Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

जैविक खेती

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

जनवरी 2018 right|thumb|150px|आलू की जैविक खेती जैविक खेती (Organic farming) कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है।जैविक खेती (आर्गेनिक फार्मिंग) कैसे करें? पूरी जानकारी दा इंडियन वायर सन् 1990 के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाज़ार काफ़ी बढ़ा है। परिचय संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है, बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology System - प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान के चक्र) प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र (पारिस्थितिकी तंत्र) निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। भारत वर्ष में प्राचीन काल से कृषि के साथ-साथ गौ पालन किया जाता था, जिसके प्रमाण हमारे ग्रंथों में प्रभु कृष्ण और बलराम हैं जिन्हें हम गोपाल एवं हलधर के नाम से संबोधित करते हैं अर्थात कृषि एवं गोपालन संयुक्त रूप से अत्यधिक लाभदायी था, जोकि प्राणी मात्र व वातावरण के लिए अत्यन्त उपयोगी था। परन्तु बदलते परिवेश में गोपालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जिसके फलस्वरूप जैविक और अजैविक पदार्थो के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है और वातावरण प्रदूषित होकर, मानव जाति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। अब हम रसायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों के उपयोग के स्थान पर, जैविक खादों एवं दवाईयों का उपयोग कर, अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं जिससे भूमि, जल एवं वातावरण शुद्ध रहेगा और मनुष्य एवं प्रत्येक जीवधारी स्वस्थ रहेंगे। right|thumb|300px|जैविक कृषि से उत्पादित सब्जियाँ भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरको एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है जिससे सीमान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैं। इसलिए इस प्रकार की उपरोक्त सभी समस्याओं से निपटने के लिये गत वर्षों से निरन्तर टिकाऊ खेती के सिद्धान्त पर खेती करने की सिफारिश की गई, जिसे प्रदेश के कृषि विभाग ने इस विशेष प्रकार की खेती को अपनाने के लिए, बढ़ावा दिया जिसे हम जैविक खेती प्रचार-प्रसार कर रही है। म.प्र. में सर्वप्रथम 2001-02 में जैविक खेती का अन्दोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकास खण्ड के एक गांव में जैविक खेती प्रारम्भ कि गई और इन गांवों को जैविक गांव का नाम दिया गया। इस प्रकार प्रथम वर्ष में कुल 313 ग्रामों में जैविक खेती की शुरूआत हुई। इसके बाद 2002-03 में दि्वतीय वर्ष में प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकासखण्ड के दो-दो गांव, वर्ष 2003-04 में 2-2 गांव अर्थात 1565 ग्रामों में जैविक खेती की गई। वर्ष 2006-07 में पुन: प्रत्येक विकासखण्ड में 5-5 गांव चयन किये गये। इस प्रकार प्रदेश के 3130 ग्रामों जैविक खेती का कार्यक्रम लिया जा रहा है। मई 2002 में राष्ट्रीय स्तर का कृषि विभाग के तत्वाधान में भोपाल में जैविक खेती पर सेमीनार आयोजित किया गया जिसमें राष्ट्रीय विशेषज्ञों एवं जैविक खेती करने वाले अनुभवी कृषकों द्वारा भाग लिया गया जिसमें जैविक खेती अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया गया। प्रदेश के प्रत्येक जिले में जैविक खेती के प्रचार-प्रसार हेतु चलित झांकी, पोस्टर्स, बेनर्स, साहित्य, एकल नाटक, कठपुतली प्रदर्शन जैविक हाट एवं विशेषज्ञों द्वारा जैविक खेती पर उद्बोधन आदि के माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जाकर कृषकों में जन जाग्रति फैलाई जा रही है। जैविक खेती से मानव स्वास्थ्य का बहुत गहरा सम्बन्ध है। इस पद्धति से खेती करने में शरीर तुलनात्मक रूप से अधिक स्वास्थ्य रहता है। औसत आयु भी बढ़ती है। हमारे आने वाली पीढ़ी भी अधिक स्वस्थ्य रहेंगी। कीटनाशक और खाद का प्रयोग खेती में करने से फसल जहरीला होता है। जैविक खेती से फसल स्वास्थ्य और जल्दी खराब नहीं होता है। जैविक खेती वर्तमान समय मे काफी महंगी भी हैं जैविक खेती की तुलना से ज्यादा उत्पादन के लालच मे हम रासायनिक खेती को मह्त्व देते हैं, जैविक खेती के लिए उससे जुड़े सभी वस्तु जैविक होने चाहिए। जैविक खेती से होने वाले लाभ कृषकों की दृष्टि से लाभ भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है। सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है। रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है। फसलों की उत्पादकता में वृद्धि। बाज़ार में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में भी वृद्धि होती है | मिट्टी की दृष्टि से जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है। भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं। भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा। पर्यावरण की दृष्टि से भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है। भूमि के जल मे स्तर मे वृद्धि क्रिया शील होता हैं। मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है। कचरे का उपयोग, खाद बनाने में, होने से बीमारियों में कमी आती है। फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की जैविक क्रिया बड़ गुणवत्ता का खरा उतरना। जैविक खेती, की विधि रासायनिक खेती की विधि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है इसके साथ ही कृषक भाइयों को आय अधिक प्राप्त होती है तथा अंतराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक भाई अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शकि्त का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है। मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, शुद्ध वातावरण रहे एवं पौषि्टक आहार मिलता रहे, इसके लिये हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियाँ को अपनाना होगा जोकि हमारे नैसर्गिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी। उद्देश्य जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य कृषि प्रणाली को अधिक संतुलित, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाना है। इसके तहत निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों को ध्यान में रखा जाता है: मिट्टी की उर्वरता और जैविक संरचना को बनाए रखना और सुधारना। रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद और हरी खाद का उपयोग कर मृदा स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण। जल, वायु और भूमि को प्रदूषण से मुक्त रखना एवं पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता बनाए रखना। स्वस्थ एवं सुरक्षित खाद्य उत्पादन। मानव स्वास्थ्य के लिए रासायन-मुक्त और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना। स्थायी कृषि प्रणाली को बढ़ावा देना। दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ खेती की ऐसी प्रणाली विकसित करना जो आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिक रूप से लाभकारी हो। कृषकों की आत्मनिर्भरता एवं आय में वृद्धि। स्थानीय संसाधनों पर आधारित खेती से लागत को कम करना और जैविक उत्पादों के बाज़ार मूल्य के माध्यम से किसानों की आय में वृद्धि करना। जैव विविधता का संरक्षण। परंपरागत बीजों और स्थानीय प्रजातियों का प्रयोग कर जैव विविधता को बढ़ावा देना। जैविक खेती हेतु प्रमुख जैविक खाद एवं दवाईयाँ right|thumb|300px|भिल्लोटक (Chloroxylon) का उपयोग छत्तीसगढ़ में धान की जैविक खेती में कीट-प्रबन्धन के लिये किया जाता है। जैविक खाद तैयार करने के कृषकों के अन्य अनुभव भभूत अम़तपानी दस्पर्णी अर्क घन जीवामृत जीवामृत सींग खाद अमृत संजीवनी मटका खाद जैविक खेती ह्यूमिक एसिड (चावल से र्निमित) जैविक पद्धति द्वारा व्याधि नियंत्रण के कृषकों के अनुभव नीम-पत्ती का घोल/निबोली/खली गौ मूत्र मट्ठा कच्चा दूध,हल्दी, हींग व एलोवेरा जेल का छिड़काव मिर्च/लहसुन लकड़ी की राख नीम व करंज खली फसलो का अवशेष । मुख्य घटक जैविक खेती के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख घटक होते हैं, जो इस पद्धति को टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाते हैं:https://pib.gov.in/FactsheetDetails.aspx?Id=148597 Factsheet Details: pib.gov.in en 2025-04-18 जैविक खाद: गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, नाडेप कम्पोस्ट, मटका खाद आदि का उपयोग मृदा की उर्वरता बनाए रखने हेतु किया जाता है। जैविक कीटनाशक: नीम तेल, गौमूत्र, लहसुन-मिर्च अर्क, दस्पर्णी अर्क, भभूत अमृतपानी जैसे प्राकृतिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है। फसल चक्र: भूमि की उर्वरता बनाए रखने और कीट-रोग नियंत्रण के लिए फसलों का अनुक्रम बदलते रहना। मिश्रित एवं अंतरवर्ती फसलें: अलग-अलग फसलों को एक साथ उगाकर पोषक तत्वों का संतुलन और भूमि की रक्षा सुनिश्चित की जाती है। जैविक बीज: बिना रसायनिक उपचार वाले देशी और पारंपरिक बीजों का प्रयोग। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: जल, मृदा और जैव विविधता का संरक्षण, और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना। मृदा प्रबंधन: मल्चिंग, जीवामृत, और अन्य जैविक विधियों से मिट्टी की संरचना और जल धारण क्षमता में सुधार करना। पशुपालन और कृषि का एकीकरण: पशुपालन से प्राप्त गोबर, मूत्र आदि को जैविक खेती में उपयोग कर कृषि को आत्मनिर्भर बनाना। भारतीय जैविक कृषि संगठन भारतीय जैविक कृषि संगठन भारत में जैविक खेती कर रहें कृषिको का सबसे बढा समूह है। इन्हें भी देखें प्राकृतिक चिकित्सा जुताई रहित कृषि संरक्षण कृषि सन्दर्भ श्रेणी:कृषि * श्रेणी:संधारणीय प्रौद्योगिकियाँ