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मन
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मन मस्तिष्क की उस क्षमता को कहते हैं जो मनुष्य को चिंतन शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्यता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान (अंतर्दृष्टि), इत्यादि में सक्षम बनाती है।Dictionary.com, "mind": "1. (in a human or other conscious being) the element, part, substance, or process that reasons, thinks, feels, wills, perceives, judges, etc.: the processes of the human mind. 2. Psychology. the totality of conscious and unconscious mental processes and activities. 3. intellect or understanding, as distinguished from the faculties of feeling and willing; intelligence."Google definition, "mind": "The element of a person that enables them to be aware of the world and their experiences, to think, and to feel; the faculty of consciousness." https://web.archive.org/web/20170314033640/https://www.google.com/search?q=Mind#hl=en&sclient=psy-ab&q=definition+of+mind&oq=definition+of+mind 14 मार्च 2017"Mind, in the Western tradition, the complex of faculties involved in perceiving, remembering, considering, evaluating, and deciding. Mind is in some sense reflected in such occurrences as sensations, perceptions, emotions, memory, desires, various types of reasoning, motives, choices, traits of personality, and the unconscious." http://www.britannica.com/EBchecked/topic/383523/mind मन (Mind) 19 दिसम्बर 2014 ब्रिटानिका एन्साइक्लोपीडिया अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20141220121309/http://www.britannica.com/EBchecked/topic/383523/mind 20 दिसंबर 2014 live;
सामान्य भाषा में मन शरीर का वह हिस्सा या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क का एक प्रकार्य है।
मन और इसके कार्य करने के विविध पहलुओं का मनोविज्ञान नामक ज्ञान की शाखा द्वारा अध्ययन किया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य और मनोरोग किसी व्यक्ति के मन के सही ढंग से कार्य करने का विश्लेषण करते हैं। मनोविश्लेषण नामक शाखा मन के अन्दर छुपी उन जटिलताओं का उद्घाटन करने की विधा है जो मनोरोग अथवा मानसिक स्वास्थ्य में व्यवधान का कारण बनते हैं। वहीं मनोरोग चिकित्सा मानसिक स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने की विधा है।
सामाजिक मनोविज्ञान किसी व्यक्ति द्वारा विभिन्न सामाजिक परिस्थितयों में उसके मानसिक व्यवहार का अध्ययन करती है। शिक्षा मनोविज्ञान उन सारे पहलुओं का अध्ययन करता है जो किसी व्यक्ति की शिक्षा में उसके मानसिक प्रकार्यों के द्वारा प्रभावित होते हैं।
जिसके द्वारा सब क्रियाकलापो को क्रियानवृत किया जाता है। उसे साधारण भाषा में मन कहते है।।
मन के भाग
अप्रैल 2015
फ्रायड नामक मनोवैज्ञानिक ने बनावट के अनुसार मन को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया था :
सचेतन: यह मन का लगभग दसवां हिस्सा होता है, जिसमें स्वयं तथा वातावरण के बारे में जानकारी (चेतना) रहती है। दैनिक कार्यों में व्यक्ति मन के इसी भाग को व्यवहार में लाता है।
अचेतन: यह मन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है, जिसके कार्य के बारे में व्यक्ति को जानकारी नहीं रहती। यह मन की स्वस्थ एवं अस्वस्थ क्रियाओं पर प्रभाव डालता है। इसका बोध व्यक्ति को आने वाले सपनों से हो सकता है। इसमें व्यक्ति की मूल-प्रवृत्ति से जुड़ी इच्छाएं जैसे कि भूख, प्यास, यौन इच्छाएं दबी रहती हैं। मनुष्य मन के इस भाग का सचेतन इस्तेमाल नहीं कर सकता। यदि इस भाग में दबी इच्छाएं नियंत्रण-शक्ति से बचकर प्रकट हो जाएं तो कई लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं जो बाद में किसी मनोरोग का रूप ले लेते हैं।
अर्धचेतन या पूर्वचेतन: यह मन के सचेतन तथा अचेतन के बीच का हिस्सा है, जिसे मनुष्य चाहने पर इस्तेमाल कर सकता है, जैसे स्मरण-शक्ति का वह हिस्सा जिसे व्यक्ति प्रयास करके किसी घटना को याद करने में प्रयोग कर सकता है।
फ्रायड ने कार्य के अनुसार भी मन को तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत किया है।
इड (मूल-प्रवृत्ति): यह मन का वह भाग है, जिसमें मूल-प्रवृत्ति की इच्छाएं (जैसे कि उत्तरजीवित यौनता, आक्रामकता, भोजन आदि संबंधी इच्छाएं) रहती हैं, जो जल्दी ही संतुष्टि चाहती हैं तथा खुशी-गम के सिद्धांत पर आधारित होती हैं। ये इच्छाएं अतार्किक तथा अमौखिक होती हैं और चेतना में प्रवेश नहीं करतीं।
ईगो (अहम्): यह मन का सचेतन भाग है जो मूल-प्रवृत्ति की इच्छाओं को वास्तविकता के अनुसार नियंत्रित करता है। इस पर सुपर-ईगो (परम अहम् या विवेक) का प्रभाव पड़ता है। इसका आधा भाग सचेतन तथा अचेतन रहता है। इसका प्रमुख कार्य मनुष्य को तनाव या चिंता से बचाना है। फ्रायड की मनोवैज्ञानिक पुत्री एना फ्रायड के अनुसार यह भाग डेढ़ वर्ष की आयु में उत्पन्न हो जाता है जिसका प्रमाण यह है कि इस आयु के बाद बच्चा अपने अंगों को पहचानने लगता है तथा उसमें अहम् भाव (स्वार्थीपन) उत्पन्न हो जाता है।
सुपर-ईगो (विवेक; परम अहम्): सामाजिक, नैतिक जरूरतों के अनुसार उत्पन्न होता है तथा अनुभव का हिस्सा बन जाता है। इसके अचेतन भाग को अहम्-आदर्श (ईगो-आइडियल) तथा सचेतन भाग को विवेक कहते हैं।
ईगो (अहम्) का मुख्य कार्य वास्तविकता, बुद्धि, चेतना, तर्क-शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय-शक्ति, इच्छा-शक्ति, अनुकूलन, समाकलन, भेद करने की प्रवृत्ति को विकसित करना है।
मन के प्रकार्य
मनोरोग चिकित्सा
चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा जो कि मनोरोगों के उपचार, निदान एवं निवारण से संबंध रखती है।पर यह कार्य नही करती हर प्राणी पर |
मनोविज्ञान
विज्ञान की वह शाखा जिसमें मन की सामान्य क्रिया का अध्ययन किया जाता है। मनोवैज्ञानिकों के प्रशिक्षण के लिए चिकित्सा का ज्ञान जरूरी नहीं है, इसलिए मनोवैज्ञानिक अक्सर केवल मनोरोगों की जांच-पड़ताल (न कि उपचार) में सहयोग देते हैं
मनोविश्लेषण
मनोरोगों की उत्पत्ति के कारणों का पता लगाने की एक विधि जो कुछ प्रकार के मनोरोगों, जैसे हिस्टीरिया आदि के उपचार में भी सहायक होती है। इसके लिए मनोरोग चिकित्सा या मनोविज्ञान की जानकारी होनी चाहिए।
आध्यात्मिक
मन एक भूमि मानी जाती है, जिसमें संकल्प और विकल्प निरंतर उठते रहते हैं। विवेक शक्ति का प्रयोग कर के अच्छे और बुरे का अंतर किया जाता है।
विवेकमार्ग अथवा ज्ञानमार्ग में मन का निरोध किया जाता है, इसकी पराकाष्ठा शून्य में होती है।
भक्तिमार्ग में मन को परिणत किया जाता है, इसकी पराकाष्ठा भगवान के दर्शन में होती है।
भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक ग्रंथों में मन की शुद्धता और उसकी स्थिति पर विशेष बल दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान क्षण में सजगता से जीने से मन निर्मल और शांत होता है। उपनिषदों में मन को ही मनुष्य के सांसारिक बंधन और आध्यात्मिक मोक्ष का मूल कारण स्वीकार किया गया है, जैसा कि कहा गया है:
"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः"शर्मा आचार्य श्रीराम १०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड) युग निर्माण योजना, मथुरा 2012 241 https://archive.org मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। (अमृतबिन्दु उपनिषद्, श्लोक २)
अर्थात्, मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का मुख्य कारण है।
जीवात्मा और इन्द्रियों के मध्य ज्ञान मन कहा जाता है।
+ मन की अवस्थाएँ प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 १७५,१६९ अवस्था विषय इन्द्रिय मन आत्मा जाग्रत ✔ ✔ ✔ (मनोवहा नाड़ी) ✔ स्वप्न ✖ ✔ ✔ (हृदय में शून्य) ✔ सुषुप्ति ✖ ✖ ✔ (महानाड़ी) ✔ तुरीय ✖ ✖ ✔ (स्व में स्थित) ✔ तुरीयातीत ✖ ✖ ✔ (ब्रह्म में स्थित) शून्य/पूर्ण ✔ (पूर्ण प्रकाशस्वरूप आत्मा या ब्रह्म)
मनोवहा नाड़ी - मन के सञ्चरण मार्ग का नाम मनोवहा नाड़ी है। यह देह भर में व्याप्त, अति सूक्ष्म आध्यात्मिक वायु के सहारे, सूत के धागों से बने जाल की भांति एक बहुत ही जटिल नाड़ी जाल है। यह देखने में मछली पकड़ने के जाल जैसा है, जिसमें बीच बीच में कूट ग्रंथियाँ भी हैं।
मन के एक एक प्रकार के भाव(वृत्ति) के उदय होने पर एक-एक प्रकार की नाड़ी के मार्ग में घूमने-फिरने लगता है। मन के वृत्तिभेद में पञ्चभूतों का सन्निवेश रहता है, जैसे क्रोध में तेज का और काम में जल इत्यादि का। पूर्व के अनेक जन्मों की वासनारूपी सूक्ष्मवायु के कण या रेणुओं के द्वारा यह जाल भरा हुआ है। यही सब मन को चञ्चल करते हैं। इस प्राणमय नाड़ी-जाल के द्वारा सारा शरीर व्याप्त है। यह वायुमण्डल मन का सञ्चार क्षेत्र है। यह नाड़ी जाल हृदय के बाहर है। प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 १६६
हृदय - मन स्थिर होने पर नाड़ी मार्ग में नहीं रहता। संकुचित होकर हृदयाकाश में प्रविष्ट हो जाता है। प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 १६८
महानाड़ी - हृदयरूपी शून्य में असंख्य नाड़ियों के एकीभूत होने पर ऊर्ध्वस्रोता महानाड़ी का विकास होता है। महानाड़ी का पर्यवसन महाशून्य में होता है। प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 १६९
इन्हें भी देखें
मन्त्र
मोक्ष
आत्मा (दर्शन)
सन्दर्भ
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श्रेणी:मनोविज्ञान
श्रेणी:दर्शन
श्रेणी:मन
श्रेणी:तत्वमीमांसा की अवधारणाएँ