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विग्रहराज चौहान
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शाकंभरी के चाहमान राजा 1150-1163 सीई चौहान वंश जगददेव चौहान अमरगांगेय
right|thumb|300px| वीसलदेव द्वारा निर्मित सरस्वतीकण्ठाभरण विद्यापीठ जिसे बदलकर 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' बना दिया गया।
right|thumb|300px|बीसलपुर स्थित बीसलदेव मंदिर विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित कराया गया था।
सम्राट विग्रहराज चौहान या विग्रहराज चतुर्थ (1150-1163 ई) के एक हिन्दू क्षत्रिय सम्राट थे जिन्होने भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में शासन किया। इनका दूसरा नाम बीसलदेव भी था। उन्होने अपने पड़ोसी राजाओं को जीतकर राज्य को एक साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया। वस्तुतः विग्रहराज अपने युग का महान् विजेता ही नहीं महान् शासक भी था। उसने राजपूत गौरव को अक्षुण्ण ही नहीं रखा बल्कि एकता का संदेश देकर उसमें श्रीवृद्धि भी की। दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक the early Chauhan dynasty में विग्रहराज के शासनकाल को चौहानों का स्वर्ण काल कहा। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार इन्होंने दिल्ली केतोमर वंश के राजा गंगेव को हराया। दिल्ली टोपरा/शिवालिक अभिलेख में विग्रहराज चतुर्थ में लिखवाया कि ‘मैंने तुर्कों को आर्यावर्त से खदेड़ दिया है, मैं चाहता हूं कि मेरे उत्तराधिकारी तुर्कों को अटक नदी के पार खदेड़ कर रखे।’
इन राजा के राज्य में वर्तमान राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के क्षेत्र सम्मिलित थे। उनकी राजधानी अजयमेरु (वर्तमान अजमेर) थी जहाँ उन्होने अनेकों भवनों का निर्माण कराया। जब अजमेर पर मुसलमान शासकों का आधिपत्य हो गया तो उनमें से अधिकांश भवनों को या तो नष्ट कर दिया गया या उन्हें 'इस्लामी भवनों' में परिवर्तित कर दिया गया। इन्हीं में से वीसलदेव द्वारा निर्मित सरस्वतीकण्ठाभरणविद्यापीठ था जो संस्कृत अध्ययन का केन्द्र था। इसे बदलकर 'ढाई दिन का झोपड़ा' नामक मस्जिद बना दी गयी। विग्रहराज जी को 'बिसल देव' उपनाम से बेहतर जाना जाता था। http://www.theindianportrait.com/artwork/maharaja-bisal-dev-warrior-king-of-ajmer/ Indian Portrait of Vishal Dev Chauhan. 26 मई 2017 https://web.archive.org/web/20190419192742/http://www.theindianportrait.com/artwork/maharaja-bisal-dev-warrior-king-of-ajmer/ 19 अप्रैल 2019 dead
राजशेखर की प्रबन्धकोष में विग्रहराज विशालदेव को 'तुरुष्कों का निष्क्रामक' उपाधि से विभूषित करना बताया है। ये अपने असाधारण कार्य के कारण इस उपाधि के सर्वथा योग्य था । इसने तात्कालिक लाहौर के मुसलमान राजा खुसरो और उसके पुत्र खुसरो मलिक को पराजित कर यह उपाधि प्राप्त की थी। पराजित खुसरो मलिक बन्दी बनाकर राजदरबार में लाया गया, किन्तु विग्रहराज ने उसे उदारतापूर्वक क्षमा करके प्राणदान दे दिया। मथुरा, भरतपुर और अहिरवाटी क्षेत्र के भण्डानको को हराया। विग्रहराज चतुर्थ ने कन्नौज के राजा विजयचंद्र गहड़वाल को हराया क्योंकि ये दिल्ली को जितना चाहता था।
यह सच है कि विग्रहराज का अधिकांश समय युद्धों में ही व्यस्त रहा, तो भी कला, संस्कृति और साहित्य के अनन्य उपासक रहा । वह स्वयं एक विद्वान था और कला के महत्त्व को समझने वाला था । इनके आश्रय में रहने वाले राजकवि सोमदेव ने 'ललित विग्रहराज' नाटक की रचना की थी जिसमें विग्रहराज और उनकी वीरता का सटीक वर्णन है। विग्रहराज स्वयं भी एक अच्छा नाटककार था और 'हारिकेल' नाटक की रचना की थी।
वर्तमान समय में 'ढाई दिन का झोंपड़ा' नामक भवन मूलतः विग्रहराज द्वारा बनवाया हुआ एक सरस्वती कंठाभरण संस्कृत पाठशाला थी जिसे मुसलमान शासकों ने तोड़कर इसे परिवर्तित करने का प्रयास किया। अंग्रेज जनरल बंकिघम ने तो इसे वास्तुकला का उत्तम प्रतीक माना है। आज भी इस तथाकथित झोंपड़े के स्तम्भ एवं अन्य अवशेषों पर दृष्टिपात करें तो लगता है कि शिल्पियों ने इसके निर्माण में अपने प्राण फूंके थे। इतिहासकारों का मानना है कि विग्रहराज ने अजमेर में अनेक और देव मन्दिरों का भी निर्माण कराया था, जिनके मौन खंडहर आज भी काल की धूल में इधर-उधर दबे हुए इनकी संस्कृति - प्रियता का बखान कर रहे हैं। विग्रहराज चतुर्थ के युद्ध एवं संधि का मंत्री पद्मनाभ थे।
किल हॉर्न के अनुसार विग्रहराज चतुर्थ वह शासक था जो कालिदास और भारवी की विद्वता में मुकाबला कर सकता था। जैन विद्वान धर्मघोष सूरी को आश्रय दिया तथा उनके प्रभाववश अपने साम्राज्य में एकादशी पर पशु बलि पर रोक लगा दी। जयानक के अनुसार विग्रहराज चतुर्थ की मृत्यु के बाद कविबांधव की उपाधि निरर्थक हो गई।
विग्रहराज ने अपनी प्रजा की सुख-सुविधाओं के लिए आज के अजमेर की उपत्यका में एक 'बीसलपाल' नाम का सरोवर भी बनाया था जो उस समय के वैभाव की कहानी तो कहता ही साथ ही शासक के जनकल्याणी - मन का प्रदर्शन कराता है। पृथ्वीराज रासो में इसके सन्दर्भ में लिखा है कि मृगया से लौटते हुए विग्रहराज को निर्झरों की सुललित कल-कल ध्वनि से प्रतिध्वनित और प्रकृति के अपार हरीतिमापूर्ण वैभव से युक्त यह प्रदेश इतना आकर्षक प्रतीत हुआ कि उसने तत्काल अपने साथ चल रहे मंत्री को सरोवर बनाने का आदेश दे डाला। विग्रहराज चतुर्थ ने संस्कृत में हरकेली नाटक लिखा जिसमें महाभारत काल में अर्जुन व शिकारी के रूप में भगवान शिव के मध्य युद्ध का वर्णन है। यह नाटक ब्रिस्टल में स्थित राजा राममोहन राय के स्मारक पर भी लिखा है। जयानक की पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् में इंद्रपुर के राजा बसंतपाल की पुत्री देसल और विग्रह राज चतुर्थ की प्रेम कहानी है। नरपति नाल्ह की वीसलदेव रास में मालवा के राजा परमार भोज की पुत्री राजमती और विग्रहराज चतुर्थ के प्रेम संबंधों और इनकी उड़ीसा विजय का वर्णन है।
1158 के नरहड़ अभिलेख में इनकी उपाधि महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर, श्रीमद् मिलती है। जयानक की पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् मे इनकी उपाधि कविबंधु, कटिबंधु, कविबांधव मिलती है जिसका अर्थ है विद्वानों का आश्रयदाता। सोमदेव सुरि की ललितविग्रहराज में इन्हें विद्वानों में सर्वप्रथम कहा गया है।
संदर्भ
Asoke Kumar Majumdar Chaulukyas of Gujarat https://books.google.com/books?id=ffAdAAAAMAAJ Bharatiya Vidya Bhavan 1956 4413150
Dasharatha Sharma Early Chauhān Dynasties S. Chand / Motilal Banarsidass 1959 9780842606189 https://books.google.com/books?id=n4gcAAAAMAAJ
R. B. Singh History of the Chāhamānas N. Kishore 1964 https://books.google.com/books?id=TKs9AAAAIAAJ 11038728
Shyam Singh Ratnawat Krishna Gopal Sharma History and culture of Rajasthan: from earliest times upto 1956 A.D 1999 University of Rajasthan. Centre for Rajasthan Studies 42717862 https://books.google.com/books?id=6yNuAAAAMAAJ
इन्हें भी देखें
वीसलदेव रास
श्रेणी:चौहान वंश
श्रेणी:शाकंभरी के चाहमान
श्रेणी:१२वीं शताब्दी के भारतीय शासक