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देवीकुंड, बीकानेर
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नगर के पांच मील पूर्व में देवीकुंड है। यहां राव कल्याणसिंह से लेकर महाराजा डूंगरसिंह तक के राजाओं और उनकी रानियों और कुंवरों आदि की स्मारक छत्रियाँ बनी है जिनमें से कुछ तो बड़ी सुन्दर है। पहले के राजाओं आदि की छत्रियां दुलमेरा से लाए हुए लाल पत्थरों की बनीं है, जिनके बीच में लगे हुए मकराना के संगमरमरों पर लेख खुदे हैं। बाद की छत्रियां पूरी संगमरमर की बनी हैं। कुछ छत्रियों की मध्य शिलाओं पर अश्वारुढ़ राजाओं की मूर्तियां खुदी है, जिनके आगे कतार में क्रमानुसार उनके साथ सती होनेवाली राणियों की आकृतियां बनी है। नीचे गद्य और पद्य में उनकी प्रशंसा के लिए लेख खुदे हैं जिनसे कुछ-कुछ हाल के अतिरिक्त उनके स्वर्गवास का निश्चित समय ज्ञात होता है। इसमें महाराजा राजसिंह की छत्री उल्लेखनीय है क्योंकि उनके साथ जल मरने वाले संग्रामसिंह नामक एक व्यक्ति का उल्लेख है। इसी स्थान पर सती होने वाली अंतिम महिला का नाम दीपकुंवारी था, जो महाराजा सूरत सिंह के दूसरे पूत्र मोती सिंह की स्री थी तथा अपने पति की मृत्यु पर १८२५ ई० में सती हुईं थी। उसकी स्मृति में अब भी प्रतिवर्ष भादों के महीने में यहां मेला लगता है। उसके बाद और कोई महिला सती नहीं हुई, क्योंकि सरकार के प्रयत्न से यह प्रथा खत्म हुई। राजपरिवार के लोगों के ठहरने के लिए तालाब के निकट ही एक उद्यान और कुछ महल बने हुए हैं।
देवीकुंड और नगर के मध्य में, मुख्य सड़क के दक्षिण भाग में महाराजा डूंगरसिंह का बनवाया हुआ शिव मंदिर है। इसके निकट ही एक तालाब, उद्यान और महल है। इस मंदिर का शिवलिंग ठीक मेवाड़ के प्रसिद्ध एक लिंग जी की मूर्ति के सदृष्य है। यहाँ प्रतिवर्ष श्रावण मास में भारी मेला लगता है। इस स्थान को शिववाड़ी कहते हैं।