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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

विदूषक

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right|thumb|200px|कूडियाट्टम् में विदूषक विदूषक, भारतीय नाटकों में एक हँसाने वाला पात्र होता है जो तरह तरह की नकलें आदि करके, वेश भूषा बनाकर अथवा बातचीत करके दूसरों को हँसाता है। मंच पर उसके आने मात्र से ही माहौल हास्यास्पद बन जाता है। वह स्वयं अपना एवं अपने परिवेश का मजाक उड़ाता है। उसके कथन एक तरफ हास्य को जन्म देते हैं और दूसरी तरफ उनमें कटु सत्य का पुट होता है। प्राचीन काल में राजाओं और बड़े आदमियों के मनोविनोद के लिये उनके दरबार में विडूषक रहा करते थे जो अनेक प्रकार के कौतुक करके, बेवकूफ बनकर अथवा बातें बनाकर लोगों को हँसाया करते थे । प्राचीन नाटकों आदि में भी इन्हें यथेष्ट स्थान मिला है; क्योंकि इनसे सामाजिकों का मनोरंजन होता है। साहित्यदर्पण के अनुसार विदूषक प्रायः अपने कौशल से दो आदमियों में झगड़ा भी कराता है; और अपना पेट भरना या स्वार्थ सिद्ध करना खूब जानता है । यह शृंगार रस में सहायक होता है और मानिनी नायिका को मनाने में बहुत कुशल होता है। कुसुमवसन्ताद्यभिधः कर्मपटुर्वेषभाषाद्यैः। हास्यकरः कलहरतिर्विदूषकः स्यात्कर्मज्ञः॥ -- साहित्यदर्पण संस्कृत नाटकों में विदूषक विश्व रंगमंच में विदूषक की परिकल्पना केवल भारतीय नाटकों में मिलती है। विदूषक सम्माननीय और दयालु व्यक्ति होता है, जो प्रायः नायक का मित्र होता है। वह सामाजिक प्रथाओं पर व्यंग्य करता है। परंपरागत रूप से वह प्राकृत भाषा बोलता है जबकि अन्य पात्र संस्कृत में संवाद करते हैं। संस्कृत नाटकों के पात्र महत्वपूर्ण होते थे और इन्हें मुख्य रूप से तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता था— नायक (नायक या प्रतिनिधि), नायिका और विदूषक (हास्य पात्र)। नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि ने विदूषक के चरित्र एवं रूपरंग पर काफी विचार किया है। अश्वघोष ने अपने संस्कृत नाटकों में विदूषक को स्थान दिया जो प्राकृत बोलते हैं। भास ने तीन अमर विदूषक चरित्रों का सृजन किया - वसन्तक, सन्तुष्ट और मैत्रेय। बाहरी कड़ियाँ संस्कृत नाटकों की विदूषक परम्परा विदूषक की तलाश (हृषीकेश सुलभ) How we lost the Haasa and Parihaasa traditions श्रेणी:रंगमंच