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मध्यकालीन भारत
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मध्यकालीन भारत या मध्ययुगीन भारत प्राचीन भारत और आधुनिक भारत के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की अवधि को दर्शाता है। भारतीय इतिहास में मुख्य मध्यकालीन कालखंड ल. 1206 से 1750 इस्वी तक का हैं।Stein Burton Burton Stein Arnold D. 27 April 2010 A History of India 2nd Wiley-Blackwell Oxford 978-1-4051-9509-6 105 https://books.google.com/books?id=QY4zdTDwMAQC&pg=PA105Singh Upinder A History of Ancient and Early Medieval India: From the Stone Age to the 12th Century 2008 Pearson Education India 978-81-317-1120-0
thumb|मेहरानगढ़ किला 1459 इस्वी, मध्यकालीन वास्तुकला का उदाहरण। राव जोधा द्वारा जोधपुर में बनवाया गया था।
मध्यकालीन भारतीय इतिहास का कालविभाजन
मध्यकालीन भारत अवधि की परिभाषाओं में व्यापक रूप से भिन्नता है और आंशिक रूप से इस कारण से कई इतिहासकार अब इस शब्द को प्रयोग करने से बचते है।Keay, 155 "... the history of what used to be called 'medieval' India ..."; Harle, 9 "I have eschewed the term 'medieval', meaningless in the Indian context, for the years from c. 950 to c. 1300 ..."
अधिकतर प्रयोग होने वाली पहली परिभाषा में मध्यकालीन युग को छठी शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक माना जाता है। दूसरी परिभाषा में मध्यकालीन युग को 13वी शताब्दी से मध्य 18वी शताब्दी तक माना जाता है और अधिकतम इतिहासकार इस पर सहमत है, वे इसमें अपने कुछ परिवर्तन कर नये कालविभाजन तर्क भी देते हैं।Ahmed, xviii
मध्यकालीन भारतीय इतिहास को दो काल खंडों में विभाजित किया जा सकता है-
प्रारंभिक मध्यकाल (ल. 650 से 1200 इस्वी)
गत मध्यकाल या मध्यकाल (ल. 1200 से 1750 इस्वी)
प्रारंभिक मध्यकाल (ल. 650 से 1200 इस्वी)
मध्यकाल के प्रारम्भ को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद जहाँ कुछ इतिहासकार इसे गुप्त राजवंश के पतन के बाद ५-छटी शताब्दी के बाद से शुरू हुआ मानते है जबकि कुछ इसे ७-८वीं शताब्दी से शुरू हुआ मानते है। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद और दिल्ली सल्तनत के शुरू होने के बीच भारतवर्ष कई छोटे राज्य में बटा हुआ था। हलांकि कई साम्राज्यों ने इसे पुनर्गठित करने की कोशिश की लेकिन ज्यादा समय के लिये नहीं कर सके। इस दौर में सबसे महत्वपूर्ण गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट साम्राज्य के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष और भारत पर मुस्लिम आक्रमण का शुरूआत रहा।
उस दौर के कुछ राजवंश जिन्होनें शासन किया।
thumb|त्रिपक्षीय संघर्ष
प्रारंभिक मध्यकालीन भारत के प्रमुख राजवंश इस प्रकार हैं-
राष्ट्रकूट राजवंश – यह कन्नड़ शाही राजवंश 6वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से पर शासन करता था इसी दौर में एलोरा, महाराष्ट्र का निर्माण किया गया।
गुर्जर-प्रतिहार राजवंश – गुर्जर-प्रतिहार राजवंश भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन एवं मध्यकालीन दौर के संक्रमण काल में साम्राज्य स्थापित करने वाला एक राजवंश था जिसके शासकों ने मध्य-उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर मध्य-८वीं सदी से ११वीं सदी के बीच शासन किया।
पूर्वी चालुक्य – 7वीं से 12वीं शताब्दी तक, एक दक्षिण भारतीय तेलगू राजवंश जिसका राज्य वर्तमान में आंध्र प्रदेश में स्थित था।
पल्लव राजवंश – कांचीपुरम में केन्द्रित, 6वीं से 9वीं शताब्दियों तक तेलुगू और कुछ तमिल क्षेत्रों के महत्वपूर्ण शासक रहे।
पाल राजवंश – बंगाल में 8वीं से 12वीं शताब्दी तक के अंतिम प्रमुख बौद्ध शासक थे। 9वीं सदी में अधिकांश उत्तर भारत में इनका नियंत्रण था।
चोल राजवंश – 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच एक दक्षिण भारतीय साम्राज्य जो तमिलनाडु से शासन करता था, अपनी स्वर्णकाल पर इसने अपने शासन को दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्रों तक विस्तारित किया था।
पश्चिमी चालुक्य – प्रतीच्य चालुक्य पश्चिमी भारत का राजवंश था जिसने २१६ वर्ष राज किया।
कलचुरि राजवंश – कलचुरि प्राचीन भारत का विख्यात था। इस वंश की शुरुआत राजा ईश्वरसेन उर्फ महाक्षत्रप ईश्वरदत्त ने की थी।'कलचुरी ' नाम से भारत में दो राजवंश थे- एक मध्य एवं पश्चिमी भारत में जिसे 'चेदी' 'हैहय' या 'उत्तरी कलचुरि' कहते हैं तथा दूसरा 'दक्षिणी कलचुरी' जिसने वर्तमान कर्नाटक के क्षेत्रों पर राज्य किया।
पश्चिम गंग वंश – पश्चिम गंग वंश प्राचीन कर्नाटक का एक राजवंश था। ये पूर्वी गंग वंश से अलग थे। पूर्वी गंग जिन्होंने बाद के वर्षों में ओडिशा पर राज्य किया। आम धारण के अनुसार पश्चिम गंग वंश ने शसन तब संभाला जब पल्लव वंश के पतन उपरांत बहुत से स्वतंत्र शासक उठ खड़े हुए थे। इसका एक कारण समुद्रगुप्त से युद्ध भी रहे थे। इस वंश ने ३५० ई से ५५० ई तक सार्वभौम राज किया था। इनकी राजधानी पहले कोलार रही जो समय के साथ बदल कर आधुनिक युग के मैसूर जिला में कावेरी नदी के तट पर तालकाड स्थानांतरित हो गयी थी।
पूर्वी गंगवंश – पूर्वी गंगवंश भारतीय उपमहाद्वीप का एक हिन्दू राजवंश था। उन्होने कलिंग को राजधानी बनाया। उनके राज्य के अन्तर्गत वर्तमान समय का सम्पूर्ण उड़ीसा तो था ही, इसके साथ ही पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के भी कुछ भाग थे।इनका शासन ११वीं शताब्दी से १५वीं शताब्दी तक रहा। उनकी राजधानी का नाम 'कलिंगनगर' था जो वर्तमान समय में आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिला का श्रीमुखलिंगम है। पहले यह उड़ीसा के गंजम जिले में था। पूर्वी गंगवंश के शासक कोणार्क के सूर्य मन्दिर के निर्माण के लिये प्रसिद्ध हैं।
होयसल राजवंश – होयसल प्राचीन दक्षिण भारत का एक राजवंश था। इसने दसवीं से चौदहवीं शताब्दी तक राज किया। होयसल शासक पश्चिमी घाट के पर्वतीय क्षेत्र वाशिन्दे थे पर उस समय आस पास चल रहे आंतरिक संघर्ष का फायदा उठाकर उन्होने वर्तमान कर्नाटक के लगभग सम्पूर्ण भाग तथा तमिलनाडु के कावेरी नदी की उपजाऊ घाटी वाले हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया। इन्होंने ३१७ वर्ष राज किया। इनकी राजधानी पहले बेलूर थी पर बाद में स्थानांतरित होकर हालेबिदु हो गई।
काकतीय वंश – ११९० ई. के बाद जब कल्याण के चालुक्यों का साम्राज्य टूटकर बिखर गया तब उसके एक भाग के स्वामी वारंगल के काकतीय हुए; दूसरे के द्वारसमुद्र के होएसल और तीसरे के देवगिरि के यादव। स्वाभाविक ही यह भूमि काकतीयों के अन्य शक्तियों से संघर्ष का कारण बन गई। काकतीयों की शक्ति प्रोलराज द्वितीय के समय विशेष बढ़ी। उसके पौत्र गणपति ने दक्षिण में कांची तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गणपति की कन्या रुद्रंमा इतिहास में प्रसिद्ध हो गई है। उसकी शासननीति के प्रभाव से काकतीय साम्राज्य की समुन्नति हुई। वेनिस के यात्री मार्को पोलो ने रुद्रंमा की बड़ी सराहना की है।
सेन राजवंश – सेन राजवंश भारत का एक राजवंश का नाम था, जिसने १२वीं शताब्दी के मध्य से बंगाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। सेन राजवंश ने बंगाल पर १६० वर्ष राज किया। अपने चरमोत्कर्ष के समय भारतीय महाद्वीप का पूर्वोत्तर क्षेत्र इस साम्राज्य के अन्तर्गत आता था। इस वंश का मूलस्थान कर्णाटक था। इस काल में कई मन्दिर बने। धारणा है कि बल्लाल सेन ने ढाकेश्वरी मन्दिर बनवाया। कवि जयदेव लक्ष्मण सेन के पञ्चरत्न थे।
परमार राजवंश – परमार या पँवार मध्यकालीन भारत का एक क्षत्रिय राजवंश था। इस राजवंश का अधिकार धार-मालवा-उज्जयिनी-आबू पर्वत और सिन्धु के निकट अमरकोट आदि राज्यों तक था। लगभग सम्पूर्ण पश्चमी भारत क्षेत्र में परमार वंश का साम्राज्य था। ये ८वीं शताब्दी से १४वीं शताब्दी तक शासन करते रहे। मूल शब्द प्रमार के क्षेत्र के अनुसार अलग अलग अपभ्रंश है जैसे पोवार, भोयर पवार,पंवार, पँवार, पवार और परमार।
कर्नाट वंश – कर्नाट वंश या सिमराँव वंश या देव राजवंश का उदय 1097 ई. में मिथिला में हुआ। यह एक क्षत्रिय राजपूत वंश था जिसकी राजधानी बारा जिले के सिम्रौनगढ़ में थी। कर्नाट वंश का संस्थापक नान्यदेव था। नान्यदेव एक महान शासक था। उनका पुत्र गंगदेव एक योग्य शासक बना। कर्नाट वंश क्रतु श्रृषी को अपना आदि पुरूष मानता है। कर्नाट वंश के शासनकाल को 'मिथिला का स्वर्णयुग' भी कहा जाता है।
गत मध्यकाल या मध्यकाल (ल. 1200 से 1750 इस्वी)
मुसलमानों के आक्रमण का राजपूतों द्वारा प्रतिरोध
पश्चिम से मुस्लिम आक्रमणों में तेजी
फ़ारस पर अरबी तथा तुर्कों के विजय के बाद ११वीं सदी में इन शासकों का ध्यान भारत की ओर गया। इसके पहले छिटपुट रूप से कुछ मुस्लिम शासक उत्तर भारत के कुछ इलाकों को जीत या राज कर चुके थे पर इनका प्रभुत्व तथा शासनकाल अधिक नहीं रहा था। हालाँकि अरब सागर के मार्ग से अरब के लोग दक्षिण भारत के कई इलाकों खासकर केरल से अपना व्यापार संबंध इससे कई सदी पहले से बनाए हुए थे, पर इससे भी इन दोनों प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान बहुत कम ही हुआ था।
दिल्ली सल्तनत
दिल्ली सल्तनत
१२वीं सदी के अंत तक भारत पर तुर्क, अफ़गान तथा फ़ारसी आक्रमण बहुत तेज हो गए थे। मुहम्मद गौरी के बारंबार आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत को हिला कर रख दिया।तराईन का प्रथम युद्ध 1191 में मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच ।११९२ इस्वी में तराईन के युद्ध में दिल्ली के चौहान वंश के शासक पृथ्वीराज चौहान पराजित हुए और इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर पश्चिमी आक्रांताओं का कब्जा हो गया। हालाँकि मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज को हराकर वापस लौट गया पर उसके ग़ुलामों (दास) ने दिल्ली की सत्ता पर राज किया और आगे यही दिल्ली सल्तनत की नींव साबित हुई। मुहम्मद गौरी की मृत्यु मार्च 1206 में हुईं
🌸मुहम्मद गौरी ने देवीलक्ष्मीनुमा आकृति के सिक्के चलाए थे।
दिल्ली की सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया-
ग़ुलाम वंश
ख़िलजी वंश
तुग़लक़ वंश
सैयद वंश
लोदी वंश
विजयनगर साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की थी। यह 14वीं सदी में अपने चरम पर पहुँच गया था जब कृष्णा नदी के दक्षिण का सम्पूर्ण भूभाग इस साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था। यह उस समय भारत का एकमात्र हिन्दू राज्य था। हालाँकि अलाउद्दीन खिल्जी द्वारा कैद किये जाने के बाद हरिहर तथा बुक्का ने इस्लाम कबूल कर लिया था जिसके बाद उन्हें दक्षिण विजय के लिए भेजा गया था। पर इस अभियान में सफलता न मिल पाने के कारण उन्होंने विद्यारण्य नामक संत के प्रभाव में उन्होंने वापस हिन्दू धर्म अपना लिया था। उस समय विजयनगर के शत्रुओं में बहमनी, अहमदनगर, होयसल बीजापुर तथा गोलकुंडा के राज्य थे।
thumb|विजयनगर साम्राज्य के प्रथम राजवंश का क्षेत्रीय विस्तार
विजयनगर साम्राज्य पर चार राजवंशों ने शासन किया-
संगम राजवंश
सुलुव राजवंश
तुलुव राजवंश
अराविदु राजवंश
मुग़ल आक्रमण और अन्य साम्राज्यों का उदय (ल. 1504–1556 इस्वी)
प्रारंभिक मुगल आक्रमण
अफगानिस्तान में मुगल आक्रमणों की शुरुआत 1504 मे मुगल वंश के संस्थापक बाबर नामक चगताई तुर्की सरदार के साथ हुई।
1519 में, काबुल के राजा बाबर ने पहली बार भारत पर आक्रमण किया और पंजाब पर हमला किया। उसने सबसे पहले बाजौर पर कब्ज़ा किया और उसी वर्ष उसने भेरा पर भी कब्ज़ा कर लिया।
सूर साम्राज्य
सूरी साम्राज्य शेर शाह सूरी
सूरी साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में स्थित पश्तून नस्ल के शेर शाह सूरी द्वारा स्थापित एक साम्राज्य था जो सन् १५४० से लेकर १५५७ तक चला। इस दौरान सूरी परिवार ने बाबर द्वारा स्थापित मुग़ल सल्तनत को भारत से बेदख़ल कर दिया और ईरान में शरण मांगने पर मजबूर कर दिया।
हेमचंद्र विक्रमादित्य साम्राज्य
हेमचन्द्र विक्रमादित्य
हेमू / हेमचन्द्र / हेमू विक्रमादित्य अथवा हेमचंद्र विक्रमादित्य हिन्दू कमाण्डर व सम्राट थे। हेमू हरियाणा में रेवाड़ी के रहने वाले थे। हेमू को मध्ययुगीन भारत में विरोधी मुस्लिम शासकों के बीच थोड़े समय के लिए ही एक 'हिंदू राज' स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने अपने पूरे करियर में कुल 22 लड़ाइयाँ जीतीं, इसकी वजह से ही उन्हें कुछ इतिहासकारों ने मध्य युग के समुद्र गुप्त का ख़िताब दिया। हेमू को मध्ययुग का नेपोलियन भी कहा गया है।
वो एक अच्छे योद्धा के साथ-साथ कुशल प्रशासक भी थे। उनके युद्ध कौशल का लोहा उनके साथियों के साथ-साथ उनके दुश्मनों ने भी माना।
मशहूर इतिहासकार आर.पी त्रिपाठी अपनी किताब 'राइज़ एंड फॉल ऑफ़ मुग़ल एम्पायर' में लिखते हैं, अकबर के हाथ हेमू की हार दुर्भाग्यपूर्णथी, अगर भाग्य ने उनका साथ दिया होता तो उन्हें ये हार नसीब नहीं हुई होती।
एक और इतिहासकार आरसी मजूमदार शेरशाह पर लिखी पुस्तक के एक अध्याय 'हेमू- अ फॉरगॉटेन हीरो' में लिखते हैं, पानीपथ की लड़ाई में एक दुर्घटना की वजह से हेमू की जीत हार में बदल गई, वर्ना उन्होंने दिल्ली में मुग़लों की जगह हिंदू राजवंश की नींव रखी होती।
मुग़ल साम्राज्य
मुग़ल साम्राज्य
पंद्रहवीं सदी के शुरुआत में मध्य एशिया में फ़रगना के निर्वासित राजकुमार जाहिरुद्दीन (बाबर) काबुल में आ बसे। वहा वे फारसी साम्राज्य का काबुल प्रान्त का अधिपति नियुक्त थे। दिल्ली के निर्बल शासक और दौलत खान (पंजाब का अधिपति) के बुलावे में बाबर ने दिल्ली की ओर कुच किया जहाँ उसका इब्राहीम लोदी के साथ युद्ध हुआ। जिसमें लोदी की हार हुई और इसके साथ ही भारत में मुगल वंश की नींव पड़ गई जिसने अगले 300 वर्षों तक एकछत्र राज्य किया। दिल्ली में स्थापित होने के बाद बाबर को राजपूत विद्रोह का सामना करना पड़ा। राजपूत शासक राणा सांगा के साथ खानवा का युद्ध हुआ जिसमें बाबर फिर विजयी हुआ। बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हूमाय़ूं शासक बना। उसे दक्षिण बिहार के सरगना शेरशाह सूरी ने हराकर सत्ताच्युत कर दिया, लेकिन शेरशाह की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली की सत्ता पर वापस अधिकार कर लिया।
हुमायुँ का पुत्र अकबर एक महान शासक साबित हुआ और उसने साम्राज्य विस्तार के अतिरिक्त धार्मिक सहिष्णुता तथा उदार राजनीति का परिचय दिया। वह एक लोकप्रिय शासक भी था। उसके बाद जहाँगीर तथा शाहजहाँ सम्राट बने। शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण करवाया जो आज भी मध्यकालीन दुनिया के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। इसके बाद औरंगजेब आया। उसके शासनकाल में कई धार्मिक व सैनिक विद्रोह हुए। हालाँकि वो सभी विद्रोहों पर काबू पाने में विफल रहा पर सन् १७०७ में उसकी मृत्यु का साथ ही साम्राज्य का विघटन आरंभ हो गया था। एक तरफ मराठा तो दूसरी तरफ अंग्रेजों के आक्रमण ने दिल्ली के बादशाह को नाममात्र का ही बादशाह बनाकर छोडा।
मराठा साम्राज्य
मराठा साम्राज्य
जिस समय बहमनी सल्तनत का पतन हो रहा था उस समय मुगल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था - विशाल साम्राज्य, बगावतों से दूर और विलासिता में डूबा हुआ। उस समय शाहजहाँ का शासन था और शहज़ादा औरंगजेब उसका दक्कन का सूबेदार था। बहमनी के सबसे शक्तिशाली परवर्ती राज्यों में बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्य थे। बीजापुर के कई सूबेदारों में से एक थे शाहजी। शाहजी एक मराठा थे और पुणे और उसके दक्षिण के इलाकों के सूबेदार। शाहजी की दूसरी पत्नी जीजाबाई से उनके पुत्र थे शिवाजी। शिवाजी बाल्यकाल से ही पिता की उपेक्षा के शिकार थे क्योंकि शाहजी अपनी पहली पत्नी पर अधिक आसक्त थे। शिवाजी ने बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह को खबर भिजवाई कि अगर वे उन्हें वहां का किला दे देंगे तो शिवाजी उन्हें तत्कालीन किलेदार के मुकाबिले अधिक पैसे देंगे। सुल्तान ने अपने दरबारियों की सलाह पर - जिन्हें शिवाजी ने पहले ही घूस देकर अपने पक्ष में कर लिया था - किला शिवाजी को दे दिया। इसके बाद शिवाजी ने एक के बाद एक कई किलों पर अधिकार कर लिया। बीजापुर के सुल्तान को शिवाजी की बढ़ती प्रभुता देखकर गुस्सा आया और उन्होंने शाहजी को अपने पुत्र को नियंत्रण पर रखने को कहा। शाहजी की बात पर शिवाजी ने कोई ध्यान नहीं दिया और मावलों की सहायता से अपने अधिकार क्षेत्र में बढ़ोतरी करते गए। आदिल शाह ने अफ़ज़ल खाँ को शिवाजी को ग़िरफ़्तार करने के लिए भेजा। शिवाजी ने अफ़ज़ल की समझते हुए उसकी सेना का वध कर दिया। इस के बाद शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार कर लिया गया। शिवाजी ने अपने पिता को छुड़ा लिया और समझौते के मुताबिक बीजापुर के खिलाफ़ आक्रमण बन्द कर दिया।
thumb|360px|right| सन् 1760 का भारत
आदिलशाह की मृत्यु के बाद बीजापुर में अराजकता छा गई और स्थिति को देखकर औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया। शिवाजी ने तो उस समय तक औरंगजेब के साथ संधि वार्ता जारी रखी थी पर इस मौके पर उन्होंने कुछ मुगल किलों पर आक्रमण किया और उन्हें लूट लिया। औरंगजेब इसी बीच शाहजहाँ की बीमारी के बारे में पता चलने के कारण आगरा चला गया और वहाँ वो शाहजहाँ को कैद कर खुद शाह बन गया। औरंगजेब के बादशाह बनने के बाद उसकी शक्ति काफ़ी बढ़ गई और शिवाजी ने औरंगजेब से मुगल किलों को लूटने के सम्बन्ध में माफ़ी मांगी। अब शिवाजी ने बीजापुर के खिलाफ़ आक्रमण तेज कर दिया। अब शाहजी ने बीजापुर के सुल्तान की अपने पुत्र को सम्हालने के निवेदन पर अपनी असमर्थता ज़ाहिर की और शिवाजी एक-एक कर कुछ ४० किलों के मालिक बन गए। उन्होंने सूरत को दो बार लूटा और वहाँ मौजूद डच और अंग्रेज कोठियों से भी धन वसूला। वापस आते समय उन्होंने मुगल सेना को भी हराया। मुगलों से भी उनका संघर्ष बढ़ता गया और शिवाजी की शक्ति कोंकण और दक्षिण-पश्चिम महाराष्ट्र में सुदृढ़ में स्थापित हो गई।
उत्तर में उत्तराधिकार सम्बंधी विवाद के खत्म होते और सिक्खों को शांत करने के बाद औरंगजेब दक्षिण की ओर आया। उसने शाइस्ता खाँ को शिवाजी के खिलाफ भेजा पर शिवाजी किसी तरह भाग निकलने में सफल रहे। लेकिन एक युद्ध में मुगल सेना ने मराठों को कगार पर पहुँचा दिया। स्थिति की नाजुकता को समझते हुए शिवाजी ने मुगलों से समझौता कर लिया और औरंगजेब ने शिवाजी और उनके पुत्र शम्भाजी को मनसबदारी देने का वचन देकर आगरा में अपने दरबार में आमंत्रित किया। आगरा पहुँचकर अपने ५००० हजार की मनसबदारी से शिवाजी खुश नहीं हुए और आरंगजेब को भरे दरबार में भला-बुरा कहा। औरंगजेब ने इस अपमान का बदला लेने के लिए शिवाजी को शम्भाजी के साथ नजरबन्द कर दिया। लेकिन दोनों पहरेदारों को धोखा में डालकर फूलों की टोकरी में छुपकर भागने में सफल रहे। बनारस, गया और पुरी होते हुए शिवाजी वापस पुणे पहुँच गए। इससे मराठों में जोश आ गया और इसी बाच शाहजी का मृत्यु १६७४ में हो गई और शिवाजी ने अपने आप को राजा घोषित कर दिया।
अपने जीवन के आखिरी दिनों में शिवाजी ने अपना ध्यान दक्षिण की ओर लगाया और मैसूर को अपने साम्राज्य में मिला लिया। १६८० में उनकी मृत्यु के समय तक मराठा साम्राज्य एक स्थापित राज के रूप में उभर चुका था और कृष्णा से कावेरी नदी के बीच के इलाकों में उनका वर्चस्व स्थापित हो चुका था। शिवाजी के बाद उनके पुत्र सम्भाजी (शम्भाजी) ने मराठों का नेतृत्व किया। आरंभ में तो वे सफल रहे पर बाद में उन्हें मुगलों से हार का मुँह देखना पड़ा। औरंगजेब ने उन्हें पकड़कर कैद कर दिया। कैद में औरंगजेब ने शम्भाजी से मुगल दरबार के उन बागियों का नाम पता करने की कोशिश की जो मुगलों के खिलाफ विश्वासघात कर रहे थे। इस कारण उन्हें यातनाए दी गई और अन्त में तंग आकर उन्होंने औरंगजेब को भला बुरा कहा और संदेश भिजवाया कि वे औरंगजेब की बेटी से शादी करना चाहते हैं। उनकी भाषा और संदेश से क्षुब्ध होकर औरंगजेब ने शम्भाजी को टुकड़े टुकड़े काटकर उनके मांस को कुत्तों को खिलाने का आदेश दे दिया।
शम्भाजी की मृत्यु के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने गद्दी सम्हाली। उनके समय मराठों का उत्तराधिकार विवाद गहरा गया पर औरंगजेब भी बूढ़ा हो चला था इस लिए मराठों को सफलता मिलने लगी और वे उत्तर में नर्मदा नदी तक पहुँच गए। बीजापुर का पतन हो गया था और मराठों ने बीजापुर के मुगल क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद तो मुगल साम्राज्य कमजोर होता चला गया और उत्तराधिकार विवाद के बावजूद मराठे शक्तिशाली होते चले गए। उत्तराधिकार विवाद के चलते मराठाओं की शक्ति पेशवाओं (प्रधानमंत्री) के हाथ में आ गई और पेशवाओं के अन्दर मराठा शक्ति में और भी विकार हुआ और वे दिल्ली तक पहुँच गए। १७६१ में नादिर शाह के सेनापति अहमद शाह अब्दाली ने मराठाओं को पानीपत की तीसरी लड़ाई में हरा दिया। इसके बाद मराठा शक्ति का ह्रास होता गया। उत्तर में सिक्खों का उदय होता गया और दक्षिण में मैसूर स्वायत्त होता गया। अंग्रेजों ने भी इस कमजोर राजनैतिक स्थिति को देखकर अपना प्रभुत्व स्थापित करना आरंभ कर दिया। बंगाल और अवध पर उनका नियंत्रण १७७० तक स्थापित हो गया था और अब उनकी निगाह मैसूर पर टिक गई थी।
सिख धर्म और सिख साम्राज्य का उदय
सिख धर्म का इतिहास सिख साम्राज्य
सिख धर्म की शुरुआत सिख धर्म के सबसे पहले गुरु गुरुनानक देव जी द्वारा दक्षिण एशिया के पंजाब में हुई थी. उस समय पंजाब में हिंदू और इस्लाम धर्म था. तब गुरुनानक देव ने लोगों को सिख धर्म की जानकारी देनी शुरू की, जो इस्लाम और हिंदू धर्म से काफी अलग था. गुरुनानक देव के बाद 9 गुरु और आए, जिन्होंने सिख धर्म को बढ़ाया
1799 में, उन्नीसवीं शताब्दी की पहली तिमाही के दौरान एक साम्राज्य स्थापित करने के लिए रणजीत सिंह द्वारा एकीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की तरह ही खड़ी और प्रशिक्षित एक कुशल सेना का उपयोग किया। उनके राजनीतिक नियंत्रण को स्थापित करने में समय-सम्मानित सुजरेन-जागीरदार राजनीति का उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण था। अपने बड़े प्रभुत्व में राजस्व प्रशासन और व्यापार पर व्यक्तिगत ध्यान देकर उन्होंने पंजाब में समृद्धि को पुनर्जीवित किया। उसने आबादी के सभी महत्वपूर्ण वर्गों को राजकीय संरक्षण प्रदान करते हुए उन्हें नए साम्राज्य से जोड़ दिया। शासक वर्ग में भी हिंदू और मुसलमान एक महत्वपूर्ण तत्व बन गये।
सिख शासक वर्ग में प्रमुख तत्व थे और रणजीत सिंह और उनके उत्तराधिकारियों द्वारा सौंपी गई जागीरों में उनका सबसे बड़ा हिस्सा था। राजस्व-मुक्त भूमि के रूप में राज्य संरक्षण में, सिखों को हिंदुओं और मुसलमानों की तुलना में बहुत बड़ा हिस्सा मिला, लेकिन उनकी कीमत पर नहीं। मुगल काल की तुलना में राज्य अब धार्मिक अनुदान प्राप्तकर्ताओं के पक्ष में अधिक राजस्व हस्तांतरित करता है। वास्तव में रणजीत सिंह ने केवल उस पैटर्न को बढ़ाया जो पहले अकबर द्वारा स्थापित किया गया था और बाद में शुरुआती सिख शासकों द्वारा बढ़ाया गया था। शासक वर्ग के कुछ सिख सदस्यों ने कला और साहित्य को संरक्षण दिया; कुछ लोगों ने पारंपरिक शिक्षा में व्यक्तिगत रुचि ली। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में सिखों की संख्या बढ़ रही थी, हालाँकि नए प्रवेशकों में से केवल कुछ ही संख्या में सरकार और प्रशासन या सेना से जुड़े थे।
यूरोपीय शक्तियों का प्रादुर्भाव
भारत में यूरोपीय आगमन
भारत की समृद्धि को देखकर पश्चिमी देशों में भारत के साथ व्यापार करने की इच्छा पहले से थी। यूरोपीय नाविकों द्वारा सामुद्रिक मार्गों का पता लगाना इन्हीं लालसाओं का परिणाम था। तेरहवीं सदी के आसपास मुसलमानों का अधिपत्य भूमध्य सागर और उसके पूरब के क्षेत्रों पर हो गया था और इस कारण यूरोपी देशों को भारतीय माल की आपूर्ति ठप पड़ गई। उस पर भी इटली के वेनिस नगर में चुंगी देना उनको रास नहीं आता था। कोलंबस भारत का पता लगाने अमरीका पहुँच गया और सन् 1487-88 में पेडरा द कोविल्हम नाम का एक पुर्तगाली नाविक पहली बार भारत के तट पर मालाबार पहुँचा। भारत पहुचने वालों में पुर्तगाली सबसे पहले थे इसके बाद डच आए और डचों ने पुर्तगालियों से कई लड़ाईयाँ लड़ीं। भारत के अलावा श्रीलंका में भी डचों ने पुर्तगालियों को खडेड़ दिया। पर डचों का मुख्य आकर्षण भारत न होकर दक्षिण पूर्व एशिया के देश थे। अतः उन्हें अंग्रेजों ने पराजित किया जो मुख्यतः भारत से अधिकार करना चाहते थे। आरंभ में तो इन यूरोपीय देशों का मुख्य काम व्यापार ही था पर भारत की राजनैतिक स्थिति को देखकर उन्होंने यहाँ साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक नीतियाँ अपनानी आरंभ की।
पुर्तगाली
22 मई 1498 को पुर्तगाल का वास्को डी गामा भारत के तट पर आया जिसके बाद भारत आने का रास्ता तय हुआ। उसने कालीकट के राजा से व्यापार का अधिकार प्राप्त कर लिया पर वहाँ सालों से स्थापित अरबी व्यापारियों ने उसका विरोध किया। 1499 में वास्को-डी-गामा स्वदेश लौट गया और उसके वापस पहुँचने के बाद ही लोगों को भारत के सामुद्रिक मार्ग की जानकारी मिली।
सन् 1500 में पुर्तगालियों ने कोचीन के पास अपनी कोठी बनाई। शासक सामुरी (जमोरिन) से उसने कोठी की सुरक्षा का भी इंतजाम करवा लिया क्योंकि अरब व्यापारी उसके ख़िलाफ़ थे। इसके बाद कालीकट और कन्ननोर में भी पुर्तगालियों ने कोठियाँ बनाई। उस समय तक पुर्तगाली भारत में अकेली यूरोपी व्यापारिक शक्ति थी। उन्हें बस अरबों के विरोध का सामना करना पड़ता था। सन् 1506 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अपना अधिकार कर लिया। ये घटना जमोरिन को पसन्द नहीं आई और वो पुर्तगालियों के खिलाफ हो गया। पुर्तगालियों के भारतीय क्षेत्र का पहला वायसऱय डी-अल्मीडा था। उसके बाद [[अल्बूकर्क](1509)] पुर्तगालियों का वायसराय नियुक्त हुआ। उसने 1510 में कालीकट के शासक जमोरिन का महल लूट लिया।
पुर्तगाली इसके बाद व्यापारी से ज्यादे साम्राज्यवादी नज़र आने लगे। वे पूरब के तट पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करना चाहते थे। अल्बूकर्क के मरने के बाद पुर्तगाली और क्षेत्रों पर अधिकार करते गए। सन् 1571 में बीजापुर, अहमदनगर और कालीकट के शासकों ने मिलकर पुर्तगालियों को निकालने की चेष्टा की पर वे सफल नहीं हुए। 1579 में वे मद्रास के निकच थोमें, बंगाल में हुगली और चटगाँव में अधिकार करने में सफल रहे। 1580 में मुगल बादशाह अकबर के दरबार में पुर्तगालियों ने पहला ईसाई मिशन भेजा। वे अकबर को ईसाई धर्म में दीक्षित करना चाहते थे पर कई बार अपने नुमाइन्दों को भेजने के बाद भी वो सफल नहीं रहे। पर पुर्तगाली भारत के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार नहीं कर पाए थे। उधर स्पेन के साथ पुर्तगाल का युद्ध और पुर्तगालियों द्वारा ईसाई धर्म के अन्धाधुन्ध और कट्टर प्रचार के के कारण वे स्थानीय शासकों के शत्रु बन गए और 1612 में कुछ मुगल जहाज को लूटने के बाद उन्हें भारतीय प्रदेशों से हाथ धोना पड़ा।
डच
पुर्तगालियों की समृद्धि देख कर डच भी भारत और श्रीलंका की ओर आकर्षित हुए। सर्वप्रथम 1598 में डचों का पहला जहाज अफ्रीका और जावा के रास्ते भारत पहुँचा। 1602 में प्रथम डच कम्पनी की स्थापना की गई जो भारत से व्यापार करने के लिए बनाई गई थी। इस समय तक अंग्रेज और फ्रांसिसी लोग भी भारत में पहुँच चुके थे पर नाविक दृष्टि से डच इनसे वरीय थे। सन् 1602 में डचों ने अम्बोयना पर पुर्तगालियों को हरा कर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1612 में श्रीलंका में भी डचों ने पुर्गालियों को खदेड़ दिया। उन्होंने पुलीकट (1610), सूरत (1616), चिनसुरा (1653), क़ासिम बाज़ार, बड़ानगर, पटना, बालेश्वर (उड़ीसा), नागापट्टनम् (1659) और कोचीन (1653) में अपनी कोठियाँ स्थापित कर लीं। पर, एक तो डचों का मुख्य उद्येश्य भारत से व्यापार न करके पूर्वी एशिया के देशों में अपने व्यापार के लिए कड़ी के रूप में स्थापित करना था और दूसरे अंग्रेजों ओर फ्रांसिसियों ने उन्हें यहाँ और यूरोप दोनों जगह युद्धों में हरा दिया। इस कारण डचों का प्रभुत्व बहुत दिनों तक भारत में नहीं रह पाया था।
अंग्रेज़ और फ्रांसिसी
इंग्लैंड के नाविको को भारत का पता कोई 1578 इस्वी तक नहीं लग पाया था। 1578 में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक अंग्रेज़ नाविक ने लिस्बन जाने वाले एक जहाज को लूट लिया। इस जहाज़ से उसे भारत जाने वाले रास्ते का मानचित्र मिला। 31 मई सन् 1600 को कुछ व्यापारियों ने इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ को ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना का अधिकार पत्र दिया। उन्हें पूरब के देशों के साथ व्यापार की अनुमति मिल गई। 1601-03 के दौरान कम्पनी ने सुमात्रा में वेण्टम नामक स्थान पर अपनी एक कोठी खोली। हेक्टर नाम का एक अंग्रेज़ नाविक सर्वप्रथम सूरत पहुँचा। वहाँ आकर वो आगरा गया और जहाँगीर के दरबार में अपनी एक कोठी खोलने की विनती की। जहाँगीर के दरबार में पुर्तगालियों की धाक पहले से थी। उस समय तक मुगलों से पुर्तगालियों की कोई लड़ाई नहीं हुई थी इस कारण पुर्तगालियों की मुगलों से मित्रता बनी हुई थी। हॉकिन्स को वापस लौट जाना पड़ा। पुर्तगालियों को अंग्रेजों ने 1612 में सूरत में पराजित कर दिया और सर टॉमस रो को इंग्लैंड के शासक जेम्स प्रथम ने अपना राजदूत बनाकर जहाँगीर के दरबार में भेजा। वहाँ उसे सूरत में अंग्रेजों को कोठी खोलने की अनुमति मिली।
इसके बाद बालासोर (बालेश्वर), हरिहरपुर, मद्रास (1633), हुगली (1651) और बंबई (1688) में अंग्रेज कोठियाँ स्थापित की गईं। पर अंग्रेजों की बढ़ती उपस्थिति और उनके द्वारा अपने सिक्के चलाने से मुगल नाराज हुए। उन्हें हुगली, कासिम बाज़ार, पटना, मछलीपट्नम्, विशाखा पत्तनम और बम्बई से निकाल दिया गया। 1690 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह औरंगजेब से क्षमा याचना की और अर्थदण्ड का भुगतानकर नई कोठियाँ खोलने और किलेबंदी करने की आज्ञा प्राप्त करने में सफल रहे।
इसी समय सन् 1611 में भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से एक फ्रांसीसी कंपनी की स्थापना की गई थी। फ्रांसिसियों ने 1668 में सूरत, 1669 में मछलीपट्नम् तथा 1674 में पाण्डिचेरी में अपनी कोठियाँ खोल लीं। आरंभ में फ्रांसिसयों को भी डचों से उलझना पड़ा पर बाद में उन्हें सफलता मिली और कई जगहों पर वे प्रतिष्ठित हो गए। पर बाद में उन्हें अंग्रेजों ने निकाल दिया।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
प्राचीन भारत
आधुनिक भारत
भारत का इतिहास
भारतीय इतिहास की समयरेखा
भारत के राजवंशों और सम्राटों की सूची
बाहरी कड़ियाँ
पूर्व-मध्यकालीन भारत (गूगल पुस्तक)
श्रेणी:भारत का इतिहास