Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

नीड़ का निर्माण फिर

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

नीड़ का निर्माण फिर हरिवंश राय बच्चन भारत हिंदी आत्मकथा 1970 क्या भूलूं क्या याद करूँ बसेरे से दूर नीड़ का निर्माण फिर हरिवंश राय बच्चन की एक प्रसिद्ध कृति है।ये पद्यखंड श्री हरिवंश राय ‘बच्चन’ के सतरंगिनी नामक काव्य से है | यह उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग है, जिसका प्रकाशन 1970 में हुआ। डॉ॰ हरिवंश राय बच्चन को इसके लिए प्रथम सरस्वती सम्मान दिया गया था।Saraswati Samman, 1991, Harivansh Rai ‘Bachchan’ https://web.archihttp://www.kkbirlafoundation.org/downloads/pdf/saraswati-1991.pdf www.kkbirlafoundation.org के के बिड़ला फाउंडेशन 21 अप्रैल 2019 https://web.archive.org/web/20150102105630/http://www.kkbirlafoundation.org/downloads/pdf/saraswati-1991.pdf 2 जून 2018 en 2 जनवरी 2015 ‘मधुशाला’, ‘एकांत संगीत’, ‘आकुल अंतर’, ‘निशा निमंत्रण’, ‘सतरंगिनी’ इत्यादि इनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं | इनकी काव्य रचना ‘दो चट्टानों’ पर इन्हें साहित्य अकादमी की ओर से पुरस्कार प्रदान किया गया | सन् १९७६ में इन्हें पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया | उनकी आत्मकथा के चार खण्ड हैं- क्या भूलूं क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, तथा दशद्वार से सोपान तक नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! बह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अँधेरा, धूलि धूसर बादलों ने भूमि को इस भाँति घेरा, रात-सा दिन हो गया, फिर रात आई और काली, लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा, रात के उत्पात-भय से भीत जन-जन, भीत कण-कण किंतु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर!वह चले झोंके कि काँपे भीम कायावान भूधर, जड़ समेत उखड़-पुखड़कर गिर पड़े, टूटे विटप वर, हाय, तिनकों से विनिर्मित घोंसलो पर क्या न बीती, डगमगाए जबकि कंकड़, ईंट, पत्थर के महल-घर; बोल आशा के विहंगम, किस जगह पर तू छिपा था, जो गगन पर चढ़ उठाता गर्व से निज तान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर!क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों में उषा है मुसकराती, घोर गर्जनमय गगन के कंठ में खग पंक्ति गाती; एक चिड़िया चोंच में तिनका लिए जो जा रही है, वह सहज में ही पवन उंचास को नीचा दिखाती! नाश के दुख से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख प्रलय की निस्तब्धता से सृष्टि का नव गान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर। श्रेणी:हरिवंश राय बच्चन श्रेणी:आत्मकथाएँ श्रेणी:१९७० में प्रकाशित हिन्दी पुस्तकें श्रेणी:सरस्वती सम्मान से सम्मानित कृति भुमिका इन्हें भी देखें क्या भूलूँ क्या याद करूँ बाहरी कड़ियाँ 'नीड़ का निर्माण फिर' की भूमिका (हरिवंशराय बच्चन द्वारा ) तथा प्रारम्भिक अंश