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411 समाचार
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पण्डित टोडरमल

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अंगूठाकार|दाएँ|पण्डित टोडरमल का कल्पित चित्र। पण्डित टोडरमल आचार्यकल्प ऋषिकल्प खण्डेलवाल रंभादेवी खंडेलवाल (माता)जोगीदास खंडेलवाल (पिता) जयपुर भारतीय 1823/24 1776/77 47 वर्ष https://www.ptst.in/ शिवपिंडी फैंकने के झूठे आरोप में प्राप्त दंड हरिचंद्र और गुमानीराम जैन विद्वान् और दार्शनिक नेता दिगंबर जैनधर्म भारतीय पण्डित टोडरमल गम्भीर प्रकृति के आध्यात्मिक महापुरुष थे। वे स्वभाव से सरल, संसार से उदास, धुन के धनी, निरभिमानी, विवेकी, अध्ययनशील, प्रतिभावान, बाह्याडम्बर विरोधी, सिद्धान्तों की कीमत पर कभी न झुकने वाले, आत्मानुभवी, लोकप्रिय प्रवचनकार, सिद्धान्त ग्रन्थों के सफल टीकाकार एवं परोपकारी महामानव थे। पण्डित टोडरमल जी जैन समाज के अग्रणी विद्वानों में से एक थे। अपनी विद्वत्ता और प्रामाणिकता के आधार पर वे तेरापंथियों के गुरु कहलाते थे।https://books.google.co.in/books?id=AL14AAAAMAAJ&q=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&hl=hi&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwj47rKPs7H5AhU-pVYBHRK1AUU4ChDoAXoECAUQAg पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व भारिल्ल डॉ. हुकमचन्द पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर 71 इस प्रकार पण्डित टोडरमल का जीवन आत्मचिंतन और साहित्य साधना के लिये समर्पित जीवन है। केवल अपने कठिन परिश्रम एवं प्रतिभा के बल पर ही उन्होंने प्रगाध विद्वत्ता प्राप्त की व उसे बाॅंटा भी दिल खोलकर, अतः तत्कालीन धार्मिक समाज में उनकी विद्वत्ता व कर्त्तृत्व की धाक थी।https://books.google.co.in/books?id=AL14AAAAMAAJ&q=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&hl=hi&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwj47rKPs7H5AhU-pVYBHRK1AUU4ChDoAXoECAUQAg पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व भारिल्ल डॉ. हुकमचन्द पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर 75 जगत के सभी भौतिक द्वन्द्वों से दूर रहने वाले एवं निरन्तर आत्मसाधना व साहित्यसाधना रत इस महामानव को जीवन की मध्यवय में ही साम्प्रदायिक विद्वेष का शिकार होकर जीवन से हाथ धोना पड़ा।https://books.google.co.in/books?id=AL14AAAAMAAJ&q=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&hl=hi&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwj47rKPs7H5AhU-pVYBHRK1AUU4ChDoAXoECAUQAg पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व भारिल्ल डॉ. हुकमचन्द पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर 75 निजी जीवन पण्डित टोडरमलजी के पिता का नाम जोगीदास खंडेलवाल और माता का नाम रंभादेवी था। उन की जाति खण्डेलवाल थी और गोत्र गोदिका था, जिसे आज भौंसा या बड़जात्या भी कहते है।https://books.google.co.in/books?id=vdJRPqnANFQC&newbks=0&lpg=PA85&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4%20%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2%20%E0%A4%9C%E0%A5%80&hl=hi&pg=PA85&output=embed अध्यात्म पदावली जैन डॉ. राजकुमार भारतीय ज्ञानपीठ 81 - 263 - 1172 - X दिल्ली वे विवाहित थे, उन की पत्नी का नाम प्राप्त नहीं है। उन के दो पुत्र थे - हरिश्चन्द्र और गुमानीराम। गुमानीराम महान् प्रतिभाशाली और उन के समान ही क्रान्तिकारी महापुरुष थे।पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व भारिल्ल डॉ. हुकमचन्द पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर 57 यद्यपि पण्डित जी का अधिकांश जीवन जयपुर में ही बीता। किन्तु उन्हें अपनी आजीविका के लिए कुछ समय १५० कि.मी. दूर सिंघाणा अवश्य रहना पड़ा था। वे वहां दिल्ली के एक साहूकार के यहां कार्य करते थे।https://books.google.co.in/books?id=AL14AAAAMAAJ&q=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%A4+%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%B2&hl=hi&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwj47rKPs7H5AhU-pVYBHRK1AUU4ChDoAXoECAUQAg पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व भारिल्ल डॉ. हुकमचन्द पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर आयु परम्परागत मान्यतानुसार उन की आयु यद्यपि सत्ताईस (२७) वर्ष मानी जाती है। किन्तु डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल ने अपने शोधग्रंथ (पी.एच.डी.) "पण्डित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व" में सिद्ध किया की 'उन की साहित्यसाधना, ज्ञान व नवीनतम प्राप्त उल्लेखों व प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित हो चुका है कि वे ४७ वर्ष तक जीवित रहे। उन की मृत्यु वि. सं. १८२३/२४ लगभग निश्चित है, अतः उन का जन्म वि. सं. १७७६/७७ में होना चाहिये।' शिक्षा और शिक्षा गुरु पण्डित जी के समय में धार्मिक अध्ययन के लिए आज के समान सुव्यवस्थित विद्यालय, महाविद्यालय नहीं चलते थे। लोग स्वयं ही 'सैलियों' के माध्यम से तत्त्वज्ञान प्राप्त करते थे। तत्कालीन समाज में जो आध्यात्मिक चर्चा करने वाली दैनिक गोष्ठियाँ होती थीं, उन्हें 'सैली' कहा जाता था। ये सैलियाँ सम्पूर्ण भारतवर्ष में यत्रतत्र थीं। इसी सैली के माध्यम से पंडित टोडरमल जी ने जैन तत्त्वज्ञान प्राप्त किया और आगे जा कर इस सैली का सफल संचालन भी किया। उन के पूर्व इस सैली के संचालक बाबा बंशीधरजी थे। वे उस समय लोगों को व्याकरण, छंद, अलंकार आदि का ज्ञान भी कराते थे। इस से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन के शिक्षागुरु बाबा बंशीधरजी थे।https://books.google.co.in/books?id=d6PRAAAAMAAJ&q=%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97+%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%95&dq=%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97+%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%95&hl=hi&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiWibHjv7H5AhWwmVYBHX-1CEY4HhDoAXoECAYQAg मोक्षमार्ग प्रकाशक आचार्यकल्प पंडित टोडरमल पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर 15 वे इतने प्रतिभासंपन्न थे कि उन्होंने बिना गुरु के स्वयं ही परिश्रम कर ब्रज, प्राकृत, हिंदी, संस्कृत, कन्नड़, उर्दू आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वे स्वयं मोक्षमार्ग प्रकाशक में अपने अध्ययन के बारे में लिखते हैं - "हमारे पूर्व संस्कार तें वा भला होनहार तें जैन शास्त्रनि विषै अभ्यास करने का उद्यम होत भया । तातैं व्याकरण, न्याय, गणित, आदि उपयोगी ग्रन्थनि का किंचित् अभ्यास करि टीका सहित समयसार, पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, नियमसार, गोम्मटसार, लब्धिसार, त्रिलोकसार, तत्त्वार्थसूत्र इत्यादि शास्त्र; अरु क्षपणासार, पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय, अष्टपाहुड़, आत्मानुशासन आदि शास्त्र; अरु श्रावक मुनि के आचार निरूपक अनेक शास्त्र; अरु सुष्ठु कथा सहित पुराणादि शास्त्र इत्यादि अनेक शास्त्र हैं। तिनि विषे हमारे बुद्धि अनुसार अभ्यास वर्ते है।" भाषा शैली पण्डित टोडरमल ने अपने जीवन में छोटी बड़ी बारह रचनाएँ लिखी, जिन का परिमाण लगभग एक लाख श्लोक प्रमाण और पाँच हजार पृष्ठ के करीब है। इन में कुछ तो लोकप्रिय ग्रंथों की विशाल प्रामाणिक टीकाएँ हैं और कुछ स्वतन्त्र रचनाएँ हैं। वे गद्य और पद्य दोनों रूपों में पाई जाती हैं। उन की गद्य शैली परिमार्जित, प्रौढ़ एवं सहज बोधगम्य हैं। उन की शैली का सुन्दरतम रूप उन के मौलिक ग्रंथ 'मोक्षमार्गप्रकाशक' में देखने को मिलता है। उन की भाषा मूलरूप में ब्रज होते हुवे भी उस में खड़ी बोली का खड़ापन भी है और साथ ही स्थानीय रंगत भी उन की भाषा उन के भावों को वहन करने में पूर्ण समर्थ व परिमार्जित है। रचनाएँ रचनाओं का विस्तृत विवरण इसप्रकार है - 1. रहस्यपूर्ण चिट्ठी प्राचीन समय में एक स्थान से दूसरे स्थान तक संदेश को पहुॅंचाने के लिए चिट्ठियों का प्रयोग होता था। मुल्तान निवासी किसी साधर्मी भाई के शंका का समाधान इस चिट्ठी में प्राप्त है। यह चिट्ठी वि. सं. 1811 में लिखी गई। 2. गोम्मटसार जीवकाण्ड भाषाटीका गोम्मटसार जीवकाण्ड जैन दर्शन के आचार्य नेमीचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती के द्वारा लिखा गया ग्रंथ है, उस की हिन्दी भाषा में टीका स्वरूप यह रचना है। 3. गोम्मटसार कर्मकाण्ड भाषाटीका यह रचना गोम्मटसार कर्मकाण्ड की हिन्दी भाषा में व्याख्या है। 4. अर्थसंदृष्टि अधिकार गोम्मटसार जीवकाण्ड, कर्मकाण्ड के अन्त में इन्हीं के परिशिष्ट रूप में अर्थसंदृष्टि महाधिकार है; जिस में रेखाचित्रों (चार्टी) के द्वारा गोम्मटसार जीवकाण्ड और गोम्मटसार कर्मकाण्ड में आए गूढ़ विषयों को स्पष्ट किया गया है । 5. लब्धिसार भाषाटीका यह रचना आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्ती द्वारा लिखित लब्धिसार की हिन्दी भाषा में व्याख्या है। 6. क्षपणासार भाषाटीका यह कृति आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्ती द्वारा लिखित क्षपणासार ग्रंथ की हिन्दी भाषा में व्याख्या है। 7. गोम्मटसार पूजा 'गोम्मटसार पूजा' पं. टोडरमल की एक मात्र प्राप्त पद्यकृति है। इस में उन्होंने गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड, लब्धिसार और क्षपणासार नामक सिद्धान्त ग्रंथों के प्रति अपनी भक्ति भावना व्यक्त की है। यह ५७ छन्दों की छोटी सी कृति है, जिस में ४५ छन्द संस्कृत भाषा में एवं १२ छन्द हिन्दी भाषा में हैं। 8. त्रिलोकसार भाषाटीका यह कृति आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्ती द्वारा लिखित त्रिलोकसार ग्रंथ की हिन्दी भाषा में व्याख्या है।   9. समोसरण रचना वर्णन जैन तीर्थंकरों की धर्मसभा को समवशरण कहते है, उस की रचना किस प्रकार से होती है और उस का विषेश वर्णन इस कृति में उपलब्ध है। 10. मोक्षमार्गप्रकाशक [अपूर्ण] पंडित टोडरमल की अगाध विद्वत्ता का प्रतीक यह ग्रंथ है, यह रचना अपूर्ण होते हुवे भी उन की कीर्ति का भंडार है। तत्कालीन समाज में फैले रूढ़िवाद, कुरीतियों की आलोचना इस रचना में है। 11. आत्मानुशासन भाषाटीका संस्कृत में आचार्य गुणभद्रजी द्वारा नीतिग्रंथ आत्मानुशासन की व्याख्या के  रूप में यह रचना है। यह रचना वि. सं. 1823 में पूर्ण हुवी। 12. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय भाषाटीका [अपूर्ण] यह रचना आचार्य अमृतचंद्रदेव द्वारा रचित जैन आचार प्ररूपक संस्कृत ग्रंथ पुरुषार्थसिद्ध्युपाय की हिन्दी में व्याख्या है। यह रचना अपूर्ण है। हिन्दी साहित्य में योगदान हिन्दी साहित्य के इतिहास में अधिकतर जैन साहित्य को धार्मिक साहित्य कहकर हिन्दी साहित्य में उन के अवदान पर उचित मूल्य में प्रकाश नहीं डाला जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी व्यस्थित गद्य का विकास भारतेन्दु युग से माना है, परन्तु पण्डित टोडरमल ने १७वी शताब्दी में ही व्यवस्थित हिन्दी गद्य का प्रारंभ कर दिया था। उन के द्वारा रचित हिन्दी साहित्य किसी भी साहित्यकार की तुलना में श्रेष्ठ ही होगा। पण्डित टोडरमल जी से पूर्व हिन्दी साहित्य था तो, परन्तु वह पद्य में था, गद्य का प्रयोग मात्र पत्र भेजने आदि कार्यों में ही होता था। यद्यपि पण्डित जी से पूर्व ही हिन्दी साहित्य में भी गद्य आ चुका था किंतु वह व्यवस्थित नहीं, कहीं तो वाक्य रचना में अशुद्धि है, कहीं व्याकरण अशुद्धि है, कहीं सन्धि समास में अशुद्धि है तो कहीं पद्य जैसा ही गद्य लिख दिया, परन्तु व्यवस्थित गद्य की कमी थी, जिसे पण्डित टोडरमल जी दूर किया और वे पहले ऐसे हिन्दी गद्यकार थे, जिन्होंने पूर्णतः सन्धि, समास, वाक्य रचना आदि की शुद्धता रखी। मृत्यु दण्ड पण्डित टोडरमल की तार्किक शैली से प्रस्तुत धर्म, आप्त (भगवान), गुरु व तत्त्वों का विरोध कोई नहीं कर सकता था, परन्तु वास्तविक ज्ञान से रहित जीवों को उन की बात समझ नहीं आयी, अतः विरोधी मतों ने उन के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर शिव पिंडी फैंकने के झुठे आरोप में उन्हें राजा माधवसिंह के द्वारा उन्हें हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया, हाथी भी पंडित टोडरमल पर पैर नहीं रख रहा था। हाथी के पैर न रखने से उसे भालों से मारा जाने लगा, अंततः पण्डित के आदेश पर हाथी ने पैर रख दिया और वे मृत्यु को प्राप्त हुवे। हाथी से मृत्युदण्ड देना मात्र किंवदंती ही है, वास्तविक नहीं इस बात का कहीं पर उल्लेख भी नहीं है। बुद्धिविलास के रचनाकार बखतराम जी शाह के अनुसार पण्डित टोडरमलजी को मृत्युदण्ड तो मिला परन्तु हाथी के पैर की नीचे कुचलवा कर नहीं अपितु उन्हें मारकर कीचड़ में फिंकवा दिया, जिस से उन का शरीर भी जैनों के हाथों न लगे, अन्यथा जैन समाज द्वारा राजविरोध या बड़ा उपद्रव किया जा सकता था। इन्हें भी देखें मोक्षमार्गप्रकाशक गोम्मटसार कानजी स्वामी पंडित जयचन्दजी छाबड़ा पंडित सदासुखदास जी पण्डित फूलचंद जी डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल श्रेणी:जैन विद्वान श्रेणी:हिन्दी गद्यकार श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार श्रेणी:लेखक बारह कड़ियाँ 1. मोक्षमार्ग प्रकाशक [लेखक - पंडित टोडरमल] 2.पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व [लेखक - डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल एवं संपादक - पण्डित नाथूलाल प्रेमी] 3.हिंदी साहित्य के उन्नायक साहित्यकार : पंडित टोडरमल [संपादक - डॉ. सचिन्द्र शास्त्री, तीर्थधाम मंगलायतन एवं पंडित विक्रान्त पाटनी, झालरापाटन] 4.https://web.archive.org/web/20220806061550/https://www.vitragvani.com/uploads/pdfs/E/Shree%20Todarmal%20Jayanti%20Smarika_H.pdf 6 अगस्त 2022 आत्मधर्म पत्रिका विशेषांक (श्री टोडरमल जयन्ती स्मारिका 1967) [संपादक : पंडित चैनसुखदासजी न्यायतीर्थ, पंडित भंवरलालजी न्यायतीर्थ, डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल, पंडित रामजी माणिकचन्दजी दोशी, पंडित नेमिचन्द पाटनी] 5.वीरवाणी पत्रिका (श्री पंडित टोडरमलांक 1948) [संपादक - पंडित चैनसुखदासजी न्यायतीर्थ] 6. सन्मति सन्देश मासिक पत्रिका (श्री पंडित टोडरमल विशेषांक मई 1965 एवं मार्च 1972) [संपादक - पंडित प्रकाशचन्द हितैषी शास्त्री, दिल्ली] सन्दर्भ