Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

तुलसीदास

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

गोस्वामी तुलसीदास Tulsidas composing his famous Avadhi Ramcharitmanas.jpg 150px तुलसीदास अपने प्रसिद्ध रामचरितमानस की रचना करते हुए 11 अगस्त 1497 (सम्वत् 1554 वि०, श्रावण शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार)अविनाशराय ब्रह्मभट्ट द्वारा रचित "तुलसी प्रकाश" राजापुर अथवा सोरों, उत्तर प्रदेश, भारत रामबोला दुबे 30 अगस्त 1623 (सम्वत् 1680 वि०, श्रावण शुक्ल सप्तमी, गुरुवार) वाराणसी संत नरहरीदास गोस्वामी, अभिनववाल्मीकि, रसिकचुड़ामणि इत्यादि सीयराममय सब जग जानी।करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ (रामचरितमानस १.८.२) रामचरितमानस विनयपत्रिकादोहावली कवितावली हनुमान चालीसा वैराग्य संदीपनी बरवै रामायण गीतावली जानकी मंगल पार्वतीमंगलहनुमान बाहुक तुलसी सतसई भूशुंडी रामायण रामलला नहूछू भारतीय thumb रामबोला दुबे (rɑːmboːlɑː d̪ʊbeː; 11 अगस्त 1497 — 30 अगस्त 1623), गोस्वामी तुलसीदास (goːsʋɑːmiː t̪ulɐsiːd̪ɑːsɐ) के नाम से प्रसिद्ध; मध्यकालीन हिन्दी साहित्य के महान रामभक्त इव कवि थे। उन्होने रामचरितमानस और हनुमान चालीसा जैसे विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है। इन्हें आदिकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। श्रीरामचरितमानस का कथानक रामायण से लिया गया है। ब्रजावधी में रचित श्रीरामचरितमानस लोकग्रन्थ है और इसे उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद ब्रजभाषा में रचित विनय पत्रिका उनका एक अन्य महत्त्वपूर्ण काव्य है। महाकाव्य श्रीरामचरितमानस को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में 46वाँ स्थान दिया गया। तुलसीदास जी रामानंद संप्रदाय के अनुयायी थे।http://kumarparal.hubpages.com/hub/TOP-100-FAMOUS-EPICS-OF-THE-WORLD Top 100 famous epics of the World विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ प्रसिद्ध काव्य en 15 दिसम्बर 2013 https://web.archive.org/web/20131214041148/http://kumarparal.hubpages.com/hub/TOP-100-FAMOUS-EPICS-OF-THE-WORLD 14 दिसंबर 2013 dead तुलसीदास ने अपना अधिकांश जीवन बनारस (आधुनिक वाराणसी) और अयोध्या शहरों में बिताया।Dahal Bishnu Prasad 2020-12-31 Significance of Hindu Pilgrimage; study of Pashupathinath and Kashi Vishwonath https://doi.org/10.3126/pragya.v7i1.35041 Patan Pragya 7 1 43–54 10.3126/pragya.v7i1.35041 2594-3278 वाराणसी में गंगा पर तुलसी घाट का नाम उनके नाम पर रखा गया है। उन्होंने वाराणसी में संकट मोचन हनुमान मंदिर की स्थापना की, ऐसा माना जाता है कि यह उस स्थान पर है जहाँ उन्होंने देवता के दर्शन किए थे।Banaras: vision of a living ancient tradition Callewaert Winand M. Schilder Robert 2000 Hemkunt Publishers 978-81-7010-302-8 New Delhi engsanतुलसीदास ने रामलीला नाटकों की शुरुआत की, जो रामायण का एक लोक-नाट्य रूपांतरण था।94 His Manner of Life 1959-01-01 https://doi.org/10.1093/oseo/instance.00253931 The Oxford Book of Medieval Latin Verse Oxford University Press 978-0-19-812119-0 2025-03-21 जन्म तुलसीदास का जन्म हिन्दू कैलेण्डर माह श्रावण (जुलाई-अगस्त) के उज्ज्वल आधे, शुक्ल पक्ष के सातवें दिन सप्तमी (11 अगस्त 1497) उत्तर प्रदेश के सोरों गाँव मे हुआ था। यद्यपि उनके जन्मस्थान के रूप में तीन स्थानों का उल्लेख किया गया है, वर्तमान विद्वान वर्तमान उत्तर प्रदेश के राजापुर को उनका जन्मस्थान बताते हैं। २०१२ में सोरों को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से तुलसी दास का जन्मस्थान घोषित किया गया था। उनके माता-पिता हुलसी और आत्माराम दुबे थे। अधिकांश स्रोत उन्हें भारद्वाज गोत्र (वंश) के सनाढ्य ब्राह्मण के रूप में पहचानते हैं। तुलसीदास और सर जॉर्ज ग्रियर्सन उनके जन्म का वर्ष विक्रम 1568 (1511 ई॰) बताते हैं। इन जीवनीकारों में रामकृष्ण गोपाल भंडारकर, रामगुलाम द्विवेदी, जेम्स लोचटेफेल्ड, स्वामी शिवानंद और अन्य शामिल हैं। वर्ष 1497 भारत में और लोकप्रिय संस्कृति में कई वर्तमान जीवनियों में दिखाई देता है। इस वर्ष से असहमत जीवनीकार तर्क देते हैं कि इससे तुलसीदास का जीवनकाल 126 वर्ष के बराबर हो जाता है, जो उनके विचार में असम्भव नहीं तो कम नहीं है। इसके विपरीत, रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं कि तुलसीदास जैसे महात्मा (महान् आत्मा) के लिए 126 वर्ष की आयु असम्भव नहीं है। भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों ने लोकप्रिय संस्कृति में तुलसीदास के जन्म के वर्ष के अनुसार, वर्ष 2011 ई॰ में तुलसीदास की 500वीं जयन्ती मनाई। बचपन किंवदन्ती है कि तुलसीदास का जन्म बारह महीने गर्भ में रहने के पश्चात् हुआ था, जन्म के समय उनके मुँह में सभी बत्तीस दाँत थे, उनका स्वास्थ्य और रूप पाँच वर्ष के लड़के जैसा था, और वह अपने जन्म के समय रोए नहीं बल्कि राम का उच्चारण किया । इसलिए उनका नाम रामबोला (शाब्दिक रूप से, वह जिसने राम का उच्चारण किया) रखा, जैसा कि तुलसीदास स्वयं विनय पत्रिका में बताते हैं। मूल गोसाईं चरित के अनुसार, उनका जन्म अभुक्तमूल नक्षत्र के तहत हुआ था, जो हिन्दू ज्योतिष के अनुसार पिता के जीवन के लिए तत्काल ख़तरा पैदा करता है। उनके जन्म के समय अशुभ घटनाओं के कारण, उन्हें चौथी रात को उनके माता-पिता ने त्याग दिया, अपनी रचनाओं कवितावली और विनय पत्रिका में, तुलसीदास ने अपने माता-पिता द्वारा अशुभ ज्योतिषीय विन्यास के कारण जन्म के बाद उन्हें त्यागने की पुष्टि की है। चुनिया बच्चे को अपने गाँव हरिपुर ले गई और साढ़े पाँच वर्ष तक उसकी देखभाल की, जिसके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। रामबोला को एक दरिद्र अनाथ के रूप में स्वयं की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया गया था, और वह भिक्षा मागते हुए दर-दर भटकता रहा। ऐसा माना जाता है कि देवी पार्वती ने एक ब्राह्मण महिला का रूप धारण किया और रामबोला को हर दिन भोजन कराया। या वैकल्पिक रूप से, अनन्ताचार्य के शिष्य। रामबोला को तुलसीदास के नए नाम के साथ विरक्त दीक्षा (वैरागी दीक्षा) दी गई। तुलसीदास ने विनयपत्रिका के एक अंश में अपने गुरु के साथ पहली मुलाक़ात के दौरान हुए संवाद का वर्णन किया है । जब वे सात साल के थे, तो उनका यज्ञोपवीत (अर्थात् पवित्र धागा समारोह) माघ (जनवरी-फरवरी) के महीने के शुक्ल पक्ष के पाँचवें दिन अयोध्या में नरहरिदास द्वारा किया गया था, जो राम से संबंधित एक तीर्थ स्थल है। तुलसीदास ने अयोध्या में अपनी शिक्षा शुरू की। कुछ समय बाद, नरहरिदास उन्हें एक विशेष वराह क्षेत्र सोरों ( वराह को समर्पित मंदिर वाला एक पवित्र स्थान - विष्णु का वराह अवतार) ले गए, जहाँ उन्होंने पहली बार तुलसीदास को रामायण सुनाई। तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसका उल्लेख किया है: मय पुनि निज गुर सना सुनि कथा सो सूकरखेता। समुझि नहिं तासा बालापना तब अति रहेउ॥ और फिर, मैंने वही कथा अपने गुरु से सूकरखेत (वराह क्षेत्र) सोरों में सुनी। मुझे तब यह समझ में नहीं आया, क्योंकि मैं बचपन में पूरी तरह से ज्ञानहीन था। — रामचरितमानस 1.30 अधिकांश लेखक तुलसीदास द्वारा सन्दर्भित वराहक्षेत्र को सूकरक्षेत्र के साथ आधुनिक कासगंज में सोरों वराह क्षेत्र के रूप में पहचानते हैं, तुलसीदास ने रामचरितमानस में आगे उल्लेख किया है कि उनके गुरु ने उन्हें बार-बार रामायण सुनाई, जिससे उन्हें कुछ हद तक समझ में आया। तुलसीदास बाद में पवित्र शहर वाराणसी आए और गुरु शेष सनातन से 15-16 वर्षों की अवधि में संस्कृत व्याकरण, चार वेद, छः वेदांग, ज्योतिष और हिंदू दर्शन के छह विद्यालयों का अध्ययन किया, जो वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित थे। शेष सनातन नरहरिदास के मित्र और साहित्य और दर्शन के प्रसिद्ध विद्वान थे। विवाह और गृह त्याग तुलसीदास की वैवाहिक स्थिति के बारे में दो विपरीत विचार हैं। तुलसी प्रकाश और कुछ अन्य कार्यों के अनुसार , तुलसीदास का विवाह विक्रम सम्वत् 1604 (1561 ई।) में कार्तिक माह (अक्तूबर-नवम्बर) के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को रत्नावली से हुआ था। रत्नावली, गोण्डा ज़िले के नारायणपुर गाँव के पराशर गोत्र के ब्राह्मण दीनबन्धु पाठक की पुत्री थीं। उनका तारक नाम का एक पुत्र था, जो बचपन में ही मर गया था। एक बार जब तुलसीदास हनुमान मन्दिर गए थे, रत्नावली अपने भाई के साथ अपने पिता के घर गईं। जब तुलसीदास को यह पता चला, तो वे अपनी पत्नी से मिलने के लिए रात में सरजू नदी तैरकर पार गए। रत्नावली ने इसके लिए तुलसीदास को डांटा, तुलसीदास ने उसे तुरन्त छोड़ दिया और पवित्र शहर प्रयाग के लिए प्रस्थान किया। यहाँ, उन्होंने गृहस्थ अवस्था को त्याग दिया और एक साधु (तपस्वी) बन गए। कुछ लेखक तुलसीदास के विवाह प्रसंग को बाद में जोड़ा गया मानते हैं और कहते हैं कि वे ब्रह्मचारी थे। इनमें रामभद्राचार्य भी अनुर्भूक्त हैं, जो विनयपत्रिका और हनुमान बाहुक में दो श्लोकों का हवाला देते हैं कि तुलसीदास ने कभी विवाह नहीं किया और बचपन से ही साधु थे। भगवान श्री राम जी से भेंट कुछ काल राजापुर रहने के बाद वे पुन: काशी चले गये और वहाँ की जनता को राम-कथा सुनाने लगे। कथा के दौरान उन्हें एक दिन मनुष्य के वेष में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान ‌जी का पता बतलाया। हनुमान ‌जी से मिलकर तुलसीदास ने उनसे श्रीरघुनाथजी का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमान्‌जी ने कहा- "तुम्हें चित्रकूट में रघुनाथजी दर्शन होंगें।" इस पर तुलसीदास जी चित्रकूट की ओर चल पड़े। चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने रामघाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले ही थे कि यकायक मार्ग में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परन्तु उन्हें पहचान न सके। तभी पीछे से हनुमान जी ने आकर जब उन्हें सारा भेद बताया तो वे पश्चाताप करने लगे। इस पर हनुमान जी ने उन्हें सात्वना दी और कहा प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे। संवत्‌ 1607 की मौनी अमावस्या को बुधवार के दिन उनके सामने भगवान श्री राम जी पुनः प्रकट हुए। उन्होंने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा-"बाबा! हमें चन्दन चाहिये क्या आप हमें चन्दन दे सकते हैं?" हनुमान ‌जी ने सोचा, कहीं वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा: चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर। तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥ तुलसीदास भगवान श्री राम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गये। अन्ततोगत्वा भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गये। संस्कृत में पद्य-रचना thumb|तुलसीदास जी संवत् १६२८ में वह हनुमान जी की आज्ञा लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये। पर्व के छः दिन बाद एक वटवृक्ष के नीचे उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही कथा हो रही थी, जो उन्होने सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास जी प्रयाग से पुन: वापस काशी आ गये और वहाँ के प्रह्लादघाट पर एक ब्राह्मण के घर निवास किया। वहीं रहते हुए उनके अन्दर कवित्व-शक्ति का प्रस्फुरण हुआ और वे संस्कृत में पद्य-रचना करने लगे। परन्तु दिन में वे जितने पद्य रचते, रात्रि में वे सब लुप्त हो जाते। यह घटना रोज घटती। आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ। भगवान शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में काव्य रचना करो। तुलसीदास जी की नींद उचट गयी। वे उठकर बैठ गये। उसी समय भगवान शिव और पार्वती उनके सामने प्रकट हुए। तुलसीदास जी ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। इस पर प्रसन्न होकर शिव जी ने कहा- "तुम अयोध्या में जाकर रहो और हिन्दी में काव्य-रचना करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फलवती होगी।" इतना कहकर गौरीशंकर अन्तर्धान हो गये। तुलसीदास जी उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर काशी से सीधे अयोध्या चले गये। रामचरितमानस की रचना सवत्‌ 1631 का प्रारम्भ हुआ। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा ही योग आया जैसा त्रेतायुग में राम-जन्म के दिन था। उस दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। सम्वत्‌ 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये। राजापुर स्थित तुलसीदासजी का मंदिर, जहां तुलसीकृत रामायण की मूल प्रति सुरक्षित रखी गई है।|thumb इसके पश्चात् भगवान की आज्ञा से तुलसीदास जी काशी चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को श्रीरामचरितमानस सुनाया। रात को पुस्तक विश्वनाथ-मन्दिर में रख दी गयी। प्रात:काल जब मन्दिर के पट खोले गये तो पुस्तक पर लिखा हुआ पाया गया-सत्यं शिवं सुन्दरम्‌ जिसके नीचे भगवान शंकर की सही (पुष्टि) थी। उस समय वहाँ उपस्थित लोगों ने "सत्यं शिवं सुन्दरम्‌" की ध्वनि भी कानों से सुनी। इधर काशी के पण्डितों को जब यह बात पता चली तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बनाकर तुलसीदास जी की निन्दा और उस पुस्तक को नष्ट करने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भी भेजे। चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो युवक धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। दोनों युवक बड़े ही सुन्दर क्रमश: श्याम और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन करते ही चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भगवान के भजन में लग गये। तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया और पुस्तक अपने मित्र टोडरमल (अकबर के नौरत्नों में एक) के यहाँ रखवा दी। इसके बाद उन्होंने अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति से एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की गयीं और पुस्तक का प्रचार दिनों-दिन बढ़ने लगा। इधर काशी के पण्डितों ने और कोई उपाय न देख श्री मधुसूदन सरस्वती नाम के महापण्डित को उस पुस्तक को देखकर अपनी सम्मति देने की प्रार्थना की। मधुसूदन सरस्वती जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उस पर अपनी ओर से यह टिप्पणी लिख दी: आनन्दकानने ह्यास्मिंजंगमस्तुलसीतरुः। कवितामंजरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥ इसका हिन्दी में अर्थ इस प्रकार है — "काशी के आनन्द-वन में तुलसीदास साक्षात तुलसी का पौधा है। उसकी काव्य-मंजरी बड़ी ही मनोहर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा सदा मँडराता रहता है।" पण्डितों को उनकी इस टिप्पणी पर भी सन्तोष नहीं हुआ। तब पुस्तक की परीक्षा का एक अन्य उपाय सोचा गया। काशी के विश्वनाथ-मन्दिर में भगवान विश्वनाथ के सामने सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रों के नीचे पुराण और सबके नीचे रामचरितमानस रख दिया गया। प्रातःकाल जब मन्दिर खोला गया तो लोगों ने देखा कि श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है। अब तो सभी पण्डित बड़े लज्जित हुए। उन्होंने तुलसीदास जी से क्षमा माँगी और भक्ति-भाव से उनका चरणोदक लिया। मृत्यु गंगा नदी किनारे पर स्थित तुलसीदासजी का जर्जरित निवास स्थान|thumb तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात् घाट असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। सम्वत्‌ १६८० में श्रावण शुक्ल सप्तमी को तुलसीदास जी ने "राम-राम" कहते हुए अपना शरीर का परित्याग किया। जनमानस पर प्रभाव thumb अपने समय से ही तुलसीदास को भारतीय और पश्चिमी विद्वानों द्वारा उनकी कविता और हिंदू समाज पर उनके प्रभाव के लिए समान रूप से सराहा जाता रहा है। तुलसीदास ने अपनी रचना कवितावली में उल्लेख किया है कि उन्हें दुनिया में एक महान ऋषि माना जाता था। मधुसूदन सरस्वती , वाराणसी में स्थित अद्वैत वेदांत परंपरा के सबसे प्रशंसित दार्शनिकों में से एक और अद्वैतसिद्धि के रचयिता , तुलसीदास के समकालीन थे। रामचरितमानस को पढ़कर, वे चकित हो गए और महाकाव्य और रचयिता की प्रशंसा में निम्नलिखित संस्कृत छंद की रचना की। आनन्दकानने कश्चिज्जङगमस्तुलसीतरुः। कविता मंजरी यस्य रामभ्रमरभुषिता ॥ आनंदकानन कश्चिज्जंगमस्तुलसीतरु:। कविता मंजरी यस्य रामभ्रमरभूषिता ॥ इस वाराणसी (आनन्दकानन) स्थान में एक चलता-फिरता तुलसी का पौधा (अर्थात् तुलसीदास) है, जिसके फूलों की टहनी रूपी [यह] काव्य (अर्थात् रामचरितमानस) सदैव राम रूपी भौंरे से सुशोभित रहती है। कृष्ण के भक्त और तुलसीदास के समकालीन सूर ने रामचरितमानस और तुलसीदास की प्रशंसा करते हुए आठ पंक्तियों के छंद में तुलसीदास को संत शिरोमणि (पवित्र पुरुषों में सर्वोच्च रत्न) कहा। अब्दुर रहीम खानखाना , प्रसिद्ध मुस्लिम कवि जो मुगल सम्राट अकबर के दरबार में नवरत्नों (नौ रत्नों) में से एक थे , तुलसीदास के निजी मित्र थे। रहीम ने तुलसीदास के रामचरितमानस का वर्णन करते हुए निम्नलिखित दोहे की रचना की - रामचरितमानसमल बिमल संतनजीवन प्राण। युवावन को बेद सम जवनहिं प्रगट कुरान ॥ रामचरितमानस बिमला संतानजीवन प्राण:। हिंदुवाना को बेदा समा जवनाहिं प्रगट कुराना ॥ पवित्र रामचरितमानस संतों के जीवन की सांस है। यह हिंदुओं के लिए वेदों के समान है, और मुसलमानों के लिए यह कुरान के समान है। तुलसीदास के समकालीन अकबर की जीवनी के लेखक इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने तुलसीदास को "भारत में अपने युग का सबसे महान व्यक्ति और स्वयं अकबर से भी महान" कहा था। इंडोलॉजिस्ट और भाषाविद् सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने तुलसीदास को " बुद्ध के बाद लोगों का सबसे बड़ा नेता " और "आधुनिक समय का सबसे महान भारतीय लेखक" कहा; और महाकाव्य रामचरितमानस को "किसी भी युग के सबसे महान कवि के योग्य" कहा। रामचरितमानस को उन्नीसवीं सदी के दोनों इंडोलॉजिस्टों ने "उत्तर भारत की बाइबिल" कहा है, जिनमें राल्फ ग्रिफिथ भी शामिल हैं , जिन्होंने चार वेदों और वाल्मीकि की रामायण का अंग्रेजी में अनुवाद किया हिंदी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने तुलसीदास को "हिंदी की लता में खिलते हुए, विश्व की कविता के बगीचे में फूलों की सबसे सुगंधित शाखा" कहा है। निराला तुलसीदास को रवींद्रनाथ टैगोर से भी बड़ा कवि मानते थे, और कालिदास , व्यास , वाल्मीकि, होमर , जोहान वोल्फगैंग वॉन गोएथे और विलियम शेक्सपियर के समान श्रेणी का मानते थे । हिंदी साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि तुलसीदास ने "उत्तर भारत में धर्म के राज्य पर एक संप्रभु शासन " स्थापित किया, जो बुद्ध के प्रभाव के बराबर था। लव एंड गॉड और सोशल ड्यूटी इन रामचरितमानस पुस्तक के लेखक एडमर जे। बेबिन्यू कहते हैं कि अगर तुलसीदास यूरोप या अमेरिका में पैदा हुए होते पुरातत्ववेत्ता एफआर अल्चिन , जिन्होंने विनयपत्रिका और कवितावली का अंग्रेजी में अनुवाद किया, के शब्दों में , "उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से के लोग तुलसीदास के लिए उसी तरह का सम्मान पाते हैं, जैसा कि बाइबल के मूल जर्मन भाषा में अनुवादक लूथर को मिलता था"। अल्चिन ने यह भी उल्लेख किया है कि रामचरितमानस की तुलना न केवल वाल्मीकि की रामायण से की गई है, बल्कि स्वयं वेदों , भगवद गीता , कुरान और बाइबल से भी की गई है । अर्नेस्ट वुड ने अपनी रचना एन इंग्लिशमैन डिफेंड्स मदर इंडिया में माना है रामचरितमानस को "लैटिन और ग्रीक भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों से श्रेष्ठ" माना जाता है। तुलसीदास को भक्तशिरोमणि भी कहा जाता है , जिसका अर्थ है भक्तों में सर्वोच्च रत्न। विशेष रूप से उनकी कविता के बारे में, तुलसीदास को कई आलोचकों द्वारा "रूपक का सम्राट" और उपमाओं में पारंगत कहा गया है। हिंदी कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने तुलसीदास के बारे में कहा - कविता करके तुलसी न लसे कविता लसी पा तुलसी की कला। कविता कराके तुलसी न लेसे कविता कराके तुलसी की कला। तुलसीदास काव्य रचना करके नहीं चमके, बल्कि काव्य स्वयं तुलसीदास की कला पाकर चमका। हिंदी कवि महादेवी वर्मा ने तुलसीदास पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अशांत मध्य युग में भारत को तुलसीदास से ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने आगे कहा कि आज जैसा भारतीय समाज मौजूद है, वह तुलसीदास द्वारा निर्मित एक इमारत है, और आज हम जिस राम को जानते हैं, वह तुलसीदास के राम हैं। तुलसी-स्तवन तुलसीदास जी की हस्तलिपि अत्यधिक सुन्दर थी लगता है जैसे उस युग में उन्हें कैलोग्राफी की कला आती थी। उनके जन्म-स्थान सोरों के तुलसीपीठ में श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड व अरण्यकांड की एक-एक प्रति सुरक्षित रखी हुई है। रचनाएँ अपने ११२ वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास ने कालक्रमानुसार निम्नलिखित कालजयी ग्रन्थों की रचनाएँ कीं - गीतावली, कृष्ण-गीतावली, रामचरितमानस, पार्वती-मंगल, विनय-पत्रिका, जानकी-मंगल, रामललानहछू, दोहावली, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञा-प्रश्न, सतसई, बरवै रामायण, कवितावली, हनुमानबाहुक इनमें से रामचरितमानस, विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली जैसी कृतियों के विषय में किसी कवि की यह आर्षवाणी सटीक प्रतीत होती है - पश्य देवस्य काव्यं, न मृणोति न जीर्यति। अर्थात देवपुरुषों का काव्य देखिये जो न मरता न पुराना होता है। लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व आधुनिक प्रकाशन-सुविधाओं से रहित उस काल में भी तुलसीदास का काव्य जन-जन तक पहुँच चुका था। यह उनके कवि रूप में लोकप्रिय होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मानस जैसे वृहद् ग्रन्थ को कण्ठस्थ करके सामान्य पढ़े लिखे लोग भी अपनी शुचिता एवं ज्ञान के लिए प्रसिद्ध होने लगे थे। रामचरितमानस तुलसीदास जी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ रहा है। उन्होंने अपनी रचनाओं के सम्बन्ध में कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है, इसलिए प्रामाणिक रचनाओं के सम्बन्ध में अन्त:साक्ष्य का अभाव दिखायी देता है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ इस प्रकार हैं: श्रीरामचरितमानस रामललानहछू वैराग्य संदीपनी बरवै रामायण पार्वती-मंगल जानकी-मंगल रामाज्ञाप्रश्न दोहावली कवितावली गीतावली श्रीकृष्ण-गीतावली विनयपत्रिका सतसई छन्दावली रामायण कुण्डलिया रामायण राम शलाका संकट मोचन करखा रामायण रोला रामायण झूलना छप्पय रामायण कवित्त रामायण कलिधर्माधर्म निरूपण हनुमान चालीसा 'एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एण्ड एथिक्स'Hastings J. Selbie J.A. Gray L.H. Encyclopædia of Religion and Ethics: Arthur-Bunyan T. & T. Clark Encyclopædia of Religion and Ethics 1910 http://books.google.co.in/books?id=oEATAAAAYAAJ अंग्रेज़ी भाषा २७ मार्च २०२० में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भी उपरोक्त प्रथम बारह ग्रन्थों का उल्लेख किया है। कुछ ग्रन्थों का संक्षिप्त विवरण रामललानहछू यह संस्कार गीत है। इस गीत में कतिपय उल्लेख राम-विवाह की कथा से भिन्न हैं। गोद लिहैं कौशल्या बैठि रामहिं वर हो। सोभित दूलह राम सीस, पर आंचर हो।। वैराग्य संदीपनी वैराग्य संदीपनीDāsa Ś. Baṛathvāla P. Gosvami Tulasidasa Hindustani Ekedemi 1952 http://books.google.co.in/books?id=_iw_AAAAIAAJ pt २७ मार्च २०२० को माताप्रसाद गुप्त ने अप्रामाणिक माना है, पर आचार्य चन्द्रवली पाण्डे इसे प्रामाणिक और तुलसी की आरम्भिक रचना मानते हैं। कुछ और प्राचीन प्रतियों के उपलब्ध होने से ठोस प्रमाण मिल सकते हैं। सन्त महिमा वर्णन का पहला सोरठा पेश है - को बरनै मुख एक, तुलसी महिमा संत। जिन्हके विमल विवेक, सेष महेस न कहि सकत।। बरवै रामायण विद्वानों ने इसे तुलसी की रचना घोषित किया है। शैली की दृष्टि से यह तुलसीदास की प्रामाणिक रचना है। इसकी खण्डित प्रति ही ग्रन्थावली में सम्पादित है।Miśra R. Viśvakavi Tulasī aura unake kāvya Sūrya-Prakāśana १९७३ http://books.google.co.in/books?id=mSwSAAAAMAAJ hi २७ मार्च २०२० पार्वती-मंगल यह तुलसी की प्रामाणिक रचना प्रतीत होती है। इसकी काव्यात्मक प्रौढ़ता तुलसी सिद्धान्त के अनुकूल है। कविता सरल, सुबोध रोचक और सरस है। ""जगत मातु पितु सम्भु भवानी"" की शृंगारिक चेष्टाओं का तनिक भी पुट नहीं है। लोक रीति इतनी यथास्थिति से चित्रित हुई है कि यह संस्कृत के शिव काव्य से कम प्रभावित है और तुलसी की मति की भक्त्यात्मक भूमिका पर विरचित कथा काव्य है। व्यवहारों की सुष्ठुता, प्रेम की अनन्यता और वैवाहिक कार्यक्रम की सरसता को बड़ी सावधानी से कवि ने अंकित किया है। तुलसीदास अपनी इस रचना से अत्यन्त सन्तुष्ट थे, इसीलिए इस अनासक्त भक्त ने केवल एक बार अपनी मति की सराहना की है - प्रेम पाट पटडोरि गौरि-हर-गुन मनि। मंगल हार रचेउ कवि मति मृगलोचनि।। जानकी-मंगल विद्वानों ने इसे तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाओं में स्थान दिया है। पर इसमें भी क्षेपक है। पंथ मिले भृगुनाथ हाथ फरसा लिए। डाँटहि आँखि देखाइ कोप दारुन किए।। राम कीन्ह परितोष रोस रिस परिहरि। चले सौंपि सारंग सुफल लोचन करि।। रघुबर भुजबल देख उछाह बरातिन्ह। मुदित राउ लखि सन्मुख विधि सब भाँतिन्ह।। तुलसी के मानस के पूर्व वाल्मीकीय रामायण की कथा ही लोक प्रचलित थी। काशी के पण्डितों से मानस को लेकर तुलसीदास का मतभेद और मानस की प्रति पर विश्वनाथ का हस्ताक्षर सम्बन्धी जनश्रुति प्रसिद्ध है। रामाज्ञा प्रश्न यह ज्योतिष शास्त्रीय पद्धति का ग्रन्थ है। दोहों, सप्तकों और सर्गों में विभक्त यह ग्रन्थ रामकथा के विविध मंगल एवं अमंगलमय प्रसंगों की मिश्रित रचना है। काव्य की दृष्टि से इस ग्रन्थ का महत्त्व नगण्य है। सभी इसे तुलसीकृत मानते हैं। इसमें कथा-शृंखला का अभाव है और वाल्मीकीय रामायण के प्रसंगों का अनुवाद अनेक दोहों में है। दोहावली दोहावली में अधिकांश दोहे मानस के हैं। कवि ने चातक के व्याज से दोहों की एक लम्बी शृंखला लिखकर भक्ति और प्रेम की व्याख्या की है। दोहावली दोहा संकलन है। मानस के भी कुछ कथा निरपेक्ष दोहों को इसमें स्थान है। सम्भवतः कुछ दोहे इसमें भी प्रक्षिप्त हों, पर रचना की अप्रामाणिकता असंदिग्ध है। कवितावली कवितावली तुलसीदास की रचना है, पर सभा संस्करण अथवा अन्य संस्करणों में प्रकाशित यह रचना पूरी नहीं प्रतीत होती है। कवितावली एक प्रबन्ध रचना है। कथानक में अप्रासंगिकता एवं शिथिलता तुलसी की कला का कलंक कहा जायेगा। गीतावली गीतावली में गीतों का आधार विविध काण्ड का रामचरित ही रहा हैTulsidas G. Gitavali CreateSpace Independent Publishing Platform 978-1-9840-2505-0 http://books.google.co.in/books?id=CbiPtAEACAAJ et २७ मार्च २०२० । यह ग्रन्थ रामचरितमानस की तरह व्यापक जनसम्पर्क में कम गया प्रतीत होता है। इसलिए इन गीतों में परिवर्तन-परिवर्द्धन दृष्टिगत नहीं होता है। गीतावली में गीतों के कथा - सन्दर्भ तुलसी की मति के अनुरूप हैं। इस दृष्टि से गीतावली का एक गीत लिया जा सकता है - कैकेयी जौ लौं जियत रही। तौ लौं बात मातु सों मुह भरि भरत न भूलि कही।। मानी राम अधिक जननी ते जननिहु गँसन गही। सीय लखन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही।। लोक-बेद-मरजाद दोष गुन गति चित चखन चही। तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम सनेह सही।। इसमें भरत और राम के शील का उत्कर्ष तुलसीदास ने व्यक्त किया है। गीतावली के उत्तरकाण्ड में मानस की कथा से अधिक विस्तार है। इसमें सीता का वाल्मीकि आश्रम में भेजा जाना वर्णित है। इस परित्याग का औचित्य निर्देश इन पंक्तियों में मिलता है - भोग पुनि पितु-आयु को, सोउ किए बनै बनाउ। परिहरे बिनु जानकी नहीं और अनघ उपाउ।। पालिबे असिधार-ब्रत प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ। होइ हित केहि भाँति, नित सुविचारु नहिं चित चाउ।। श्रीकृष्ण गीतावली श्रीकृष्ण गीतावली भी गोस्वामीजी की रचना है। श्रीकृष्ण-कथा के कतिपय प्रकरण गीतों के विषय हैं।श्रीकृष्ण गीतावली: Sri Krishna Gitavali Exotic India Art https://www.exoticindia.com/inr/book/details/sri-krishna-gitavali-NZA671/ hi २७ मार्च २०२० जून 2020 InternetArchiveBot हनुमानबाहुक यह गोस्वामी जी की हनुमत-भक्ति सम्बन्धी रचना है। पर यह एक स्वतन्त्र रचना है। इसके सभी अंश प्रामाणिक प्रतीत होते हैं। तुलसीदास को राम प्यारे थे, राम की कथा प्यारी थी, राम का रूप प्यारा था और राम का स्वरूप प्यारा था। उनकी बुद्धि, राग, कल्पना और भावुकता पर राम की मर्यादा और लीला का आधिपत्य था। उनक आँखों में राम की छवि बसती थी। सब कुछ राम की पावन लीला में व्यक्त हुआ है जो रामकाव्य की परम्परा की उच्चतम उपलब्धि है। निर्दिष्ट ग्रन्थों में इसका एक रस प्रतिबिंब है।दोहेतुलसीदास के दोहेhttps://indianhistoryhindi.com/tulsidas-ke-dohe/ तुलसीदास के दोहे 2021-09-16 25 मई 2021 https://web.archive.org/web/20210525145837/https://indianhistoryhindi.com/tulsidas-ke-dohe/ dead दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ। तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ।।अर्थ – तुलसीदासhttp://indianculture.gov.in/rarebooks/ramayan-tulsi-das-or-bible-northern-india The Ramayan of Tulsi Das or the Bible of Northern India INDIAN CULTURE en 2021-09-16 जी कहते हैं संपत्ति शरीर की छाया के समान है । इसको पीठ देकर चलने से यह पीछे पीछे चलता है, और सामने होकर चलने से दूर भाग जाता है । ( जो धन से मुँह मोड लेता है, धन की नदी उसके पीछे पीछे बहती चली आती है और जो धन के लिए सदा ललचाता रहता है, उसे सपने में पैसा कभी नहीं मिलता ) इस बात को समझकर घर मे ही दिन बिताओ। तुलसी अदभुत देवता आसा देवी नाम। सेएँ सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम।।अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि आशा देवी नाम की एक अदभुत देवी है, यह सेवा करने पर दुख देता है और विमुख होने पर सुख देता है । सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत । तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत ।।अर्थ - तुलसीदास कहते है वही सेमलता पेड़ है और वहीं तोते है तो भी मोहवश वसंत ऋतु आने पर सदा उस पर मँडराये रहते है । इस बात को सुनकर संत लोग भी मोह की महिमा की सराहना करते हैं । ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार । केहि कै लोभ बिडंबना कीनिह न एहिं संसार ॥अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, पण्डित और गुणों का धाम इस संसार में ऐसा कौन मनुष्य हैं, जिसकी लोभ ने मिट्टी पलीद न की हो ॥ ब्यापी रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड । सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ।।अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि माया की प्रचंड सेना संसार भर मे फैल रहा हैं कामादि(काम, क्रोध, मद, मोह, और मत्सर) वीर इस सेना के सेनापति हैं और दम्भ, कपट, पाखण्ड उसके योद्धा है । तुलसी इस संसार में भाँति भाँति के लोग । सबसे हस बोलिए नदी नाव संजोग ॥अर्थ''' – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि इस संसार मे कई प्रकार के लोग रहते है । जिनका व्यवहार और स्वभाव अलग अलग होता है । आप सभी से मिलिए और बात करिए । जैसे नाव नदी से दोस्ती कर अपने मार्ग को पार कर लेता है । वैसे आप अपने अच्छे व्यवहार से इस भव सागर को पार कर लेंगे . इन्हें भी देखें रामचरितमानस भक्ति काल भक्त कवियों की सूची हिंदी साहित्य माताप्रसाद गुप्त अवधी साहित्य बाहरी कड़ियाँ स्वर्गारोहण - संपूर्ण रामचरितमानस, प्रमुख पात्रों के संदर्भ, MP3 ओडियो तथा PDF डाउनलोड रामचरितमानस (हिन्दी अर्थ के साथ) तुलसीदास की रचनाएं कवितावली का मूल पाठ (विकीस्रोत पर) दोहावली का मूल पाठ (विकीस्रोत पर) विनयपत्रिका (विकीस्रोत पर) संकटमोचन हनुमानाष्टक (विकीस्रोत पर) हनुमान बाहुक :हिन्दी भावार्थ सहित हनुमान चालीसा (विकीस्रोत पर) तुलसी सुभाषित - हिन्दी के विकि_सूक्ति (विकिकोट्) पर मानस सुभाषित - हिन्दी के विकि_सूक्ति (विकिकोट्) पर तुलसी काव्य में साहित्यिक अभिप्राय (गूगल पुस्तक ; लेखक - जनार्दन उपाध्याय) गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन परिचय https://web.archive.org/web/20210915110141/https://guruamrit.com/tulsidas-ji-ka-jivan-parichay/ 15 सितंबर 2021 सन्दर्भ yes श्रेणी:भक्तिकाल के कवि श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना श्रेणी:१६वीं सदी के कवि श्रेणी:भक्ति आन्दोलन श्रेणी:हिन्दी कवि श्रेणी:हिन्दू कवि