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इस्सा
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thumb|right|इस्सा
परिचय
कोबायाशि इस्सा(१७६३-१८२७) का जन्म जापान के पर्वतीय शिनानो प्रान्त के छोटे से गाँव काशिवाबारा में १५ जून १७६३ ई० को हुआ। https://web.archive.org/web/20090307155642/http://en.wikipedia.org/wiki/Kobayashi_Issa 7 मार्च 2009 http://en.wikipedia.org/wiki/Kobayashi_Issa https://web.archive.org/web/20090307155642/http://en.wikipedia.org/wiki/Kobayashi_Issa 7 मार्च 2009 इस्सा काशिवाबारा उस समय एदो के राज-मार्ग पर एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र था। इस्सा का पूरा नाम कोबायाशि इस्सा है। इस्सा हाइकु के प्रमुख चार कवियों- (बाशो, बुसोन,इस्सा, शिकि) में से एक हैं।जापानी कविताएँ, अनुवाद- सत्यभूषण वर्मा, सीमान्त पब्लिकेशंस इंडिया, 65/1 हिन्दुस्थान पार्क, कलकत्ता-700029, 1977, पृष्ठ-110 इस्सा का पूरा जीवन परेशानियों में बीता। उनका जन्म गरीब किसान परिवार में हुआ। जब वह तीन वर्ष के थे तभी उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। जब इस्सा आठ वर्ष की हुए तभी उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया उनकी सौतेली माँ का बर्ताव उनके प्रति अच्छा नहीं रहा। पूरे जीवन भर वे परेशानियों से जूझते रहे, इसका असर उनकी कविताओं पर भी दिखाई देता है। उनके हाइकु जीवन में होने वाली दैनिक घटनाओं की छोटी-बड़ी समस्याओं को लेकर लिखे गये हैं। इस्सा का निधन ५ जनवरी १८२७ ई० को इसी गाँव में हुआ।
शिक्षा
शिम्पो नाम का एक स्थानीय कवि बच्चों को पढ़ाने के लिए एक स्कूल चलाता था। उसी स्कूल में एक अन्य शिक्षक था जो चीनी साहित्य का विद्वान था तथा हाइकु कवि भी था। इस्सा की प्रारम्भिक शिक्षा इन्हीं दोनों गुरुओं की देख रेख में हुई। १४ वर्ष की अवस्था में वे एदो चले आये। वहाँ अनेक वर्षों तक संघर्ष से जूझते हुए प्रसिद्ध हाइकु कवि सोगान के शिष्य बने और शीघ्र ही अपनी प्रतिभा और अध्यवसाय से प्रतिष्ठा प्राप्त की।
पारिवारिक जीवन
इस्सा के पिता की मृत्यु १८०१ ई॰ में हो गयी। पिता की मृत्यु के पश्चात इस्सा को अपनी सौतेली माँ के साथ पैतृक सम्पत्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा। संघर्ष के बाद इस्सा को पैतृक सम्पत्ति मिल गई और वे अपने पैतृक मकान के हिस्से में आकर बस गये। इस्सा ने ५२ वर्ष की अवस्था में विवाह किया। उनकी कई सन्ताने हुईं पर कोई जीवित न रही। कुछ समय बाद पत्नी की भी मृत्यु हो गई। इस्सा ने दूसरा विवाह किया परन्तु सम्बंध निभ नहीं सके। इस्सा ने ६२ वर्ष की अवस्था में तीसरा विवाह किया। इस विवाह से इस्सा को एक पुत्री हुई जिसके वंशज आज भी जीवित हैं। पुत्री के जन्म से पहले ही ६५ वर्ष की आयु में १८२७ ई॰ में इस्सा की मृत्यु हो गई। इस्सा का पूरा जीवन दुःख और संघर्ष की एक करुण गाथा है।जापानी हाइकु और आधुनिक हिन्दी कविता, डा॰ सत्यभूषण वर्मा, हिन्दी विकास पीठ, १३८/३, विजय नगर, मेरठ-२५०००१, प्रथम संस्करण-१९८३, पृष्ठ-२१
इस्सा के हाइकु
अपने बचपन के अकेलेपन के दर्द को इस्सा ने अपने एक हाइकु में व्यक्त किया है-
ओरे तो किते
आसोबे यो ओया नो
नाइ सुजुमे
मेरे साथ आकर
खेलो-मातृहीन
गौरैया
अपनी झोपड़ी में तो
दोपहर से होता है शुरू
'''साल का पहला दिन"'
सन्दर्भ
श्रेणी:हिन्दी हाइकु
श्रेणी:साहित्य। हाइकु