411 REFERENCE · Wikipedia
आस्रव
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
एक जैन दार्शनिक शब्द बौद्ध दर्शन के संबंध आसव
जैन दर्शन के अनुसार, आस्रव संसार का एक तत्त्व अथवा एक मूल यथार्थ हैं। यह आत्मा के कर्म करने के पीछे मन और शरीर के प्रभाव को संदर्भित करता हैं। जैन धर्म में, कर्म की प्रक्रिया सात सत्य या मौलिक सिद्धांतों (तत्त्व) पर आधारित हैं, जो मानव दुर्दशा समझाते हैं।जयंद्र सोनी Jaina philosophy जैन दर्शन https://www.rep.routledge.com/articles/jaina-philosophy रॉउटलेज दार्शनिक विश्वकोश रॉउटलेज 7 सितम्बर 2016 अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20160920215814/https://www.rep.routledge.com/articles/jaina-philosophy 20 सितंबर 2016 deadउन सात में से, चार - आश्रव, बंध, संवर और निर्जरा - कर्म की प्रक्रिया से जुड़े हुएँ हैं। भारतीय दर्शन की दूसरी परंपराओं में भी आत्मा को मलिन करनेवाले तत्त्व आश्रव (पालि:आशव) के नाम से अभिहित किए गए हैं। उनके स्वरूप के विस्तार में भेद होते हुए भी यह समानता है कि आश्रव चित्त के मल है जिनका निराकरण आवश्यक हैं।
अवलोकन
जैन ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र के अनुसार "योग (मन, वचन, और काय की क्रिया) से आश्रम होता है।"
वर्गीकरण
जैन दर्शन
मन, वचन और काया की सहायता से आत्मप्रदेशों में गति होना जैन धर्म में 'योग' कहलाता है और इसी योग के माध्यम से आत्मा में कर्म की पुद्गलवर्गणाओं का जो संबंध होता है उसे आस्रव कहते हैं। आस्रव के दो भेद हैं :
(१) सांपरायिक आस्रव तथा
(२) ईर्यापथ आस्रव।
सभी शरीरधारी आत्माओं को ज्ञानावरणादि कर्मों का (आयुकर्म के अतिरिक्त) हर समय बंध होता रहता है। मोह, माया, मद, क्रोध, लोभ आदि से ग्रस्त आत्माओं को सांपरायिक आस्रव (शुभाशुभ फल देनेवाले कर्मों का होना) होता है और जो आत्माएँ क्रोधादि रहित हैं उन्हें ईयापथ आस्रव (फल न देनेवाले कर्मों का होना) होता है।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
आसव
जैन धर्म में कर्म
जैन धर्म में कर्म के कारण
ईर्यापथ आस्रव
बाहरी कड़ियाँ
आस्रव : स्वरूप और कारणअक्तूबर 2022 InternetArchiveBot
आस्रव (जैनकोष)
श्रेणी:जैन धर्म
श्रेणी:जैन दर्शन