411 REFERENCE · Wikipedia
ओटक्कुष़ल
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
ओटक्कुष़ल (बाँसुरी) Ottakushal.jpg 150px मुखपृष्ठ जी.शंकर कुरुप ओटक्कुष़ल ज्ञानपीठ अनुवादक मंडल भारतीय ज्ञानपीठ ११ नवम्बर १९६६ (प्रथम संस्करण) मलयालम भारत साहित्य रूपकात्मक, आध्यात्मिक कविता संग्रह ३९५ 8126303824 १९६५ के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित
गोविन्द शंकर कुरुप की रचना ओटक्कुषल् (बाँसुरी) वह पहली पुस्तक है जिसे ज्ञानपीठ के लिए १९६५ में चुना गया। इसकी कविताओं में भारतीय अद्वैत भावना का साक्ष्य है, जिसे ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महाकवि जी, शंकर कुरूप ने प्रकृति के विविध रूपों में प्रतिबिम्बित आत्मछवि की गहरी अनुभूति से अर्जित किया है, केवल परम्परागत रहस्यवादी मान्यता को स्वीकार भर कर लेने से नहीं। चराचर के साथ तादात्म्य की प्रतीति के कारण कवि के रूमानी गीतों में भी एक आध्यात्मिक और उदात्त नैतिक स्वर मुखरित हुआ है। कुरूप बिम्बों और प्रतीकों के कवि है। इनके माध्यम से परम्परागत छन्द-विधान और संस्कृतनिष्ठ भाषा को परिमार्जित कर उन्होंने अपने चिन्तन को समर्थ अभिव्यक्ति दी है। इसलिए कथ्य और शैली-शिल्प दोनों में ही उनकी कविता मलयालम साहित्य ही नहीं, भारतीय साहित्य की एक उपलब्धि बनकर गूँज रही है।
२००२ में इसके नये संस्करण का प्रकाशन साहित्य प्रेमियों के लिए गौरव की बात है। अपनी पुस्तक के विषय में कवि कहते हैं, ‘‘हो सकता है कि कल यह वंशी, मूक होकर काल की लम्बी कूड़ेदानी में गिर जाये, या यह दीमकों का आहार बन जाये, या यह मात्र एक चुटकी राख के रूप में परिवर्तित हो जाये। तब कुछ ही ऐसे होंगे जो शोक निःश्वास लेकर गुणों की चर्चा करेंगे; लेकिन लोग तो प्रायः बुराइयों के ही गीत गायेंगे : जो भी हो, मेरा जीवन तो तेरे हाथों समर्पित होकर सदा के लिए आनन्द-लहरियों में तरंगित हो गया।’’
धन्य हो गया।’’ http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=567 ओटक्कुषल् दिसंबर 2008 पीएचपी भारतीय साहित्य संग्रह https://web.archive.org/web/20100613125852/http://pustak.org/bs/home.php?bookid=567 13 जून 2010 dead
कवि की काव्य चेतना ने ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक युगबोध के प्रति सजग भाव रखा है और उत्तरोत्तर विकास पाया है। इस विकास-यात्रा में प्रकृति-प्रेम का स्थान यथार्थ ने, समाजवादी राष्ट्रीय चेतना का स्थान अन्तर्राष्ट्रीय मानवता ने ले लिया और इन सब की परिणति आध्यात्मिक विश्वचेतना में हुई जहाँ मानव विराट् विश्व की समष्टि से एकतान है; जहां मृत्यु भी विकास का चरण होने के कारण वरेण्य है। कुरूप बिम्बों और प्रतीकों के कवि हैं। उन्होंने परम्परागत छन्द-विधान और संस्कृति-निष्ठ भाषा को अपनाया, परिमार्जित किया और अपने चिन्तन तथा काव्य-प्रतिबिम्बों के अनुरूप उन्हें अभिव्यक्ति की नयी सामर्थ्य से पुष्ट किया। इसीलिए कवि का कृतित्व कथ्य में भी शैली-शिल्प में भी मलयालम साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि के रूप में ही नहीं भारतीय साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि के रूप में ही नहीं, भारतीय साहित्य की एक उपलब्धि के रूप में भी सहज ग्राह्य है।
सन्दर्भ
श्रेणी:पुस्तकें
श्रेणी:ज्ञानपीठ