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अधिक मास
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सितंबर 2014
सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिक मास या अधिमास कहते हैं। पूरब में इसे मलमास भी कहते हैं और पच्छम में लौंद।
सौर-वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घड़ी, २२ पल और ५७ विपल हैं। जबकि चांद्रवर्ष ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल और २३ विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घड़ी २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अन्तर पड़ता है। इस अन्तर में समानता लाने के लिए चांद्रवर्ष १२ मासों के स्थान पर १३ मास का हो जाता है।
वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्त्पन्न हो जाती है, क्योंकि जिस चंद्रमास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी को "अधिक मास" की संज्ञा दे दी जाती है तथा जिस चंद्रमास में दो सूर्य संक्रांति का समावेश हो जाय, वह "क्षयमास" कहलाता है। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्ग व पौस मासों में होता है। जिस वर्ष क्षय-मास पड़ता है, उसी वर्ष अधि-मास भी अवश्य पड़ता है परन्तु यह स्थिति १९ वर्षों या १४१ वर्षों के पश्चात् आती है। जैसे विक्रमी संवत २०२० एवं २०३९ में क्षयमासों का आगमन हुआ तथा भविष्य में संवत २०५८, २१५० में पड़ने की संभावना है!
विशेष बात यह है कि अधिक मास की स्थिति हर साल नहीं बनती है; यह सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच के अंतर को पाटने के लिए लगभग हर तीन साल में एक बार आता है। साथ ही, अधिक मास का कोई एक महीना निश्चित नहीं होता। अधिक मास अलग-अलग महीनों में पड़ सकते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, हर बार अधिक मास का आगमन अलग-अलग महीनों (जैसे सावन, भादो, आश्विन आदि) में होता है, जो पूरी तरह से पंचांग की गणना और ग्रहों की चाल पर निर्भर करता है।
बाहरी कड़ियाँ
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