण परिवारों की संख्या भी काम होती जा रही है।Parivar Wali Shayari Hindi Mein https://shayariwali.com/parivar-wali-shayari/ shayariwali.com 7 मार्च 2023 विशेषकर स्वाधीनता के बाद विवाह, उत्तराधिकार, दत्तकग्रहण और सांपत्तिक अधिकार के संबंध में जा कानून लागू किए गए हैं उन्हें परिवार की संयुक्त प्रणाली के लिए हानिकारक समझा जाता है। इसी प्रकार आयकर के नियम भी इसके प्रतिकूल पड़ते हैं। वयस्क मताधिकार राजनीतिक लोकतंत्र भी संयुक्त परिवार के एकसत्तात्मक तथा व्यष्टिपरक अस्तित्व पर प्रहार कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब अर्थव्यवस्था और उत्पादन के साधनों में भी बुनियादी परिवर्तन हो रहा है, परिवार के शासन, रचना और कार्यों में हेरफेर होना अवश्यंभावी है और वह परिलक्षित भी हो रहा है। किंतु अभी यह कहना कठिन है कि परिवार का संयुक्त रूप समाप्त हो रह है। नगरों और ग्रामों में संयुक्त परिवार पहले से कम हो गए हैं, इसका कोई प्रमाण नहीं है। परिवर्तन के संबंध में विद्वानों में मुख्यत: दो प्रकार का विचार है। एक विचार के अनुसार परिस्थिति के प्रभावस्वरूप परिवार में कतिपय परिवर्तन होने पर भी उसका संयुक्त रूप नष्ट नहीं हो रहा है। दूसरे विचार के अनुसर औद्योगिक सभ्यता भारत में भी संयुक्त परिवार को बहुत कुछ उसी युगल परिवार के रूप में उपस्थित करेगी जो अमरीका तथा यूरोप में प्रादुर्भूत हुआ है। वर्तमान पारिवारिक विघटन एंव परिवर्तनों को इस प्रक्रम की आरंभिक अवस्था बताया जाता है। भारत में मातृवंशीय और बहुपति परिवार भारत के मालावार प्रदेश में नायर और तिया जाति में मातृ स्थानीय तथा मातृवंशी परिवार हाल तक रहा है। ऐसे परिवारों में पति अपने बच्चों के घर में एक अस्थायी आगंतुक होता है। उसके बच्चों की देखभाल उसका मामा करता है और उसके बच्चे अपनी माँ के परिवार का नाम ग्रहण करते हैं। परिवार का रूप संयुक्त है, जिसमें माँ की और उसकी पुत्री अथवा पौत्रियों की संतान होती है। इन परिवारों में घर का मुखिय मातृपक्षीय पुरुष होता है। असम राज्य के गारो और खासी जनजातियों में भी मातृवंशीय और मातृस्थानीय परिवार की प्रथा है। उत्तर प्रदेश के जौनसार बाबर में खस नाम की जनजाति में और आस पास के कुछ क्षेत्रों में बहुपति प्रथा है। परिवार में सब भाइयों की एक पत्नी और कभी-कभी एकाधिक सामूहिक पत्नियाँ हेती हैं। नीलगिरि की टोडा जनजाति में भी बहुपति प्रथा है, किंतु यहाँ एक स्त्री के पतियों में भाइयों के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति भी हो सकते हैं। गैर जनजातीय समाज में कहीं भी बहुपति प्रथा नहीं मिलती। हिन्दी मे पारिवारिक संबंधो के नाम नाना : माँ का पिता नानी : माँ की माँ मामा : माँ का भाई मामी : मामा की पत्नी मौसी : माँ की बहन मौसा : मौसी का पति दादा : पिता का पिता दादी : पिता की माँ पड़ दादा : दादा का पिता पड़ दादी : दादी का माँ ताऊ : पिता का बड़ा भाई ताई : ताऊ की पत्नी चाचा : पिता का छोटा भाई चाची :चाचा की पत्नी बुआ : पिता की बहन फूफा : बुआ का पति जेठ : पति का बड़ा भाई जेठानी :जेठ की पत्नी देवर : पति का छोटा भाई देवरानी : देवर की पत्नी नन्द : पति की बहन नंदोई : नन्द का पति साला : पत्नी का भाई सलज : साले की पत्नी साली : पत्नी की बहन साडू : साली का पति भाभी : भाई की पत्नी जीजा :बहन का पति पोता : बेटे का बेटा पोती : बेटे की बेटी नाती : बेटी का बेटा नातिन : बेटी की बेटी भतीजा : भाई का बेटा भतीजी : भाई की बेटी भांजी : बहन की बेटी भांजा : बहन का बेटा दीदी: भाई की बड़ी बहन भाईया - बहन की भाई चित्र दीर्घा सन्दर्भ 2 बाहरी कड़ियाँ अगर माँ बाप ने प्यार करना बंद किया तो क्या होगा - पढ़िए https://web.archive.org/web/20200220082733/https://www.amjoys.in/2020/02/moral-story-in-hindi-family.html 20 फ़रवरी 2020 Family Research Laboratory Family evolution and contemporary social transformations (A page of Estación de Economía Política) Family Facts: Social Science Research on Family, Society & Religion (a Heritage Foundation site) One Plus One Families Australia - independent peak not-for-profit organisation United Families International International organisation UN - Families and Development Family, marriage and "de facto" unions - vatican.va श्रेणी:समाज