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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

माधव सदाशिव गोलवलकर

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माधव सदाशिवराव गोलवलकर M S Golwalkar.jpg 200px 19 फ़रवरी 1906 रामटेक, मध्य प्रान्त और बरार, ब्रिटिश भारत (वर्तमान महाराष्ट्र, भारत) 1973 06 05 1906 02 19 yes नागपुर, महाराष्ट्र, भारत मधुकर दत्तात्रेय देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक 1940 1973 केशव बलिराम हेडगेवार हिस्लॉप कॉलेजकाशी हिन्दू विश्वविद्यालय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूतपूर्व सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर (19 फ़रवरी 1906 – 5 जून 1973) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालकJaffrelot, Hindu Nationalist Movement 1996 39 तथा विचारक थे। इनके अनुयायी इन्हें प्रायः 'गुरूजी' के ही नाम से अधिक जानते हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा का प्रवर्तन करने वालों उनका नाम प्रमुख है। वे संघ के कुछ आरम्भिक नेताओं में से एक हैं। संक्षिप्त जीवन वृत्त उनका जन्म माघ कृष्ण एकादशी (विजया एकादशी) विक्रम संवत् 1962 तदनुसार 19 फ़रवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी सन्तान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य 'भाऊ जी' तथा माता का श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य 'ताई' था। उनका बचपन में नाम माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिता सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में 1908 में अध्यापक पद पर हो गयी। शिक्षा के साथ अन्य अभिरुचियाँ मधु जब मात्र दो वर्ष के थे तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी। पिताश्री भाऊजी जो भी उन्हें पढ़ाते थे उसे वे सहज ही इसे कंठस्थ कर लेते थे। बालक मधु में कुशाग्र बुद्धि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुणों का समुच्चय बचपन से ही विकसित हो रहा था। सन् 1919 में उन्होंने 'हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा' में विशेष योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। सन् 1922 में 16 वर्ष की आयु में माधव ने मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (अब चन्द्रपुर) के 'जुबली हाई स्कूल' से उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् सन् 1924 में उन्होंने नागपुर के ईसाई मिशनरी द्वारा सञ्चालित हिस्लॉप कॉलेज से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। अंग्रेज़ी विषय में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला। वे भरपूर हाकी तो खेलते ही थे कभी-कभी टेनिस भी खेल लिया करते थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी उन्हें शौक था। मलखम्ब के क़रतब, पकड़ एवं कूद आदि में वे अत्यन्त निपुण थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाँसुरी एवं सितार वादन में भी अच्छी प्रवीणता हासिल कर ली थी। विश्वविद्यालय में ही आध्यात्मिक रुझान इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद माधव के जीवन में एक नये दूरगामी परिणाम वाले अध्याय का प्रारम्भ सन् 1924 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश के साथ हुआ। सन् 1926 में उन्होंने बी.एससी. और सन् 1928 में एम.एससी. की परीक्षायें भी प्राणिविज्ञान विषय में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण कीं। इस तरह उनका विद्यार्थी जीवन अत्यन्त यशस्वी रहा। विश्वविद्यालय में बिताये चार वर्षों के कालखण्ड में उन्होंने विषय के अध्ययन के अलावा "संस्कृत महाकाव्यों, पाश्चात्य दर्शन, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की ओजपूर्ण एवं प्रेरक 'विचार सम्पदा', भिन्न-भिन्न उपासना-पंथों के प्रमुख ग्रंथों तथा शास्त्रीय विषयों के अनेक ग्रंथों का आस्थापूर्वक पठन किया"भिशीकर, वही, पृष्ठ 11। इसी बीच उनकी रुचि आध्यात्मिक जीवन की ओर जागृत हुई। एम.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे प्राणि-शास्त्र विषय में 'मत्स्य जीवन' पर शोध कार्य हेतु मद्रास (चेन्नई) के मत्स्यालय से जुड़ गये। एक वर्ष के दौरान ही उनके पिता श्री भाऊजी सेवानिवृत्त हो गये, जिसके कारण वह श्री गुरूजी को पैसा भेजने में असमर्थ हो गये। इसी मद्रास-प्रवास के दौरान वे गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये। चिकित्सक का विचार था कि यदि सावधानी नहीं बरती तो रोग गम्भीर रूप धारण कर सकता है। दो माह के इलाज के बाद वे रोगमुक्त तो हुए परन्तु उनका स्वास्थ्य पूर्णरूपेण से पूर्ववत् नहीं रहा। मद्रास प्रवास के दौरान जब वे शोध में कार्यरत थे तो एक बार हैदराबाद का निजाम मत्स्यालय देखने आया। नियमानुसार प्रवेश-शुल्क दिये बिना उसे प्रवेश देने से श्री गुरूजी ने इन्कार कर दियाभिशीकर, च.प., वही, पृष्ठ 20। आर्थिक तंगी के कारण श्री गुरूजी को अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़ कर अप्रैल 1929 में नागपुर वापस लौटना पड़ा। प्राध्यापक के रूप में श्रीगुरूजी नागपुर आकर भी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। इसके साथ ही उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी अत्यन्त ख़राब हो गयी थी। इसी बीच [[काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय से उन्हें निदर्शक पद पर सेवा करने का प्रस्ताव मिला। 16 अगस्त सन् 1931 को श्री गुरूजी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में निदर्शक का पद संभाल लिया। चूँकि यह अस्थायी नियुक्ति थी। इस कारण वे प्रायः चिन्तित भी रहा करते थे। अपने विद्यार्थी जीवन में भी माधव राव अपने मित्रों के अध्ययन में उनका मार्गदर्शन किया करते थे और अब तो अध्यापन उनकी आजीविका का साधन ही बन गया था। उनके अध्यापन का विषय यद्यपि प्राणिविज्ञान था, विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी प्रतिभा पहचान कर उन्हें बी.ए. की कक्षा के छात्रों को अंग्रेज़ी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का अवसर दिया। अध्यापक के नाते माधव राव अपनी विलक्षण प्रतिभा और योग्यता से छात्रों में इतने अधिक अत्यन्त लोकप्रिय हो गये कि उनके छात्र उनको गुरुजी के नाम से सम्बोधित करने लगे। इसी नाम से वे आगे चलकर जीवन भर जाने गये। माधव राव यद्यपि विज्ञान के परास्नातक थे, फिर भी आवश्यकता पड़ने पर अपने छात्रों तथा मित्रों को अंग्रेज़ी, अर्थशास्त्र, गणित तथा दर्शन जैसे अन्य विषय भी पढ़ाने को सदैव तत्पर रहते थे (भिशीकर, वही, पृष्ठ 17)। यदि उन्हें पुस्तकालय में पुस्तकें नहीं मिलती थीं, तो वे उन्हें खरीद कर और पढ़कर जिज्ञासी छात्रों एवं मित्रों की सहायता करते रहते थे। उनके वेतन का बहुतांश अपने होनहार छात्र-मित्रों की फ़ीस-भर देने अथवा उनकी पुस्तकें ख़रीद देने में ही व्यय हो जाया करता था। संघ प्रवेश सर्वप्रथम केशव बलिराम हेडगेवार के द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भेजे गए नागपुर के स्वयंसेवक भैयाजी दाणी के द्वारा श्री गुरूजी संघ के सम्पर्क में आये और उस शाखा के संघचालक भी बने। 1937 में वो नागपुर वापस आ गए। नागपुर में श्री गुरूजी के जीवन में एक दम नए मोड़ का आरम्भ हो गया। डॉ हेडगेवार के सानिध्य में उन्होंने एक अत्यन्त प्रेरणादायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। किसी आप्त व्यक्ति के द्वारा इस विषय पर पूछने पर उन्होंने कहा- "मेरा रुझान राष्ट्र संगठन कार्य की और प्रारम्भ से है। यह कार्य संघ में रहकर अधिक परिणामकारिता से मैं कर सकूँगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए मैंने संघ-कार्य में ही स्वयं को समर्पित कर दिया। मुझे लगता है स्वामी विवेकानन्द के तत्वज्ञान और कार्यपद्धति से मेरा यह आचरण सर्वथा सुसंगत है।" 1938 के पश्चात संघ कार्य को ही उन्होंने अपना जीवन कार्य मान लिया। डॉ हेडगेवार के साथ निरन्तर रहते हुवे अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित किया। द्वितीय संघचालक हेतु नियुक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्मसंयम होने के कारण से 1939 में माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में डॉ हेडगेवार का ज्वर बढ़ता ही गया और अपना अन्त समय जानकर उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने माधव को अपने पास बुलाया और कहा ""अब आप ही संघ का कार्य सम्भालें""। 21 जून 1940 को हेडगेवार अनन्त में विलीन हो गए। भारत छोड़ो- श्री गुरूजी का दृष्टिकोण 9 अगस्त 1942 को बिना शक्ति के ही कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आन्दोलन छेड़ दिया। देश भर में बड़ा आंदोलन शुरू तो हो गया, परन्तु असंगठित दिशाहीन होने से सत्ताधारियों ने बड़ी क्रूरता से दमन नीतियाँ अपनाई। 2-3 महीने होते-होते आंदोलन की चिंगारी शांत हो गई। देश के सभी नेता कारागार में थे और उनकी रिहाई की कोई आशा दिखाई नहीं दे रही थी। श्री गुरूजी ने निर्णय किया था की संघ प्रत्यक्ष रूप से तो आंदोलन में भाग नहीं लेगा किन्तु स्वयंसेवकों को व्यक्तिशः प्रेरित किया जाएगा। विभाजन संकट में अद्वितीय नेतृत्व 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्यवाही का दिन घोषित कर के मुहम्मद अली जिन्नाह ने हिन्दू हत्या का ताण्डव मचा दिया। उन्ही दिनोँ में श्री गुरूजी देश भर के अपने प्रत्येक भाषण में देश विभाजन के खिलाफ डट कर खड़े होने के लिए जनता का आह्वान करते रहे किन्तु कांग्रेसी नेतागण अखण्ड भारत के लिए लड़ने की मनः स्थिति में नहीं थे। पण्डित नेहरू ने भी स्पष्ट शब्दों में विभाजन को स्वीकार कर लिया था और 3 जून 1947 को इसकी घोषणा कर दी गई। एकाएक देश की स्थिति बदल गई। इस कठिन समय में स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान वाले भाग से हिंदुओं को सुरक्षित भारत भेजना शुरू किया। संघ का आदेश था की जब तक आखिरी हिन्दू सुरक्षित ना आ जाए तब तक डटे रहना है। भीषण दिनों में स्वयंसेवकों का अतुलनीय पराक्रम, रणकुशलता, त्याग और बलिदान की गाथा भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखने लायक है। श्री गुरूजी भी इस कठिन घड़ी में भारत के उस भाग में घूमते रहे जो १५ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान बना दिया गया। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय में योगदान केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल ने जम्मू-कश्मीर रियासत के दीवान मेहरचन्द महाजन से भारत के साथ विलीनीकरण (accession) करने के लिए कश्मीर-नरेश श्री हरि सिंह जी को तैयार करने के लिए कहा था। श्री मेहरचन्द महाजन ने श्रीगुरुजी के पास संदेश भिजवाया कि वे कश्मीर-नरेश से मिलकर उन्हें इस विलीनीकरण के लिए तैयार करें। श्री महाजन जी के प्रयास से कश्मीर-नरेश और श्रीगुरुजी की भेंट की तिथि निश्चित हो सकी। श्रीगुरुजी 17 अक्तूबर, 1947 को विमान से श्रीनगर पहुँचे। भेंट 18 अक्टूबर को प्रातः हुई। भेंट के समय 15-16 वर्षीय युवराज कर्ण सिंह जांघ की हड्डी टूटने से प्लास्टर में बंधे वहीं लेटे हुए थे। श्री मेहरचन्द महाजन भेंट के समय उपस्थित थे। कश्मीर-नरेश का कहना था - मेरी रियासत पूरी तरह से पाकिस्तान पर अवलम्बित है। सारे रास्ते सियालकोट तथा रावलपिण्डी की ओर से है। रेल सियालकोट की ओर से है। मेरे लिये हवाई अड्डा लाहौर का है। अतः हिन्दुस्थान के साथ मेरा सम्बन्ध किस तरह बन सकता है? श्रीगुरुजी ने समझाया - आप हिन्दू राजा हैं। पाकिस्तान में विलय करने से आपको और आपकी हिन्दू प्रजा को भीषण संकटों से संघर्ष करना होगा। यह ठीक है कि अभी हिन्दुस्थान से रेल के रास्ते और हवाई मार्ग का कोई सम्पर्क नहीं है, किन्तु इन सबका प्रबन्ध शीघ्र ही हो जायेगा। आपका और जम्मू-कश्मीर रियासत का भला इसी में है कि आप हिन्दुस्थान के साथ विलीनीकरण कर लें। श्री मेहरचन्द महाजन ने कश्मीर-नरेश से कहा : गुरुजी ठीक कह रहे हैं। आपको हिन्दुस्थान के साथ रियासत का विलय करना चाहिए। अन्ततः कश्मीर-नरेश ने श्रीगुरुजी को तूस की शाल भेंट की। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर के भारत-विलय में श्रीगुरुजी का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा।जम्मू-कश्मीर के विलय में योगदान संघ पर प्रतिबन्ध 30 जनवरी 1948 को गांधी हत्या के मिथ्या आरोप में 4 फ़रवरी को संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। श्री गुरूजी को गिरफ्तार किया गया। देश भर में स्वयंसेवको की गिरफ्तारियां हुई। जेल में रहते हुवे उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं का विस्तृत व्यक्तव्य भेजा जिसमे सरकार को मुहतोड़ जवाब दिया गया था। आह्वान किया गया की संघ पर आरोप सिद्ध करो या प्रतिबन्ध हटाओ। देश भर में यह स्वर गूँज उठा था। 26 फ़रवरी 1948 को देश के प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू को गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल ने अपने पत्र में लिखा था ""गांधी हत्या के काण्ड में मैंने स्वयं अपना ध्यान लगाकर पूरी जानकारी प्राप्त की है। उस से जुड़े हुवे सभी अपराधी लोग पकड़ में आ गए हैं। उनमें एक भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नहीं है।"" 9 दिसम्बर 1948 को सत्याग्रह नाम के इस आंदोलन की शुरुआत होते ही कुछ 4-5 हज़ार बच्चों का यह आंदोलन है ऐसा मानकर नेतागण ने इसका मजाक उड़ाया। लेकिन उसके उलट किसी भी कांग्रेसी आंदोलन में इतनी संख्या नहीं थी। 77090 स्वयंसेवकों ने विभिन्न जेलों को भर दिया। आख़िरकार संघ को लिखित संविधान बनाने का आदेश देकर प्रतिबन्ध हटा लिया गया और अब गांधी हत्या का इसमें जिक्र तक नहीं हुआ। तब वल्लभ भाई पटेल ने गुरूजी को भेजे हुवे अपने सन्देश में लिखा की ""संघ पर से पाबन्दी उठाने पर मुझे जितनी खुशी हुई इसका प्रमाण तो उस समय जो लोग मेरे निकट थे वे ही बता सकते हैं... मैं आपको अपनी शुभकामनाएं भेजता हूँ।"" चीन आक्रमण के दौरान श्री गुरूजी का मार्गदर्शन श्री गुरूजी ने चीनी आक्रमण आरम्भ होते ही जो मार्ग दर्शन दिया उसके परिप्रेक्ष्य में स्वयंसेवक युद्ध प्रयत्नों में जनता का समर्थन जुटाने तथा उनका मनोबल दृढ करने में जुट गए। उनके सामयिक सहयोग का महत्व पण्डित नेहरू को भी स्वीकार करना पड़ा और उन्होंने सन् 1963 में गणतंत्र दिवस के पथ संचलन में कुछ कांग्रेसियों की आपत्ति के बाद भी संघ के स्वयंसेवकों को भाग लेने हेतु आमन्त्रण भिजवाया। संघ के तीन हजार गणवेषधारी स्वयंसेवकों का घोष की ताल पर कदम मिलाकर चलना उस दिन के कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था। कृतियाँ एवं विचार गोलवलकर ने बंच ऑफ थॉट्सhttp://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-sundaymagazine/the-guru-of-hate/article3232784.ece The guru of hate 18 नवंबर 2018 https://web.archive.org/web/20171123055316/http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-sundaymagazine/the-guru-of-hate/article3232784.ece 23 नवंबर 2017 live तथा वी, ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइंडJaffrelot, Hindu Nationalist Movement 1996 52-58Noorani, The RSS and the BJP 2000 18-23Narendra Modi on MS Golwalkar, translated by Aakar Patel - Part 1 http://www.caravanmagazine.in/vantage/modi-golwalkar-part-1 20 June 2015 https://web.archive.org/web/20150610003500/http://www.caravanmagazine.in/vantage/modi-golwalkar-part-1 10 जून 2015 dead पुस्तकें लिखीं। 'बंच ऑफ थॉट्स' का हिन्दी में "विचार नवनीत" नाम से अनुवाद हुआ है। उनके विचारों पर आधारित संघ द्वारा प्रकाशित "गुरूजी : दृष्टि एवं लक्ष्य" नामक पुस्तक में "हिन्दू - मातृभूमि का पुत्र" नामक एक अध्याय में लिखा है कि 'भारतीय' वही है जिनकी दृष्टि व्यापक है और भारतीय धर्मों के मानने वाले सभी मानते हैं कि ईश्वर एक ही है उसे पाने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। सन्दर्भ पुस्तक ""श्री गुरूजी"": लेखक- हो. वे. शेषाद्रि बाहरी कड़ियाँ श्री माधव सदाशिव गोलवलकर के विचारों एवं कार्यों को समर्पित जालस्थल दीप जो जलता रहा " श्री श्री गुरूजी जन्‍मशताब्‍दी वर्ष पर विशेष " श्रेणी:१९७३ में निधन श्रेणी:राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य श्रेणी:1906 में जन्मे लोग श्रेणी:महाराष्ट्र के लोग