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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

रामचन्द्र मोरेश्वर करकरे

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मई 2025 मई 2025 रामचन्द्र मोरेश्वर करकरे (१९०९ - १९६९) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता सेनानी पं. रामचंद्र मोरेश्वर की जयंती मनाई रामचन्द्र मोरेश्वर करकरे का जन्म शिवपुरी जिले के कोलारस में 1909 ई. में हुआ था। उनके पूर्वज मूल रूप से महाराष्ट्र के कोंकण के रहने वाले थे। बाजीराव पेशवा ने जब छत्रसाल की रक्षात्मक सहायता की थी तब छत्रसाल ने अपने राज्य का एक तिहाई भाग पेशवा को सौंप दिया। उसी दौर में यह परिवार कोंकण से जालौन आकर बस गया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इस परिवार के दो सदस्य रानी लक्ष्मीबाई की सेना में अंग्रेजों की फौज से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। 1857 के महासमर में असफलता के बाद यह परिवार जालौन से ग्वालियर आकर बस गया। बालक रामचन्द्र मोरेश्वर के बचपन ज्के समय भारत में सशस्त्र क्रान्ति की ज्वाला धधक रही थी। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद और इनसे जुडे ग्वालियर क्षेत्र के लोग एक ही माला में गुंथे हुए मोती की तरह थे जिन्होंने ग्वालियर और उसके आसपास के क्षेत्र में सशस्त्र क्रांति की न केवल जमीन तैयार की अपितु इस क्षेत्र को उन्होंने अपनी कर्मभूमि भी बनाया। इन्हीं परिस्थितयों से प्रेरित होकर एवं परिवार से मिले राष्ट्रीय संस्कारों ने रामचन्द्र करकरे को राष्ट्रीय विचारधारा की ओर मोड़ दिया और वे स्वतंत्रता के महासमर में सक्रियता के साथ शामिल हो गए। उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए उन्होंने अपनी मेधा शक्ति को प्रमाणित किया। सन् 1930 में बी.एस.सी. और 1932 ई. में एल.एल.बी. की शिक्षा आगरा विश्वविद्यालय से पूरी की। छात्र रहते हुए ही 1931 ई. में इन्होंने गांधी जी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया। सन् 1936 ई. में करकरे जी 'सार्वजनिक सभा' के साथ जुड गए। इस संस्था के माध्यम से वे धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा लोगों में स्वातन्त्रय-चेतना को जागृत करने में लगे रहे। उस समय उनका परिवार मुरार में रहता था। भारत छोड़ो आन्दोलन में वे 27 अगस्त 1942 ई. को मुरार में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार हुए और 7 महीने तक ग्वालियर एवं शिवपुरी की जेल में बंदी रहे। स्वतंत्रता के बाद करकरे जी का परिवार मुरार छोडकर लश्कर के छत्री बाजार में आकर बस गया। आज भी उनके पुत्र ईश्वरचन्द्र करकरे एवं उनका परिवार छत्री बाजार में निवास कर रहा है। 1944 ई. में करकरे जी कांँग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे। 1946 ई. में वे ग्वालियर राज्य की राज्यसभा के सदस्य चुने गए। स्वतंत्रता के बाद करकरे जी ने जीविकोपार्जन हेतु विधि व्यवसाय को चुना। सन् 1950 से 1958 तक करकरे जी विक्टोरिया कॉलेज के विधि विभाग के अध्यक्ष रहे। साहित्यिक क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी कलम चलाकर कविता, नाटक और कहानियों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने 'जय हिन्द' नामक एक पुस्तक की रचना की जो अत्यन्त देशभक्तिपूर्ण है। सन् 1969 में साठ वर्ष की आयु में करकरे जी का देहावसान हो गया।रामचन्द्र मोलेश्वर करकरे सन्दर्भ श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी