411 REFERENCE · Wikipedia
मिथिला संस्कृत स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध संस्थान, दरभंगा
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
मिथिला संस्कृत शोध संस्थान
हिन्दी
मिथिला संस्कृत स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध संस्थान, दरभंगा
उद्घाटन तिथि
21 नवम्बर 1951
उद्घाटनकर्ता
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
शोध संस्थान
16 जून 1951
महाराजा कामेश्वर सिंह
बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग से
हिन्दू धर्म
कबड़ाघाट
दरभंगा
भारत
नगरीय
परिसर का क्षेत्रफल
62 बीघा
अन्य नाम
मिथिला संस्कृत स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध संस्थान
मिथिला शोध संस्थान
मिथिला संस्थान
मिथिला संस्कृत शोध संस्थान बिहार के दरभंगा के कबड़ाघाट में स्थित एक शोध संस्थान है। इसका शिलान्यास 21 नवंबर 1951 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया था। इस संस्थान में करीब साढ़े 12 हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ हैं। इनमें संस्कृत साहित्य, न्याय शास्त्र, मीमांसा और धर्म के अलावा कई विषयों की दुर्लभ पांडुलिपियां शामिल हैं, जो मिथिलाक्षर, संस्कृत, उड़िया और पालि जैसी भाषाओं में लिखी हैं। पिछले सालों में इस संस्थान में भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन समेत विश्व के कई देशों के शोधार्थी शोध के लिए आते रहे हैं।
यह संस्थान चारों ओर से बागमती नदी से घिरे निर्जन स्थान पर अवस्थित है। इस संस्थान का परिसर विभिन्न प्रजातियों के फलदार वृक्ष यथा आम, लीची, बेल, कटहल आदि के पेड़-पौधों से सुसज्जित है, जिससे बिहार सरकार को प्रति वर्ष फलों/गड्ढों की बन्दोवस्ती एवं सूखे वृक्षों की नीलामी से लाखों रुपये राजस्व की प्राप्ति होती है।
इतिहास
गुरुकुल परंपरा के अनुरूप महाराजा कामेश्वर सिंह ने ही इस संस्थान की परिकल्पना की थी और अपनी 40 एकड़ जमीन दान में देकर इसकी स्थापना की थी। इसके साथ ही उन्होंने अपने राजकीय कोष से 3,50,000 रुपये की धनराशि भवन निर्माण के लिए दिया। महाराजा कामेश्वर सिंह के प्रोत्साहन से शिक्षाविद् आचार्य बदरीनाथ वर्मा एवं तत्कालीन शिक्षा सचिव माननीय जे०सी० माथुर ने इस संस्थान को संचालित करने में मुख्य भूमिका निभाई।
अकादमिक गतिविधियां
संस्कृत विद्या के विभिन्न शाखाओं के अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ इससे संबंधित उच्च स्तरीय अनुसंधान को प्रोत्साहित करना इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य है। इसके साथ ही प्राचीन भारत की आध्यात्मिक परंपराओं का समुचित प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण करना है। साथ ही संस्कृत के मूल ग्रंथों का गंभीर अध्ययन व शोध की आधुनिक पद्धतियों का उपयोग भी इसका उद्देश्य है। मिथिला संस्कृत शोध संस्थान
वैदिक साहित्य, मीमांसा एवं धर्मशास्त्र, न्याय एवं वैशेषिक, वेदांत में शंकर मत, वैष्णव वेदांत में रामानुजाचार्य, माधवाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, निम्बार्काचार्य आदि विषयों में स्नातकोत्तर में अध्ययन का प्रावधान है। इसके साथ ही आगम और तंत्र, काव्य एवं साहित्य, सांख्य एवं योग, ज्योतिष, व्याकरण व पुराण एवं इतिहास में अध्ययन का प्रावधान है। संस्थान में करीब 12 हजार दुर्लभ पाण्डुलिपियों की अमूल्य धरोहर है। इसमें 9वीं से लेकर 18वीं सदी के विद्वानों की पाण्डुलिपियाँ हैं। इसके साथ ही संस्थान की ओर से कई दुर्लभ ग्रंथों का भी प्रकाशन किया गया है।उपेक्षा:71 साल बाद भी उद्देश्य पूरा नहीं कर सका मिथिला संस्कृत शोध संस्थान
जिर्णोद्धार
बिहार के दीर्घकाल तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार ने इस ऐतिहासिक धरोहर को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने और इसके शैक्षणिक स्वरूप को वापस लौटाने का संकल्प लिया था। बिहार सरकार ने 48.64 करोड़ रुपये की लागत से परिसर विकास, नए भवन निर्माण और पांडुलिपि संरक्षण की योजना को मंजूरी दी है।मिथिला शोध संस्थान का होगा कायाकल्प हाल में ही ऑक्सफोर्ड टेक्स्ट सोसायटी ने इस संस्थान के साथ पाण्डिलिपियों के संरक्षण के लिये एक समझौता किया है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने मिथिला शोध संस्थान से करार के लिये किया आग्रहTo Preserve Over 12,000 Rare Sanskrit Manuscripts, Oxford Sanskrit Text Society Requests MoU With Mithila-Based Research Body
इन्हें भी देखें
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय
बाहरी कड़ियाँ
मिथिला संस्कृत शोध संस्थान का जालघर
सन्दर्भ
श्रेणी:संस्कृत