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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

विद्या

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विद्या वो जानकारी और गुण, जो हम देखने-दिखाने, सुनने-सुनाने, या पढ़ने-पढ़ाने (शिक्षा) के माध्यम से प्राप्त करते हैं । हमारे जीवन के शुरुआत में हम सब जीना सीखते है । शिक्षा लोगों को ज्ञान और विद्या दान करने को कहते हैं अथवा व्यवहार में सकारात्मक एंव विकासोन्मुख परिवर्तन को शिक्षा माना जाता है । भारतीय चिन्तन में विद्या छांदोग्य उपनिषद में नारद-सनत्कुमार संवाद के अन्तर्गत विद्याओं का उल्लेख है। नारद जब सनत्कुमार के पास जाकर कहते हैं कि भगवन! मुझे अध्ययन कराइये। सनत्कुमार उनसे पूछते हैं कि तुम अभी तक कौन सी विद्याएँ जानते हो। इस पर नारद उत्तर देते हैं- ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेदं पि़त्र्यंराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्र्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोऽध्येमि॥2॥ भगवन! मैंने चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद), इतिहास-पुराण, वेदानां वेद अर्थात् व्याकरण, श्राद्धकल्प (पि़त्र्यं), गणित (राशिं), उत्पात विद्या (दैवं), निधि विज्ञान (निधिं), तर्कशास्त्र (वाकोवाक्यम्), नीतिशास्त्र (एकायनं), देवविद्या अर्थात् निरुक्त, शिक्षा, कल्प, छन्द और चिति से समबन्धित विद्या (ब्रह्मविद्यां), भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या अर्थात् गरुणमन्त्र, देवजनविद्या इत्यादि इन सभी विद्याओं का अध्ययन कर लिया है। मुण्डकोपनिषद में विद्या से सम्बन्धित एक प्रसंग आया है। शौनक ने जब अंगिरस से पूछा, – "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति" (महोदय, वह क्या है जिसके विज्ञात होने पर सब कुछ विज्ञात हो जाता है?), तो उन्होने उत्तर दिया- द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च । तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिग्म्यते ॥ - (मुण्डकोपनिषद्) ( दो प्रकार की विद्याएँ होतीं हैं जिन्हें ब्रह्मविदों ने बताया है, परा विद्या और अपरा विद्या। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरणं, निरुक्तं, छन्द, ज्योतिष - ये अपरा विद्या हैं। और परा विद्या वह है जिसके द्वारा वह 'अक्षर' (नष्ट न होने वाला) जाना जाता है।) विष्णुपुराण में १८ विद्याएँ गिनाई गयी हैं- अङ्गानि चतुरो वेदाः मीमांसा न्यायविस्तरः ।पुराणं धर्मशास्त्रञ्च विद्याः हि एताः चतुर्दशाः ॥ २८ ॥ आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः ।अर्थशास्त्रं चतुर्थन्तु विद्या हि अष्टादशैव ताः ॥ २९ ॥ ( छः वेदांग, चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र – ये ही चौदह विद्याएँ हैं ॥ २८ ॥ इन्ही में आयुर्वेद, धनुर्वेद और गान्धर्व इन तीनों को तथा चौथे अर्थशास्त्र को मिला लेने से कुल अठारह विद्या हो जाती हैं॥ २९ ॥) इसी प्रकार 'लोकनीति' नामक पालि ग्रन्थ में १८ विद्याएँ गिनाई गयीं है, जो कुछ भिन्न हैं- सुति सम्मुति संख्या च, योगा नीति विसेसिका । गंधब्बा गणिका चेव, धनुबेदा च पुरणा ॥ तिकिच्छा इतिहासा च, जोति माया च छन्दति । हेतु मन्ता च सद्दा च, सिप्पाट्ठारसका इमे ॥ ( श्रुति, स्मृति, सांख्य, योग, नीति, वैशेषिक, गंधर्व (संगीत), गणित, धनुर्वेद, पुराण, चिकित्सा, इतिहास, ज्योतिष, माया (जादू), छन्द, हेतुविद्या, मन्त्र (राजनय), और शब्द (व्याकरण) - ये अठारह शिल्प (विद्याएँ) हैं।)http://www.anantaajournal.com/archives/2016/vol2issue3/PartA/2-3-1.1.pdf A Note on PāliNītiLiterature 24 सितंबर 2018 https://web.archive.org/web/20170516232511/http://www.anantaajournal.com/archives/2016/vol2issue3/PartA/2-3-1.1.pdf 16 मई 2017 dead शुक्रनीति में उल्लेख है कि विद्याओं की संख्या यद्यपि अनन्त है, तथापि बत्तीस विद्याएं (एवं चौसठ कलाएं) प्रसिद्ध हैं :प्राचीन भारत में शिक्षक शिक्षाअप्रैल 2023 InternetArchiveBot विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः संख्यातुं नैव शक्यते। विद्या मुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिकलाः स्मृताः॥ अर्थात्‌ ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, सामवेद, इतिहास, पुराण, षड्‌-वेदाङ्ग, पितृविद्या (नृवंशविज्ञान), राशिविद्या (गणितशास्त्र), दैवविद्या (वर्षाविज्ञान), निधिविद्या (खनिजशास्र), वाकोविद्या (विधि एवं तकशास्त्र), एकायन (नीतिशास्त्र), देवविद्या (देवशास्त्र), ब्रह्मविद्या (अध्यात्म), भूतविद्या (जन्तुशास्त्र), क्षत्रविद्या (शस्त्रविद्या), नक्षत्रविद्या (ज्योतिष), सर्पेविद्या ( विषविज्ञान), देवजनविद्या (गन्धर्वविद्या) आदि। भारत के विद्याविद् आचार्यो ने विद्या के चार विभाग बताए हैं- आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को त्रयी कहते हैं। वार्ता से आशय अर्थशास्त्र से है। आन्वीक्षिकी का अर्थ है- प्रत्यक्षदृष्ट तथा शास्त्रश्रुत विषयों के तात्त्विक रूप को अवगत करानेवाली विद्या। इसी विद्या का नाम है- न्यायविद्या या न्यायशास्त्र ; जैसा कि वात्स्यायन ने कहा है : प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षामन्वीक्षा, तया प्रवत्र्तत इत्यान्वीक्षिकीन्यायविद्यान्यायशास्त्रम् (न्यायभाष्य 1 सूत्र) आन्वीक्षिकी में स्वयं न्याय का तथा न्यायप्रणाली से अन्य विषयों का अध्ययन होने के कारण उसे न्यायविद्या या न्यायशास्त्र कहा जाता है। आन्वीक्षिकी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। वात्स्यायन ने अर्थशास्त्राचार्य चाणक्य के निम्नलिखित वचन को उद्धृत कर आन्वीक्षिकी को समस्त विद्याओं का प्रकाशक, संपूर्ण कर्मों का साधक और समग्र धर्मों का आधार बताया है- प्रदीपः सर्वशास्त्राणामुपायः सर्वकर्मणाम्। आश्रयः सर्वधर्माणां सेयमान्वीक्षिकी मता। (न्यायभाष्य 1 सूत्र) पञ्चविद्या बौद्धधर्म में पञ्चविद्याएँ ये हैं - शब्दविद्या, हेतुविद्या, चिकित्साविद्या, शिल्प-कर्म-स्थान-विद्या, अध्यात्मविद्या। बोधिसत्व इन पञ्चविद्याओं के स्वामी माने जाते हैं। पंचविद्याओं के स्वामी को 'पण्डित' कहा जाता है। भारतीय परम्परा में विद्या या ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'श्रद्धा' को सबसे अनिवार्य मूल आधार माना गया है। गीता में भी कहा गया है कि श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त कर पाता है।"श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।" - भगवद्गीता (अध्याय 4, श्लोक 39) इन्हें भी देखें महाविद्या ब्रह्मविद्या विद्या और अविद्या परा विद्या और अपरा विद्या ज्ञान विद्या दान अविद्या कला चौसठ कलाएँ आन्वीक्षिकी सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Knowledge (विद्या) श्रेणी:विद्या