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411 समाचार
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पलामू

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पलामू भारत में झारखंड राज्य का एक जिला है। इसका ज़िला मुख्यालय मेदनीनगर है। पहले यह डाल्टनगंज के नाम से जाना जाता था लेकिन आनंदमार्ग के लक्ष्मण सिंह, बैद्यनाछ साहू, युगलकिशोर सिंह, विश्वनाथ सिंह, जगनारायण सिंह जैसे लोगों ने लंबे समय तक आंदोलन किया और शहर का नाम मेदनीनगर किया गया। यहां के राजनीतिज्ञों में इंदर सिंह नामधारी(लोक सभा अध्यक्ष), ज्ञानचंद पांडेय, शैलेंद्र, केडी सिंह आदि मुख्य हैं। पत्रकारों में आलोक प्रकाश पुतुल ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता हासिल की है। अन्य पत्रकारों में रामेश्वरम, गोकुल बंसंत, फैयाज अहमद, उपेन्द्र नाथ पान्डेय, अरूण कुमार सिंह आदि शामिल हैं। गढ़वा जिला निवासी उपेन्द्र नाथ पांडेय ने झारखंड और बिहार में अपनी लोकप्रियता हासिल की है। साहित्य व कविता जगत में बिंदु माधव शर्मा, विद्या वैभव भारद्वाज वअभिनव मिश्र ने पलामू का नाम रौशन किया है। करण सिंह चेरो == इतिहास == === प्रसिद्ध चेरो राजा === सत्रहवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में दक्षिण बिहार में चेरो राजा सबसे प्रभावशाली थे। भगवंत राय (१६१३-१६३०) एक दिलेर योद्धा था जिसने मुगलों से क्षेत्र छीनकर राज्य स्थापित किया था। अगले चेरो राजा अनंत राय (१६३०-१६६१) ने लंबे समय तक राज किया। उसका राज्यकाल संग्रामशील रहा क्योंकि उसे मुगलों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। मेदिनी राय (१६६२-१६७४) ने केवल १३ साल राज किया, लेकिन वह सबसे अधिक विख्यात चेरो राजा है। वह बड़ा ही न्यायप्रिय था और अपनी प्रजा से बहुत कम कर वसूलता था। पलामू के किलों में से पुराने किले का निर्माण इसी राजा ने करवाया था। मेदिनी राय के बाद प्रताप राय (१६७५-१६८१) का राज्यकाल शुरू हुआ। उसने पलामू के दूसरे किले का निर्माण कार्य आरंभ करवाया, लेकिन वह किले को पूरा नहीं कर सका। आज भी किला बनाने के लिए लाए गए पत्थरों का ढेर और अपूर्ण किले के हिस्सों का खंडहर पलामू के जंगलों में विद्यमान है। === पलामू के किले === जब चेरो राज्य उत्कर्ष पर था, पलामू एक अच्छी-खासी नगरी थी। उसमें अनेक भव्य बाजार थे और उसकी रक्षा के लिए दो मजबूत किले थे। ये किले ईंट-पत्थर के बने थे। उनके डेढ़ मीटर चौड़े बाहरी दीवारों में जगह-जगह तोप के गोलों के निशान हैं। नए किले में सुंदर नक्काशीवाला बड़ा फाटक था जिसे नागपुरी द्वार कहते हैं। दोनों किलों में गहरे कुंए थे, जिससे किले में शरण ली हुई सेना को पानी की कमी नहीं होती थी। किले के बगल से ओरंगा नदी बहती थी और किले के चारों ओर ऊंची पहाड़ियां और घने जंगल थे। === १८५७ में पलामू === सन १८५७ की क्रांति के समय पलामू में अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक सशस्त्र संग्राम छिड़े थे। पलामू की बगावत सच्चे अर्थ में राष्ट्रीय आंदोलन थी क्योंकि उसमें आम प्रजा ही नहीं राजा, सामंत और जमींदार भी शामिल हुए थे। यह संग्राम सन १८५८ तक चलता रहा। उसमें चेरो के साथ मिलकर बोगता और खरवार जनजाति के लोगों ने खुलकर हिस्सा लिया। == पलामू राष्ट्रीय अभयारण्य == पलामू में ही राष्ट्रीय ख्याति का पलामू राष्ट्रीय अभयारण्य भी स्थित है। अभयारण्य लगभग 250 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह १९७४ में बाघ परियोजना के अंतर्गत गठित प्रथम ९ बाघ आरक्षों में से एक है। पलामू व्याघ्र आरक्ष १,०२६ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें पलामू वन्यजीव अभयारण्य का क्षेत्रफल 980 वर्ग किलोमीटर है। अभयारण्य के कोर क्षेत्र 226 वर्ग किलोमीटर को बेतला राष्ट्रीय उद्यान के रूप में अधिसूचित किया गया है। पलामू आरक्ष के मुख्य आकर्षणों में शामिल हैं बाघ, हाथी, तेंदुआ, गौर, सांभर और चीतल। पलामू ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सन १८५७ की क्रांति में पलामू ने अहम भूमिका निभाई थी। चेरो राजाओं द्वारा निर्मित दो किलों के खंडहर पलामू व्याघ्र आरक्ष में विद्यमान हैं। पलामू में कई प्रकार के वन पाए जाते हैं, जैसे शुष्क मिश्रित वन, साल के वन और बांस के झुरमुट, जिनमें सैकड़ों वन्य जीव रहते हैं। पलामू के वन तीन नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये नदियां हैं उत्तर कोयल औरंगा और बूढ़ा। २०० से अधिक गांव पलामू व्याघ्र आरक्ष पर आर्थिक दृष्टि से निर्भर हैं। इन गांवों की मुख्य आबादी जनजातीय है। इन गांवों में लगभग १,००,००० लोग रहते हैं। पलामू के खूबसूरत वन, घाटियां और पहाड़ियां तथा वहां के शानदार जीव-जंतु बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। अब झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी वाहन उपलब्ध कराया जाएगा, बल्कि ठहरने, खाने और सुरक्षा का भी इंतजाम कराया जाएगा. पहले इन इलाकों में घूमने पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस अभयारण्य तक पहुँचने के लिए भारतीय रेल द्वारा रांची स्टेशन से जाया जा सकता है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा रांची है। == यह भी दे्खें == पालामऊ व्याघ्र आरक्षित वन पलामू जिला == सन्दर्भ ==