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तुहफ़तुल हिन्द
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तुहफ़तुल हिन्द मिर्ज़ा ख़ान का ब्रज भाषा में लिखा गया ग्रंथ है। हिन्दी व्याकरण के इतिहास में इस ग्रंथ को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मिर्ज़ा ख़ान ने ब्रज भाषा का एक व्याकरण १६७५ ई. से कुछ पूर्व रचा था।ख़ान मीर्ज़ा रांगेय A Grammar of the Braj Bhakha मार्च 1935 विश्वभारती सीरिज सं. ३ कलकत्ता ix 10 जुलाई 2009 यह व्याकरण बहुत ही संक्षिप्त (केवल 16 पृष्ठों का) है और फारसी भाषा में लिखी उसकी मूल रचना "तुहफ़तुल-हिन्द" (हिन्दुस्तान का तोहफ़ा) का एक अंश है। तुहफ़तुल-हिन्द में तत्कालीन हिन्दी साहित्य के विविध विषयों का विवेचन है जो क्रमशः इस प्रकार हैं - व्याकरण, छन्द, तुक, अलंकार, शृंगार रस, संगीत, कामशास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र और शब्दकोष। हिन्दी-फारसी शब्दकोश में तीन हजार से कुछ अधिक शब्द हैं। मीर्ज़ा ख़ान ने इस बात का बहुत खयाल रखा है कि दिये गये हिन्दी शब्दों की वर्तनी में कोई गलती न हो। इसके लिए उसने अपनी रचना के प्रत्येक शब्द की वर्तनी अपने विशिष्ट लिप्यंतरण के रूप में दी है। उदाहरणस्वरूप - फारसी/अरबी के 'वाव्' अक्षर का प्रयोग 'ऊ' (जैसे 'नूर' में) और 'ओ' (जैसे 'शोर' में) दोनों ध्वनियों के लिए किया जाता है। प्रथम ध्वनि के लिए वह 'वाव्-ए-मरूफ़' और दूसरे के लिए 'वाव्-ए-मज्हूल' शब्द का प्रयोग करता है। पूर्ण अनुनासिक ध्वनि (जैसे 'माँ' 'भँवरा' में) एवं अपूर्ण अनुनासिक ध्वनि (जैसे 'गंगा' में) - इन दोनों के लिए फारसी/अरबी लिपि में सिर्फ 'नून' अक्षर है। मीर्ज़ा ख़ान ने इन दोनों ध्वनियों के लिए 'नून' में अलग-अलग विशिष्ट चिह्न देकर अन्तर दर्शाया है। मीर्ज़ा ख़ान का विभिन्न विषयों का विवेचन संतोषजनक रूप से वैज्ञानिक एवं विस्तृत है। भाषाशास्त्र के विचार से उसका कोश देशी भाषाओं के विश्लेषण में रुचि रखनेवालों के लिए बहुत उपयोगी है।
अपनी भूमिका में मीर्ज़ा ख़ान ने हिन्दी वर्णमाला का विस्तृत विवेचन किया है। यथोचित व्याकरण अंग्रेजी अनुवाद भाग में कुल 16 पृष्ठों (पृ. 53-91) का है। इस व्याकरण का फारसी शीर्षक (पृ. 51) है - "क़वाइदे कुल्लियः भाखा" (अर्थात् 'भाखा के व्याकरणिक नियम')।
क़वाइद का विवेचन भूमिका के चौथे अध्याय के दूसरे भाग में है, जिसमें कुल दश अनुच्छेद हैं। पहले अनुच्छेद में ब्रज भाषा की स्थिति का वर्णन है। लेखक सभी भाषाओं में इस भाषा की विशेष प्रशंसा करता है, क्योंकि यह कवियों और संस्कृत लोगों की भाषा है। इसी कारण लेखक इस भाषा के व्याकरणिक नियमों की रचना करने का निश्चय करता है। दूसरे अनुच्छेद में शब्द और उसके प्रकार का विवेचन है। तीसरे और चौथे अनुच्छेदों में प्रत्ययों सहित क्रमशः पुलिंग (=पुंल्लिंग) एवं अस्त्रीलिंग (=स्त्रीलिंग) शब्दों का विवेचन है। अनुच्छेद पाँच में लेखक का कहना है कि निपुंसकलिंग (=नपुंसकलिंग) का प्रयोग सिर्फ सहंसकिर्त (=संस्कृत) में ही होता है, भाखा में नहीं। छठे अनुच्छेद में प्रत्यय सहित बुहवचन (=बहुवचन) का विवेचन है। सातवें अनुच्छेद में वा, ता, या, जा, उन, इन, जिन - ये पुंल्लिंग एवं स्त्रीलिंग दोनों में प्रयुक्त सात निश्चयवाचक सर्वनाम का उल्लेख है। आठवें अनुच्छेद में पदविर्त (=पदवृत्ति?) का अर्थ वाक्य के रूप में समझाया गया है। नौवें अनुच्छेद में सम्बन्ध (कारक) का विवेचन है। अन्तिम अनुच्छेद में निपात, उपसर्ग, मध्यसर्ग एवं परसर्ग (प्रत्यय) का विस्तृत विवरण है। उदाहरणस्वरूप- मध्यसर्ग- आ (चलाचल); उपसर्ग- बि (बिकल), स (सजल, सपूत), सु (सुबास), अ (अजान), निपात - हे, अहे, हो, अहो, ए, ए हो, अरे, रे, ए रे, अरे ए; तद्धित प्रत्यय - वन्त (रूपवन्त), आई (तरनाई), आपो (मोटापो) इत्यादि।
डॉ॰ चटर्जी अपनी अंग्रेजी भूमिका में लिखते हैं - "मीर्ज़ा ख़ान की शब्दावली से प्रमाणित होता है कि वह जिस भाषा का विवेचन करता है वह वस्तुतः साहित्यक भाखा या हिन्दी नहीं है, बल्कि बोल-चाल की भाखा है। अन्तिम 'औ' और 'ए', जो साहित्यक भाखा की विशेषता है, बोल-चाल में बदलकर 'अ' और 'आ' हो जाते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्ति का विकास 17वीं शताब्दी के अन्त में तेजी से हो रहा था। आधुनिक हिन्दी या उर्दू में ब्रज या पंजाबी का उपान्त्य 'य्' लुप्त हो गया है, किन्तु दक्खन की पुरानी उर्दू में वर्तमान था। हम लोग अभी 'बोला', 'लगा', 'कहा' जैसे रूप का प्रयोग करते हैं, जबकि पुरानी उर्दू में ब्रज के 'बोलियो', 'लगियो' के लिए 'बोलिया' 'लगिया' रूप प्राप्त होते हैं। ये 'य्' रूप अभी भी पंजाबी में प्रयुक्त होते हैं।"ख़ान मीर्ज़ा रांगेय A Grammar of the Braj Bhakha मार्च 1935 विश्वभारती सीरिज सं. ३ कलकत्ता ५-६ 10 जुलाई 2009
श्रेणी:हिन्दी व्याकरण