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411 समाचार
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सिख धर्म में बलिदान

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right|thumb|300px|सिखों के बलिदान असंख्य हैं जिनमें दो गुरुओं का महान बलिदान भी है। दोनों बलिदानी गुरुओं में भी गुरु अर्जन देव पहले बलिदानी गुरु हैं बलिदान या शहादत सिख धर्म की एक मूलभूत पहचान है। सिख त्योहार मुख्य रूप से सिख गुरुओं और सिख शहीदों के जीवन पर केंद्रित होते हैं। उनका बलिदान सिखों के लिए शिक्षाप्रद आदर्श मानी जाती है और बलिदान ने सिख संस्कृति और रीति-रिवाजों को बहुत प्रभावित किया है। १९वीं शताब्दी के बाद सिखों में बलिदान की परम्परा को शहीदी के नाम से जाना गया है। अपने कर्तव्य को पूरा करने में जीवन को न्यौछावर कर देने वाले को कभी-कभी शहीद (पंजाबी : गुरुमुखी- ਸ਼ਹੀਦ).https://books.google.com/books?id=Ai-rpcY-rrgC&q=sikh+martyrdom Sikhism: A Very Short Introduction Nesbitt Eleanor 2005-09-22 Oxford University Press 978-0-19-157806-9 en कहते हैं। प्रमुख सिख बलिदानी सिख गुरु साहिबान के काल में गुरु अर्जन देव, ५वें सिख गुरु गुरु तेग बहादुर, ९वें सिख गुरु भाई दयाला उन बलिदानियों में से हैं जिनको १६७५ में इस्लाम को स्वीकार न करने के कारण हत्या कर दी गयी। भाई मति दास सिख इतिहास के महानतम बलिदानियों में से एक हैं। १६७५ में काश्मीरी हिन्दुओं को बचाने के लिये उनकी हत्या कर दी गयी। भाई सती दास सिख इतिहास के महानतम बलिदानियों में से एक हैं। नवम्बर १६७५ में दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर के साथ इनकी भी हत्या कर दी गयी। दया सिंह, पंज प्यारे में से एक धरम सिंह, पंज प्यारे में से एक हिम्मत सिंह, पंज प्यारे में से एक मोहकाम सिंह, पंज प्यारे में से एक साहिब सिंह, पंज प्यारे में से एक साहिबजादा अजीत सिंह, गुरु गोविन्द सिंह के ज्येष्ठ पुत्र साहिबजादा जुझार सिंह, गुरु गोविन्द सिंह के द्वितीय पुत्र साहिबजादा जोरावर सिंह, गुरु गोविन्द सिंह के तृतीय पुत्र thumb|Painting of Mata Gujri, Sahibzada Zorawar Singh, and Sahibzada फतेह सिंह साहिबजादा फतेह सिंह, गुरु गोविन्द सिंह के सबसे छोटे पुत्र बीबी दलैर कौर बाबा मोती राम मेहरा चाली मुक्ते १८वीं शताब्दी (१७०८ के बाद) बंदा सिंह बहादुर, गुरु गोविन्द सिंह द्वारा नियुक्त सेनानायक भाई तारा सिंह वान वान के युद्ध में इन्होंने बलिदान दिया। भाई मनि सिंह भाई माही सिंह भाई तारू सिंह बाबा दीप सिंह, अफगान सेना द्वारा स्वर्ण मन्दिर को अपवित्र किये जाने का बदला ले रहे थे। १७७५ में उन्होंने स्वर्ण मन्दिर की रक्षा के लिये एक सेना लेकर आगे बढे। बाबा गुरबक्श सिंह भाई गर्जा सिंह भाई बोटा सिंह भाई सुबेग सिंह १९वीं शताब्दी अकाली फूला सिंह हरि सिंह नलवा इन्हें भी देखें सन्दर्भ श्रेणी:सिख धर्म