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411 समाचार
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रश्मिरथी (खंड काव्य)

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रश्मिरथी रामधारी सिंह दिनकरदिनकर रामधारी सिंह रामधारी सिंह दिनकर रश्मिरथी (मूल पुस्तक) हिन्दी रश्मिरथी लोकभारती प्रकाशन 1952 हिन्दी भारत साहित्य 175 978-81-8031-363-9 रश्मिरथी, जिसका अर्थ "सूर्यकिरण रूपी रथ का सवार" है, हिन्दी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित प्रसिद्ध खण्डकाव्य है। यह 1952 में प्रकाशित हुआ था। इसमें 7 सर्ग हैं। इसमें कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का सजीव चित्रण किया गया है। रश्मिरथी में दिनकर ने कर्ण की महाभारतीय कथानक से ऊपर उठाकर उसे नैतिकता और विश्वसनीयता की नयी भूमि पर खड़ा कर उसे गौरव से विभूषित कर दिया है। रश्मिरथी में दिनकर ने सारे सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों को नये सिरे से जाँचा है। चाहे गुरु-शिष्य सम्बन्धों के बहाने हो, चाहे अविवाहित मातृत्व और विवाहित मातृत्व के बहाने हो, चाहे धर्म के बहाने हो, चाहे छल-प्रपंच के बहाने। युद्ध में भी मनुष्य के ऊँचे गुणों की पहचान के प्रति ललक का काव्य है ‘रश्मिरथी’। ‘रश्मिरथी’ यह भी सन्देश देता है कि जन्म-अवैधता से कर्म की वैधता नष्ट नहीं होती। अपने कर्मों से मनुष्य मृत्यु-पूर्व जन्म में ही एक और जन्म ले लेता है। अन्ततः मूल्यांकन योग्य मनुष्य का मूल्यांकन उसके वंश से नहीं, उसके आचरण और कर्म से ही किया जाना न्यायसंगत है। दिनकर में राष्ट्रवाद के साथ-साथ दलित मुक्ति चेतना का भी स्वर है, रश्मिरथी इसका प्रमाण है। दिनकर के अपने शब्दों में, कर्ण-चरित्र का उद्धार, एक तरह से नई मानवता की स्थापना का ही प्रयास है। समीक्षा हिन्दी के छायावादोत्तर युग की अनुपम उपलब्धि में दिनकर व बच्चन हैं। हिन्दी के सामान्य पाठकों में भी दिनकर की ओजपूर्ण कविताओं ने नव रुचि और नव उत्साह का संचार किया। उनकी कविताओं का प्रधान स्वर अन्याय के प्रति आक्रोश का है। समाज में संस्थागत हो चुके अन्याय के प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति के लिए दिनकर को ऐसे नायक की तलाश थी जो उदात्त चरित्र-सम्पन्न होने के अतिरिक्त अनिवार्यतः पराक्रमी हो। महाभारत के कर्ण में उन्हें मानस परिकल्पित नायक का समरूप मिल गया। महाभारत में स्वयं श्रीकृष्ण के कर्ण के प्रति व्यक्त उद्गार ध्यातव्य हैं- त्वमेव कर्णं जानासि वेदवादान् सनातनम्।त्वमेव धर्मं शास्त्रेषु सूक्ष्मेषु परिनिष्ठितः॥ सिंहर्षभ गजेन्द्राणां बलवीर्य पराक्रमः। दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्दुज्वलनोपमः॥ ओजस्वी कविता की रचना में रमने वाले दिनकर का मन तेजस्वी कर्ण के व्यक्तित्व से सहज ही अभिभूत हो गया। युयुत्सा और संघर्ष कर्ण के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग थे। वैयक्तिकता का निषेध करने वाली वर्ण व्यवस्था के प्रति कर्ण के संघर्ष का आरम्भ किशोरावस्था से ही हो जाता है। किशोर कर्ण के अन्दर एक महान योद्धा होने की संभावना बीजरूप में विद्यमान थी। इस संभावना को विनष्ट करने की एक नाकाम कोशिश द्रोणाचार्य द्वारा कर्ण को शिष्य रूप में अस्वीकार किया जाना थी। परन्तु कर्ण तो मरुस्थल की वनस्पति की जिजीविषा लेकर जन्मा था, जो रेत से भी आर्द्रता सोख ही लेते हैं। ज्ञान पर एकाधिकार की कपट क्रीड़ा का प्रतिरोध किशोर कर्ण परशुराम के समक्ष अपने वास्तविक परिचय को गोपन रखकर करता है। किशोर कर्ण का यह ‘असत्य’ प्रचलित व्यवस्था के क्रूर सत्य की तुलना में नगण्य था, फिर भी कर्ण शाप का भाजन बना। वैयक्तिकता और व्यक्तित्व के हनन की ये दुष्चेष्टाएँ वर्तमान काल के लिए सर्वथा अप्रासंगिक हों, सो बात नहीं। हाँ, परिवर्तन की सुगबुगाहट अवश्य दिखने लगी है। स्वयं दिनकर के शब्दों में -‘आगे मनुष्य केवल उसी पद का अधिकारी होगा जो उसके सामर्थ्य से सूचित होता है, उस पद का नहीं जो उसके माता-पिता या वंश की देन है। इसी प्रकार व्यक्ति अपने निजी गुणों के कारण जिस पद का अधिकारी है वह भी इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकेंगे। कर्ण-चरित का उद्धार एक तरह से नयी भावना की स्थापना का ही प्रयास है।’ कर्ण का दलित आत्मगौरव यौवनकाल में अर्जुन को चुनौती देने के बहाने पूरी व्यवस्था के जड़ प्रतिमानों को चुनौती देता है - तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ चाहे तो कुछ नई कलाएँ भी सिखला सकता हूँं। कर्ण के जातीय परिचय की आड़ में कृपाचार्य द्वारा जब वैयक्तिकता के उद्घोष के स्वर को शमित करने का पुनः प्रयास होता है तो कर्ण का संचित आक्रोश फूट पड़ता है- जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाखंड, मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदण्ड। ...पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज प्रकाश, मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास। दिनकर पूरे विश्व को अपने हृदय में समेटने वाली सहानुभूति को आदर्श मानते थे। उन्हीं के शब्दों में देखिए -‘‘भारत का मन राष्ट्रीय कम, अन्तरराष्ट्रीय अधिक रहा है। तब भी, दासता से मुक्ति पाने के लिए हमने राष्ट्रीय विशेषण को स्वीकार कर लिया, सिर्फ इस भाव से कि राष्ट्रीयता के जागरण के बिना दासता का अन्त असम्भव है।’’ कवि राष्ट्र की सीमा को भी स्वीकार नहीं करना चाहता और यह उस सरीखे महान कवि के लिए स्वाभाविक ही है क्योंकि विस्तार ही जीवन है और संकुचन मृत्यु। हृदय के विस्तार से ही परपीड़ा की समानुभूति की क्षमता मनुष्य में आती है और तभी वह प्रत्युपकार की लालसा किये बगैर अपना सर्वस्व भी उत्सर्ग कर पाता है। दान इसी विस्तार का व्यवहार में आंशिक रूपायन है। दिनकर की दृष्टि में दान करने की क्षमता उदात्त चरित्र का सबसे प्रमुख लक्षण है। यह क्षमता संसार में विरले लोगों में ही पायी जाती है। अपनी क्षुध पर विजय प्राप्त करने वाला आत्मबली तो है किन्तु दूसरों की क्षुधग्नि शान्त करने के लिए दान देने वाला अधिक आत्मबली है। कर्ण ऐसे विरले आत्मबलियों में से एक था। देवराज इन्द्र की कपट मंशा को भाँप कर भी उन्हें निःशंक करने के लिए वह कहता है : विप्रदेव माँगिए छोड़ संकोच वस्तु मनचाही, मरूँ अयश की मृत्यु करूँ यदि एक बार भी नाही। कर्ण का यह जानबूझकर ‘छला जाना’ उसके चरित्र को और उज्ज्वल बनाता है। जीवन देकर जय खरीदना, जग में यही चलन है, विजय-दान करता न प्राण को रखकर कोई जन है, मगर, प्राण रखकर प्रण अपना आज पालता हूँ मैं, पूर्णाहुति के लिए विजय का हवन डालता हूँ मैं। कर्ण की इस वीरता से इन्द्र का भी हृदय परिवर्तित हो जाता है और वे कर्ण को एकाघ्नि देने के लिए विवश हो जाते हैं। कर्ण-कुन्ती प्रसंग में दिनकर ने कर्ण को उपेक्षित पुत्र की भूमिका में रखा है। माता की कठोर उपेक्षा के कारण कर्ण लांछन भरा अभिशप्त जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है। अतएव इस प्रसंग में माता द्वारा अप्रत्याशित स्नेह के प्रदर्शन पर उसका संचित विक्षोभ फूट पड़ता है। परन्तु कर्ण तो स्वभावतः ही उदारमना है जिसका नेह सब पर है और जिसकी दया सबके प्रति है। फिर जननी के प्रति वह कब तक कठोर रह सकता था। कर्ण मित्र-धर्म के निर्वाह के अर्थ अर्जुन को छोड़ शेष समस्त भाइयों को युद्ध में नहीं मारने का विलक्षण संकल्प करता है। दान के अतिरिक्त कृतज्ञता भी श्रेष्ठ पुरुषों में पायी जाती है। स्वल्प सहायता भी उचित समय पर किये जाने पर अमूल्य हो जाती है, फिर दुर्योधन ने तो रंगभूमि में व्यंग्य के तीक्ष्ण बाणों से हतप्रभ कर्ण को उबारने के लिए उसे अंग प्रदेश का राजा ही घोषित कर दिया। कृतज्ञता और मित्र के प्रति प्रेम के वशीभूत होकर ही कर्ण कुन्ती के आग्रह को ठुकराता हुआ कहता है - जोड़ने नहीं बिछुड़े वियुक्त कुल जन से फोड़ने मुझे आई हो दुर्योधन से। कपटी दुर्योधन का साथ देने के बावजूद कदाचित् कृतज्ञता की कर्तव्य भावना से प्रेरित होने के कारण ही कर्ण का व्यक्तित्व किंचित भी मलिन नहीं होता। द्रौपदी का चीरहरण ही एक ऐसा प्रसंग है जहाँ कर्ण का आहत अभिमान उसे नारी की अस्मिता की रक्षा के लिए विरोध का स्वर भी मुखरित नहीं करने देता। दिनकर ने कर्ण-अर्जुन युद्ध के प्रसंग में कर्ण से पश्चाताप व्यक्त करवाकर इस कलंक को धोने की कोशिश की है। द्रौपदी चीर हरण के प्रसंग को छोड़ दिया जाये तो कर्ण का चरित्र सर्वथा निष्कलंक है। कर्ण के युद्ध में सेनापति बनने तक युद्ध समस्त मर्यादाओं के अतिक्रमण से वीभत्स स्वरूप गहण कर चुका था परन्तु कर्ण पुनः मर्यादा की स्थापना करने की कोशिश करता है। नागवंश के सर्प अश्वसेन के उसके तूणीर पर सवार हो अर्जुन को डँसने देने के आग्रह को अस्वीकार करता हुआ वह कहता है - उस पर भी साँपों से मिलकर, मैं मनुज, मनुज से युद्ध करूँ? जीवन भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुद्ध करूँ? संसार कहेगा जीवन का, सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया। प्रतिभट के वध के लिए सर्प का, पापी ने साहाय्य लिया। कर्ण ने तो अधर्म का आश्रय नहीं लिया परन्तु अर्जुन ने नीतिज्ञ कृष्ण का कहा सुन अवश्य अधर्म का आश्रय ले लिया। कर्ण के रथ का पहिया पंक में फँस गया और निःशस्त्र, पहिया निकालते कर्ण को अर्जुन ने अपने बाणों से बींध डाला। कर्ण के जीवन का सूर्य इस प्रकार अस्त हो गया परन्तु उसकी प्रभा का तूर्य अनन्त काल तक समष्टि को व्यष्टि के माहात्म्य का आख्यान करने के लिए बजता रहेगा। दिनकर कर्ण-चरित के उद्धार के माध्यम से अपने अभीष्ट की अर्थात् नवीन जीवन मूल्यों की स्थापना में कितना सफल हो सके हैं। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ रश्मिरथी (कविता कोष) गीता-कविता श्रेणी:हिन्दी की कवितायें