411 REFERENCE · Wikipedia
बाणभट्ट की आत्मकथा
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
बाणभट्ट की आत्मकथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित एक ऐतिहासिक हिन्दी उपन्यास है। इसमें तीन प्रमुख पात्र हैं- बाणभट्ट, भट्टिनी तथा निपुणिका। इस पुस्तक का प्रथम प्रकाशन वर्ष 1946 में राजकमल प्रकाशन ने किया था। इसका नवीन प्रकाशन 1 सितम्बर 2010 को किया गया था।बाणभट्ट की आत्मकथा 2010 राजकमल प्रकाशन 8126704284 292 https://books.google.co.in/books?id=sdZ_FKL7yggC 28 जनवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170202080459/https://books.google.co.in/books?id=sdZ_FKL7yggC 2 फ़रवरी 2017 live यह उपन्यास आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की विपुल रचना-सामर्थ्य का रहस्य उनके विशद शास्त्रीय ज्ञान में नहीं, बल्कि उस पारदर्शी जीवन-दृष्टि में निहित है, जो युग का नहीं युग-युग का सत्य देखती है। उनकी प्रतिभा ने इतिहास का उपयोग ‘तीसरी आँख’ के रूप में किया है और अतीतकालीन चेतना-प्रवाह को वर्तमान जीवनधारा से जोड़ पाने में वह आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। बाणभट्ट की आत्मकथा अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्यत्व की गरिमा से पूर्ण है।
कथानक
इस उपन्यास में द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाणभट्ट के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूँथकर एक ऐसी कथाभूमि निर्मित की है जो जीवन-सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है। इसका कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का ढेला नहीं’, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है। ‘अपने को निःशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखने वाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती है-
''वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे?
'बाणभट्ट की आत्मकथा' हर्षकालीन सभ्यता एवं संस्कृति का जीवन्त दस्तावेज है। ऐतिहासिक उपन्यासकार को अतीत में भी प्रवेश करना पड़ता है। अतीत में प्रविष्ट हो कर ही इतिहास को वर्तमान संदर्भो के साथ जोड़ पाता है। इसी जुड़ाव के माध्यम से ऐतिहासिक उपन्यासकार अतीत को चित्रित करता है।
पात्र
बाणभट्ट(भट्ट)- असली नाम दक्ष
निउनिया- निपुणिका का प्राकृत नाम
भट्टिनी- देवपुत्र तुवरमिलिंद की कन्या
विशेषताएँ
इस उपन्यास के माध्यम से हजारीप्रसाद द्विवेदी के स्त्री संबंधी विचारों को भी समझने में सहायता मिलती है। निउनिया को उज्जयिनी की नाटक-मंडली में भर्ती करने के पश्चात् भट्ट सोचता है कि- "साधारणतः जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है, यह बात लोग भूल जाते हैं। मैं नहीं भूलता। मैं स्त्री-शरीर को देव-मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।"हजारीप्रसाद द्विवेदी बाणभट्ट की आत्मकथा 2010 राजकमल प्रकाशन नयी दिल्ली 16
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
बाणभट्ट की आत्मकथा (गूगल पुस्तक ; रचनाकार- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी)
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का उपन्यास : बाणभट्ट की आत्मकथा
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में इतिहास-बोध (डॉ० राजेन्द्र गौतम)
श्रेणी:हिन्दी साहित्य
श्रेणी:आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी