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देवनी मोरी
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देवनी मोरी Devni Moriદેવની મોરી Head of Buddha Shakyamuni LACMA M.79.8.jpg बुद्ध शाक्यमुनि का टेराकोटा से बना शिर (375-400 ई) India Gujarat#India yes गुजरात व भारत में स्थान 23.670001 73.396319 inline,title अरवल्ली ज़िला, गुजरात, भारत मठ और स्तूप 4वीं शताब्दी ईसवी पश्चिमी क्षत्रप
देवनी मोरी (Devni Mori) भारत के गुजरात राज्य के उत्तरी भाग में अरवल्ली ज़िले के शामलाजी नगर से 2 किमी दूर एक बौद्ध पुरातत्व स्थल है। इसका काल तीसरी से चौथी शताब्दी ईसवी आंका जाता है। यह ऐसे स्थान पर है जहाँ से प्राचीन व्यापार व सार्थ (कारवाँ) मार्ग निकला करते थे। खुदाई से सबसे निचली परत में आठवी शताब्दी के बौद्ध अवशेष, मध्य परत में गुर्जर-प्रतिहार काल के हिन्दू व बौद्ध अवशेष और सबसे ऊपरी परत में 14वीं शताब्दी के मुस्लिम मीनाकारी वस्तुएँ मिली हैं। यहाँ पुरातत्विक खुदाई 1960 से 1963 तक करी गई थी। यह स्थल मेश्वो नदी पर बने बाँध के जलाशय में डूब गया था, जिसपर 1959 में कार्य आरम्भ हुआ और 1971–1972 में पूर्ण हुआ।Schastok Sara L. The Śāmalājī Sculptures and 6th Century Art in Western India 1985 BRILL 9004069410 24–27 with footnotes https://books.google.com/books?id=jh1fF8HvJmMC&pg=PA24 Meshwo Water Reservoir, Government of Gujarat (India)मेशवू जल भंडार https://web.archive.org/web/20190109011838/https://guj-nwrws.gujarat.gov.in/showpage.aspx?contentid=1796&lang=english 9 जनवरी 2019 , गुजरात सरकार (भारत)
पुरातात्विक अवशेष
बौद्ध मूर्तियाँ
देवनी मोरी में कई टेराकोटा बौद्ध मूर्तियाँ (लेकिन कोई पत्थर की मूर्तियाँ नहीं) मिली, जिन्हें तीसरी शताब्दी के लिए भी दिनांकित करा गया, और जो गुजरात की सबसे प्रारम्भिक मूर्तियों में हैं। यह अवशेष शामलाजी संग्रहालय और बड़ौदा संग्रहालय और चित्र गैलरी में स्थित हैं।Ishikawa Ken "More Gandhāra than Mathurā: substantial and persistent Gandhāran influences provincialized in the Buddhist material culture of Gujarat and beyond, c. AD 400-550" in "The Global Connections of Gandhāran Art" 2019 156ff https://www.academia.edu/44311708/The_Global_Connections_of_Gandh%C4%81ran_Art en
विहार
देवनी मोरी में एक मठ है जिसके प्रवेश द्वार के सामने एक छवि मंदिर बनाया गया है। इस तरह की व्यवस्था उत्तर-पश्चिमी स्थलों जैसे कि कलावन ( तक्षशिला क्षेत्र में) या धर्मराजिक में शुरू की गई थी। यह माना जाता है कि यह वास्तुशिल्प पैटर्न तब देवनी मोरी, अजंता, औरंगाबाद, एलोरा, नालंदा, रत्नागिरी और अन्य मंदिरों के साथ मठों के विकास के लिए उदाहरण बन गया। देवनी मोरी में विहार ईंटों से बनाए गए थे। यहाँ भी जूनागढ़ ज़िले के ऊपरकोट की भांति आवासीय गुफाएँ हैं, जिनमें पानी के कुण्ड हैं।
स्तूप
देवनी मोरी में एक स्तूप भी है जहाँ कई अवशेष मिले थे। यह गुजरात का एकमात्र ज्ञात स्वयं खड़ा हुआ स्तूप है। स्तूप के अंदर महात्मा बुद्ध की नौ छवियाँ मिली थीं। इन छवियों में स्पष्ट रूप से गांधार के ग्रीको-बौद्ध कला के प्रभाव दिखते हैं और इसे पश्चिमी क्षत्रपों की पश्चिमी भारतीय कला के उदाहरण के रूप में वर्णित किया गया है।द जर्नल ऑफ़ द इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ बुद्धिस्ट स्टडीज़, खंड 4 1981 संख्या I एक अजंता में चित्रित बुद्ध आकृतियों का असाधारण समूह, p.97 और नोट 2 https://web.archive.org/web/20180506113501/http://journals.ub.uni-heidelberg.de/index.php/jiabs/article/viewFile/8536/2443 6 मई 2018
दिनांक और प्रभाव
thumb|280px| रुद्रसिंह द्वितीय (305-313 ई) का एक सिक्का, जो देवनी मोरी स्तूप में मिला
स्तूप से तीन अवशेष मंजुषाओं (बड़े डब्बों) को प्राप्त किया गया। इनमें से एक पर लेखन है, जिसमें एक तिथि का उल्लेख है: 127वें वर्ष में रुद्रसेन का शासन। पश्चिमी क्षत्रप नरेश सदैव शक संवत का प्रयोग करते थे, इसलिए इसका तात्पर्य 204 ईसवी होने का अनुमान है और यह शासक पश्चिमी क्षत्रप के रुद्रसेन प्रथम रहे होंगे। यदि यहाँ किसी कारण से शक के स्थान पर कलचुरी संवत उल्लेखित था, तो वर्ष 375 ईसवी रहा होगा और शासक रुद्रसेन तृतीय। दूसरी मंजुषा में पश्चिमी क्षत्रप के 8 सिक्के शामिल थे, जिनमें से एक विश्वसेन (शासनकाल 294-305 ई) का था। सिक्के घिसे हुए हैं, लेकिन दो अच्छी स्थिति के सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक रुद्रसेन प्रथम (203-220 ई) और दूसरा रुद्रसिंह द्वितीय (305-313 ई) का है। इन भिन्न तिथियों के कारण देवनी मोरी को कभी तृतीय शताब्दी और कभी चतुर्थ शताब्दी का निर्माण माना जाता है। इसके बाद के पश्चिम क्षत्रप शासकों के चिन्ह न मिलने का अर्थ यह समझा जाता है कि लगभग 305–313 ईसवी काल में स्तूप का पुनर्निर्माण करवाया गया होगा।
मेहता और चौधरी के अनुसार, देवनी मोरनी की कला से पश्चिमी भारतीय कला परम्परा में एक गुप्त वंश से पूर्व युग की कलाशैली के संकेत मिलता है। उनका मानना है कि इस कलाशैली से अजंता गुफाओं, सारनाथ और पांचवी शताब्दी के बाद के स्थलों की कला प्रभावित थी। देवनी मोरी में गंधार का प्रभाव भी दिखता है, जो सिंध के मीरपुर खास (काहु जो दड़ो नाम स्तूप), शामलाजी और धांक में स्थाई रूप से देखा जा सकता है। शास्तोक के अनुसार, यहाँ इस कला के मिलने का अर्थ है कि इस शैली के कई केन्द्र थे। विलियम्स के अनुसार कोई भी अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि यह सभी शैलियाँ लम्बे समय से उपस्थित होने के कारण सम्भव है कि यह स्थानीय नवाचार और बाह्य प्रभावों का मिश्रण हो सकता है।
इन्हें भी देखें
अरवल्ली ज़िला
बाह्य जोड़
गुजरात पर्यटन - देवनी मोरी
सन्दर्भ
श्रेणी:गुजरात में पुरातत्व स्थल
श्रेणी:भारत में बौद्ध मठ
श्रेणी:भारत में स्तूप
श्रेणी:अरवल्ली ज़िला
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