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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

औदीच्य ब्राह्मण

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[http://www.facebook.com/photo.php?fbid=115602335288356&set=a.115602241955032.16807.100005157700447&type=1&theater औदिच्य सहस्त्र ब्राह्मिन फौन्डेसन एक स्वप्न कभी तो साकार होगा] http://www.facebook.com/photo.php?fbid=109757425872847&set=exp.109570919224831.start&type=1&theater औदिच्य ब्राह्मण के रूप में मूल इतिहास औदिच्य ब्राह्मण के रूप में मूल इतिहास वर्ष 950 ई. के आसपास से पाया जाता है। ज्ञात होता है कि, वर्ष 942 ई. में मूलराज सोलंकी ने अपने मामा व तत्कालीन राजा सामंत सिंह चावड़ा की हत्या कर अन्हीलपुर पाटन के सिंहासन पर कब्जा कर लिया था। उन दिनों (1) सत्तारूढ़ राजा की हत्या और (2) पुजारी की हत्या जैसे अपराधों को अक्षम्य अपराध माना जाता था जिसकी सजा आत्मदाह थी और जिसका परिमार्जन केवल श्रीमाली ब्राह्मणों के द्वारा ही संभव होता था। पर, जब मूलराज, श्रीमालियों के प्रिय रहे राजा सामंत सिंह की हत्या के अपराधी के रूप में कुख्यात हो गए तो इस जघन्य अपराध के परिमार्जन व मूलराज को राजा घोषित करने से श्रीमाली ब्राह्मणों ने कड़ाई से मना कर दिया। अर्से से चावड़ा राजाओं के साथ जुड़े रहे गुजरात के ये याजक ब्राह्मण श्रीमाल भिन्न्मल, जो कि राजस्थान (वर्तमान राज्य) के दक्षिणी भाग में स्थित, से आये थे। श्रीमाली ब्राह्मण राज्य के सरकारी याजक थे। उनके कार्यों में, धर्म और न्याय शामिल था। उन्होंने मूलराज को आशीर्वाद देने और उसे राजा के रूप में घोषित करने से मना कर दिया था। किसी भी तरह से उन्हें समझाने, धन, धमकी आदि का उन ब्राह्मणों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब एक अघोषित राजा के रूप में ही मूलराज ने प्रायश्चितस्वरुप 'रुद्र यज्ञ' करने और एक विशाल रुद्र (शिव) मंदिर बनाने का संकल्प लिया। फिर भी श्रीमाली ब्राह्मण पुजारीगण (याजक) नहीं माने। मूलराज के आत्मदाह पर अड़े याचक श्रीमाली ब्राह्मणों को तब गुजरात राज्य के भावी विनाश और अराजकता के बारे में बताया गया पर उनके उपर इसका भी कोई असर नहीं पड़ा। उसी समय कई चावड़ा वंशजों का सिंहासन के लिए दावे भी आने शुरू हो गए थे। राज्य की सीमा पर दुश्मनों ने गुजरात को जीतने के लिए अपनी सरगर्मियां तेज कर दी थी। अगर राज्य को बनाए रखना था तो निश्चय ही मूलराज और श्रीमालियों के बीच सुलह की अत्यधिक जरुरत थी लेकिन श्रीमाली याजक परिस्थितियों को समझने के बाद भी मूलराज को हत्या के दंड से मुक्त करने के पक्षधर नहीं हुए। अंततः मूलराज के मित्रों और मंत्रीमंडल के सदस्यों ने गोपनीय रुप से देश के भिन्न-भिन्न इलाकों से विद्वान ब्राह्मणों को लाकर बसाने व उन्हें वह सब देने का निर्णय लिया जो अबतक श्रीमालियों को मिलता रहा था। तुरंत इस काम को करने के लिए मंत्री माधव के नेतृत्व में कई दलों को गंगा और यमुना नदियों के मैदानों में स्थित विभिन्न महत्वपूर्ण व ब्राह्मण बहुल इलाकों में भेजा गया और वहां के विद्वान ब्राह्मणों को लुभावने स्थायी प्रवास व अनुपम राजकीय प्रश्रय व व्यवस्था का लोभ देकर गुजरात आने के लिए राजी करवाया गया। किसी भावी साजिश से बचने के लिए, यह भी यह सुनिश्चित किया गया कि सब ब्राह्मणों को अलग-अलग स्थानों से लाया जाये। मूलराज और उनके मंत्री माधव ने इस बाबत अपने पुरखों की भूमि कान्यकुब्ज से बुलाए गए ब्राह्मणों को प्राथमिकता दी ताकि अन्य सहित पूर्व के श्रीमाली ब्राह्मणों के वर्चस्व की कमी हो सके। इसप्रकार मूलराज खुद एक वैद्य राजा हो सकता और नवांगतुक ब्राह्मण परिवारों पर उसकी पकड़ भी बनी रहती। इस प्रकार योजनानुसार 1037 ब्राह्मण परिवारों का एक बड़ा कारवां सिद्धपुर पाटन पहुंचा। अबतक अघोषित राजा मूलराज ने कहे गए वादों से अधिक की सुविधा दिलवा कर उन्हें सदा के लिए अपना बना लिया। परंपरागत रुप से ब्राह्मणों को अपने प्रवास या मूल के स्थान के द्वारा जाना जाता था। अतः उत्तर दिशा से आने के कारण और अतीत के विभिन्न गोत्रो से मिलकर बने ब्राह्मणों के इस बड़े समूह को आधिकारिक तौर पर सहस्त्र औदिच्य ब्राह्मण नामित किया गया था। संस्कृत में, औदिच्य का अर्थ उत्तरी दिशा से है। इसप्रकार गोत्र मूल यथावत रहा और स्थान राजा मूलराज सोलंकी द्वारा प्रदत्त, श्री स्थल, जो कालांतर में सिद्धपुर पाटन के रूप में जाना जाता है, वही उनका स्थायी स्थान बना। इस प्रकार गोत्रके नाम और संख्या, परिवारों के उनके मूल स्थान पर बसने के अनुसार हुई। जमदग्नि, वत्सस, भार्गव (भृगु), द्रोण, दालभ्य, मंडव्य, मौनाश, गंगायण, शंकृति, पौलात्स्य, वशिष्ठ, उपमन्यु, 100 च्यवन आश्रम, कुल उद्वाहक, पाराशर, लौध्क्षी, कश्यप: नदियों गंगा एवं यमुना सिहोरे और सिद्धपुर क्षेत्रों से 105 विमान, 100 सरयू नदी दो भारद्वाज कौडिन्य, गर्ग, विश्वामित्र, 100 कान्यकुब्ज सौ कौशिक, इन्द्रकौशिक, शंताताप, अत्री, 100 हरिद्वार क्षेत्र और औदालक, क्रुश्नात्री, श्वेतात्री, चंद्रत्री 100 नेमिषाराण्य, अत्रिकाषिक सत्तर, गौतम, औताथ्य, कृत्सस, आंगिराश, 200 विमानों कुरुक्षेत्र चार शांडिल्य, गौभिल, पिप्लाद, अगत्स्य, 132 सिद्धपुर पाटन पर पहुंचने पर औदिच्यों में पुष्कर क्षेत्र (अगत्स्य, महेंद्र) के गांव।। सहस्र औदिच्य ब्राह्मण 1037 परिवारों में से 37 परिवारों ने श्रीमाली ब्राह्मणों के तर्क में सच्चाई समझ कर राजा की योजना में भाग नहीं करने का फैसला किया। वे एक समूह में अलग चला गया। उनका निर्णय मूलराज को सूचित.करने के बाद से वे एक समूह के साथ अलग चले गए, वे टोलाकिया औदिच्य ब्राह्मण के रूप में जाने जाते थे। बाकी औदिच्च्य सहस्र ब्राह्मणों के रूप में जाने जाते हैं। क्योंकि वे 1000 की संख्या में आये थे। अधिक होने से1000 ब्राह्मण परिवारों बोलबाला रहा। राजा मूलराज सोलंकी ने दुसरे पक्ष के ब्राह्मणों को समझाया। यह एक मजबूत राज्य को बनाए रखने और धर्म और सभ्यता के रूप में अच्छी तरह से व्यापार और राष्ट्र की समृद्धि को स्थिर करने के लिए जरूरी था। की उन सबको भी अपना बना कर रखा जाये इसके लिए जरुरी था। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि सोलंकी राज्य के रूप में लगभग तीन सौ वर्षों तक समर्थ और समृद्धि से भरा फला, गुजरात रहा था। बाद में 1297 में भारत पर इस्लामी हमले के कारण नष्ट हुआ था। वैदिक धर्म सबसे पुराना ज्ञात धर्म माना जाता है।। हिंदू धर्म का मानना है कि शाश्वत सत्य एक है। कई मायनों में यह व्याख्या की जा सकती हैं। अति प्राचीन काल से, हम सात ॠषीऔ कीही संतान है। इन ऋषियों का नाम', जमदग्नि, गौतम, अत्री, विश्वामित्र, वशिष्ठ और भारद्वाज और कश्यप है। वे सप्त ऋषि के रूप में जाने जाते हैं। अगत्स्य आठवें ऋषि जिन्होंने वेदों की समझने में योगदान दिया है, के रूप में स्वीकार किये जाते है प्रत्येक ऋषि के सुप्रीम होने के लिए उनके अपने संस्करण है। कालांतर में समय परिवर्तन के साथ साथ वे औदिच्य देश के विभिन्न भागो में वहां के राजे महराजे और अन्य आश्रय में चले गए। कुछ तीर्थ स्थानों पर पोरोहित्य का काम। या खेती किसानी करने लगे हें। गुजरात पर अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण द्वारा रुद्रमहालय और पाटन शहर विनाश होने के बाद विक्रम सम्बत 1353 के आसपास उस क्षेत्र के औदिच्य ब्राह्मण कड़ी चनस्मा, कर्णावती . जैसी जगह चले गए।। वेवाहिक संबंध सहस्र औदीच्य ब्राह्मण समाज में समान्यता परिचित ओर सीमित विवाह संबंध बनते रहे हें। वर्तमान में आवागमन के साधन सशक्त होने से इन सम्बन्धों का विस्तार हो गया हे। फिर भी अधिकतर मामलों में सहस्र औदीच्य ही आपस में पर अलग अलग गोत्रों में संबंध करते हें। ईस्वी सन 1500-1600 के काल में समाज की जन संख्या देड़ लाख 150000 के लगभग हो गई थी। इसी समय गुजरात के छिन्न भिन्न होने से केवल इन सो वर्षों में ही दस से पंद्रह समूह बन गए थे। उनमें आपसी संबद्ध रोटी-बेटी व्यवहार चलता रहा था। इसी काल में [1500-1600 इसवीं सन में] गुजरात में दुर्भिक्ष ओर आततायी आक्रमणों के कारणो से गुजरात छोड़करकई समूहों में अन्य स्थानो जाने लगे थे, एक बड़े समूह में 1200 गाडियाँ उज्जैन आई। यह किवदंती प्रचलित हे, की इन बारह सो के विभाग वाले लोग किसी सेना में जबरन भर्ती किए गए थे, अथवा कोई दासता स्वीकार की थी, ओर किसी युद्ध में भाग लिया था। इसी कारण कट्टर पंथियों ने उनसे दंड प्रायश्चित मांगा, नहीं देने पर सिद्धपुर से घोषणा हुई कि, इनसे संबंध न रखा जाए। चूंकि ये बारह सो की बड़ी संख्या में थे, जो अन्य समूहो से अधिक थी, इसी कारण इनका नाम करण "बड़ी संभा ' या समवाय या "बड़ी औदीच्य" पड़ा ओर अन्य "छोटी संभा" या समवाय या "छोटी औदीच्य" कहलाने लगे। तब से अब तक कुछ कट्टर पंत्ती आपस में विवाह संबंध नहीं करते रहे हें। वर्तमान में पुरानी पीड़ी को छोड़कर नई पीड़ी के लोग इस संभावाद से मुक्त होकर संबंध करने लगें हें। इसके अतिरिक्त वर्तमान में सभी औदीच्य ब्राह्मणो को अर्थात, सहस्र छोटी बड़ी दोनों संभा, टोलकीय, मारू, आदि आदि सभी औदीच्यों को एक किए जाने का प्रयास चल रहा हे। कुछ प्रगति वादियों का मानना यह भी हे की जब हा सब उदीच दिशा के नाम से औदीच्य कहलाए हें तो सभी उत्तर भारतीय औदीच्य हें, उनमें आपस में रोटी बेटी संबंध होना चाहिए। यह देखा भी जा रहा हे। श्रेणी:भारतीय समाज