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मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023
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मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 (The Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023) भारत के चुनाव आयोग (Election Commission of India) के शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल को विनियमित करने वाला एक प्रमुख कानून है। इसने पुराने ‘चुनाव आयोग अधिनियम, 1991’ की जगह ली है।
इस अधिनियम से जुड़े सभी मुख्य पहलुओं और प्रावधानों को विस्तार से नीचे समझा गया है:
=== 1. पृष्ठभूमि और क्यों लाया गया यह कानून? ===
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (2023): अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि जब तक संसद इस पर कोई कानून नहीं बनाती, तब तक इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होंगे।
संसद का कानून: सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्देश के बाद केंद्र सरकार दिसंबर 2023 में यह नया कानून लेकर आई, जिसमें चयन समिति के स्वरूप में बदलाव किया गया।
=== 2. अधिनियम के मुख्य प्रावधान ===
==== क. चयन समिति (Selection Committee) का गठन ====
इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के नामों की सिफारिश करने के लिए 3 सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान किया गया है:
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
लोकसभा में विपक्ष का नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता)
एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (जिसे प्रधानमंत्री द्वारा नामित किया जाता है)
(विवाद/चर्चा का बिंदु: इस कानून में सुप्रीम कोर्ट के उस सुझाव को बदल दिया गया जिसमें CJI को समिति में रखने की बात कही गई थी। CJI की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है)।
==== ख. खोज समिति (Search Committee) ====
चयन समिति को नाम सुझाने के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक खोजबीन समिति (Search Committee) का गठन किया जाता है। यह समिति 5 योग्य व्यक्तियों का एक पैनल तैयार करके चयन समिति के पास भेजती है। हालांकि, चयन समिति इस पैनल के अलावा भी किसी अन्य नाम पर विचार कर सकती है।
==== ग. पात्रता मानदंड (Eligibility Criteria) ====
इस पद के लिए ऐसे व्यक्ति को चुना जाएगा जो केंद्र सरकार में सचिव (Secretary) के समकक्ष पद पर रह चुका हो या उस पद पर हो।
उसे चुनावी मामलों का ज्ञान, अनुभव और एक बेदाग एवं ईमानदार छवि वाला होना चाहिए।
==== घ. कार्यकाल और पदावधि (Term of Office) ====
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है।
वे अपने कार्यकाल के बाद पुनः नियुक्ति के पात्र नहीं होते हैं।
==== ङ. वेतन और भत्ते (Salaries & Service Conditions) ====
मूल विधेयक में इनके वेतन को कैबिनेट सचिव के स्तर (जो सुप्रीम कोर्ट के जज से थोड़ा अलग है) के बराबर करने का प्रस्ताव विवादों में आया था, लेकिन सामान्य तौर पर इनकी सेवा शर्तें और वेतन सर्वोच्च पद की गरिमा के अनुरूप बनाए रखे गए हैं। चुनाव आयोग के सभी सदस्यों (CEC और ECs) को समान निर्णय लेने का अधिकार और एक समान दर्जा प्राप्त है।
==== च. हटाने (Removal) की प्रक्रिया ====
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC): इन्हें केवल संसद द्वारा महाभियोग जैसी प्रक्रिया के जरिए (सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की तरह) साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर हटाया जा सकता है।
अन्य चुनाव आयुक्त (ECs): इन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
=== 3. कानूनी और प्रशासनिक चिंताएं ===
इस अधिनियम के लागू होने के बाद कुछ कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी दलों द्वारा इसकी आलोचना भी की गई:
कार्यपालिका का प्रभाव: चयन समिति में प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री के होने के कारण सरकार के पास बहुमत (2:1 का अनुपात) रहता है, जिससे विपक्ष की भूमिका सीमित हो जाती है। आलोचकों का मानना है कि इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
CJI का बाहर होना: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत न्यायपालिका (CJI) को चयन पैनल से बाहर रखना इस कानून का सबसे बड़ा विवादित बिंदु रहा है।